छत्तीसगढ़
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, दूसरी शादी के आरोप मात्र से नहीं रुकेगा पत्नी का भरण-पोषण
Shantanu Roy
21 Feb 2026 2:59 PM IST

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Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट, बिलासपुर ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि पत्नी पर दूसरी शादी या चूड़ी प्रथा से विवाह का आरोप लगाकर पति भरण-पोषण देने से इंकार नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि जब तक ऐसे आरोप ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित नहीं हो जाते, तब तक पत्नी का भरण-पोषण पाने का वैधानिक अधिकार सुरक्षित रहता है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को सही ठहराते हुए पति की अपील को खारिज कर दिया और पत्नी को गुजारा भत्ता देने के निर्देश बरकरार रखे। मामले के अनुसार, जशपुर जिले के एक युवक का विवाह वर्ष 2009 में उसी जिले की युवती से हुआ था। दंपति की तीन बेटियां हैं। विवाह के बाद पारिवारिक परिस्थितियों में तनाव बढ़ने लगा और समय के साथ पति-पत्नी के बीच विवाद गहरा गया। आरोप है कि बेटियों के जन्म के बाद पति ने पत्नी के साथ प्रताड़ना का व्यवहार किया।
स्थिति इतनी बिगड़ी कि पति ने कथित रूप से किसी दूसरी महिला को पत्नी बनाकर साथ रखना शुरू कर दिया और अपनी विधिवत विवाहित पत्नी को घर से बेदखल कर दिया। घर से निकाले जाने के बाद महिला ने न्याय की आस में फैमिली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और हिंदू विवाह अधिनियम के तहत भरण-पोषण दिलाने की मांग की। सुनवाई के उपरांत फैमिली कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों, दस्तावेजों और परिस्थितियों का परीक्षण करते हुए पत्नी के पक्ष में भरण-पोषण का आदेश पारित किया। फैमिली कोर्ट ने माना कि पत्नी को वैधानिक संरक्षण और आर्थिक सहायता की आवश्यकता है, जिसे पति द्वारा प्रदान किया जाना चाहिए। फैमिली कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए पति ने हाई कोर्ट में अपील दायर की।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क रखा कि पत्नी ने अपनी इच्छा से वैवाहिक घर छोड़ा और बाद में बिहार में एक अन्य व्यक्ति के साथ चूड़ी प्रथा के माध्यम से विवाह कर लिया। इस आधार पर पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं होना चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर पत्नी को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि पति दूसरी शादी या किसी अन्य संबंध का दावा करता है, तो उसे प्रमाणित करने के लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना अनिवार्य है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि फैमिली कोर्ट ने सभी पहलुओं का समुचित मूल्यांकन करने के बाद ही आदेश दिया है, जिसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता। अंततः हाई कोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और पत्नी को नियमानुसार गुजारा भत्ता देने के निर्देश दिए। इस फैसले को पारिवारिक कानून के क्षेत्र में एक अहम मार्गदर्शक माना जा रहा है, जो यह संदेश देता है कि निराधार आरोपों के सहारे भरण-पोषण जैसे अधिकारों से मुकरा नहीं जा सकता।
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