मुख्यमंत्री संज्ञान में लेकर सरकारी सामुदायिक भवन में हुए अवैध कब्जा हटाए

शासकीय मुस्लिम हाल में अवैध कब्जा: जनता से रिश्ता की ग्राउंड रिपोर्ट
मुस्लिम सामुदायिक भवनों पर एजाज ढेबर के कब्ज़े का मामला
6 साल से तीनों सामुदायिक भवन का निगम के आडिट में आय और व्यय का ब्यौरा क्यों नहीं
टेंडर हुआ तो टेंडर की प्रक्रिया में शामिल संस्थाओं की सूची क्यों नहीं? टेंडर लेने वाले का जीएसटी नहीं टेंडर के एग्रीमेंट और कागज कहां...
सूचना के अधिकार में निगम से मांग में शामिल 6 साल की तीनों सामुदायिक भवन की आय व्यय की पंजी और रसीदें, बुकिंग रजिस्टर की कापी उपलब्ध नहीं
नगर निगम जोन के अधिकारियों के पास भी 6 साल का तीनों सामुदायिक भवन के आय व्यय का ब्यौरा, रसीदें, लाइट बिल का संपूर्ण हिसाब किताब जांच का विषय
सरकारी सामुदायिक भवन किसी भी नेता या पार्षद को देने का अधिकार बिना टेंडर किसकी अनुमति से, कांग्रेस सरकार से चला सिस्टम अभी भी लागू
रायपुर (जसेरि)। राजधानी के एक नहीं तीन सामुदायिक भवन पर पूर्व महापौर एजाज ढेबर एयर उनके गुर्गे कब्ज़ा जमाने के मामले में निगम कमिश्नर ने तत्काल संज्ञान लेकर जांच के आदेश दिए लेकिन उस पर अमल नहीं हो पाया। जोन कमिश्नर निगम कमिस्नर को गलत जानकारी दे रहे है औऱ कमिस्नर प्रेस को वही गलत जानकारी दे देते रहे जिसके चलते विवाद औऱ बढ़ जाता है। सीएम सचिवालय को संज्ञान में लेकर तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए, साथ ही नगरीय प्रशासन मंत्री औऱ विभाग को इस पर सच्चाई का पता लगाना चाहिए। नियमत: कभी एैसा नहीं होता है कि सरकारी सामुदायिक भवन को निजी हाथों दे देते है। लेकिन यहां देखने में आ रहा है कि इन मुस्लिम सामुदायिक भवनों में ढेबर के गुर्गो का कब्जा है वहीं संचालित कर रहे है। औऱ मनमाने तरीके से पैसा वसूल रहे है। साथ ही जब से कब्जा किया है उस पर मय ब्याज के राजस्व वसूली की जाएगी। नगर निगम कमिश्नर ने स्पष्ट कहा है कि निगम की संपत्ति पर कोई भी कब्जा या अतिक्रमण नहीं कर सकता। एैसे कब्जा करने वालों की निगम प्रशासन कुंडली निकाल रही है। जितने भी लोगों ने अवैध तरीके से निगम की संपत्ति पर कब्जा जमाया है जांच उपरांत उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पहले ढेबर का उत्कल सामुदायिक भवन विद्या नगर बैरन बाजार, छोटा मुस्लिम हाल मोतीबाग और नगर निगम मुख्यालय के पीछे स्थित कुतुबी सामुदायिक हाल में कब्ज़ा था। ये तीनों सामुदायिक भवन का पैसा उन्ही के द्वारा वसूला जा रहा। पैसा भी मनमाने तरीके से बेहिसाब लिया जा रहा है। सरकारी पैसे का निजी उपयोग गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है लेकिन अधिकारी भी चुपचाप बैठे हैं। कांग्रेस सरकार को गए लगभग दो साल होने को आ रहे हैं उसके बाद अब प्रदेश और नगर निगम में भाजपा की सरकार बैठी है उसके बाद भी सामुदायिक भवनों का जिम्मा एजाज ढेबर किस हैसियत से उठा रहे हैं जाँच का विषय है। हालांकि सामुदायिक भवनों का निजी हाथों में संचालन होने के कई कारण हैं, जैसे सरकारी नियंत्रण की कमी, संसाधनों की कमी और निजी संस्थाओं की व्यावसायिक रुचि आदि आदि लेकिन यहाँ इस तरह की कोई बात ही नहीं है सरकार खुद इसका जिम्मा उठा सकती है। लेकिन ये बात लोगो के गले नहीं उतर रही है। सरकारी सामुदायिक भवनों पर पूर्व महापौर एजाज ढेबर या उनके परिवार के सदस्यों का कब्ज़ा हो जाना बहुत ही गंभीर बात है सरकार को संज्ञान में लेकर तत्काल अपने हाथो में या कुछ लोगों की कमिटी बनाकर उनको सौप देना चाहिए। उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ में एक सामुदायिक भवन पर सरपंच के बेटे ने कब्ज़ा करके कबाडख़ाना बना दिया था। वही हाल अब राजधानी के इन तीनो सामुदायिक भवनों का होने वाला है। सरकार का मूल उद्देश्य गरीबों को या छोटे प्रोग्राम के लिए सुलभ दर में उपलब्ध कराने की मंशा विफल हो जाता है। नगर निगम को इन भवनों से आय भी बढ़ती है लेकिन इससे निगम की आय तो नहीं बढ़ी परन्तु एजाज ढेबर और उसके परिवार की आय जरूर बढ़ गई है। और ऐसा होने से आम जनता के लिए इन सुविधाओं का उपयोग महंगा हो गया है। वे इसका सही तरीके से उपयोग नहीं करते, तो निगम को हस्तक्षेप करना पड़ता है। लेकिन नगर निगम में शिकायत करने के बावजूद कुछ हासिल नहीं हो रहा है। एजाज ढेबर के इन सामुदायिक भवनों के सञ्चालन से हमेशा विवाद होते रहता है सामुदायिक भवनों के निर्माण के बाद, उनके उपयोग को लेकर समुदाय के विभिन्न वर्गों के बीच विवाद पैदा हो जाता है। अगर निजी हाथों में प्रबंधन जाता है, तो समुदाय के कुछ वर्ग इसका विरोध करते हैं, क्योंकि वे चाहते हैं कि इन भवनों का उपयोग केवल सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए हो। ये राजनितिक सभा के लिए भी संचालित कर रहे हैं जिसका लोगों ने जमकर विरोध भी किया है. नगर निगम प्रशासन को चाहिए कि लोगों की इन समस्याओं का समाधान निकालने के लिए, सरकारी निकायों को इन भवनों के प्रबंधन पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इनका उपयोग सार्वजनिक हित के लिए ही हो।





