छत्तीसगढ़

रायपुर प्रेस क्लब चुनाव 2026 : बदले समीकरण, बिखरे पैनल और कड़ा मुकाबला

Nilmani Pal
11 Jan 2026 11:33 AM IST
रायपुर प्रेस क्लब चुनाव 2026 : बदले समीकरण, बिखरे पैनल और कड़ा मुकाबला
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रायपुर। रायपुर प्रेस क्लब का चुनाव अब बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गया है। नामांकन और नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनावी सरगर्मी और तेज हो गई है। खास बात यह रही कि किसी भी उम्मीदवार ने नाम वापस नहीं लिया, जिससे कुल 38 उम्मीदवार मैदान में डटे हुए हैं। इनमें से अध्यक्ष पद के लिए 6 उम्मीदवार अपनी-अपनी टीम को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक चुके हैं। हालांकि, इस बार अध्यक्ष की जीत-हार काफी हद तक पैनलों के समीकरण और उनकी एकजुटता पर निर्भर करती नजर आ रही है, नामांकन के बाद जिस तरह पैनलों में टूट-फूट हुई, उसने पूरे चुनावी गणित को उलझा दिया है। स्थिति यह है कि कोई भी पैनल पूरी तरह मजबूत और एकजुट दिखाई नहीं दे रहा, जिसका सीधा असर चुनावी समीकरणों पर पड़ रहा है।

संगवारी पैनल : युवा चेहरे पर बड़ा दांव

सबसे पुराने ब्राह्मणपारा संगवारी पैनल ने करीब 14 साल के वनवास के बाद अध्यक्ष पद पर फिर से जोर लगाया है। परंपरागत रूप से वरिष्ठ चेहरों को आगे करने वाला यह पैनल इस बार युवा चेहरे मोहन तिवारी पर बड़ा दांव खेल रहा है। पुराने अनुभवी वोटरों और युवा पत्रकारों के नए संयोजन से संगवारी पैनल को तेजी मिलती दिख रही है, जिससे इसके समर्थन में रॉकेट जैसी तेजी आई है, पत्रकारिता में लंबा अनुभव के साथ युवा और वरिष्ठ दोनों वर्गों से अच्छे संबंध का मोहन को लाभ मिलता दिख रहा है

प्रतिष्ठा पैनल : संतुलन की कोशिश

प्रतिष्ठा पैनल की कमान इस बार भी अनिल पुसदकर हाथों में है। दो दशकों से प्रेस क्लब की राजनीति में सक्रिय रहे अनिल पुसदकर को कई बार सफलता मिली है, हालांकि पिछले दस साल उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहे। इस बार उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की कोशिश की है। माना जा रहा है कि दामू के चुनाव न लड़ने से इस पैनल को वोटों का फायदा मिल सकता है।

परिवर्तन पैनल : इतिहास बदलने की कोशिश

स्पष्ट नीति के अभाव और ढुलमुल रवैये के कारण हर चुनाव में नुकसान उठाने वाला परिवर्तन पैनल एक बार फिर चर्चा में है। इस बार संगवारी पैनल का साथ न मिलने से प्रशांत दुबे इस पैनल में पुनर्वास कर रहे हैं। हालांकि, अब तक इस पैनल से कोई अध्यक्ष नहीं जीत पाया है। पिछली बार प्रफुल्ल ठाकुर को समर्थन देने वाला यह पैनल सत्ता रूढ़ प्रफुल्ल की कार्यकारिणी का हिस्सेदार भी रहा है वहीं प्रफुल्ल पैनल की कारगुजारी पर परिवर्तन पैनल की समय समय पर चुप्पी इस पैनल को कटघरे में खड़ा साबित कर रही है जिससे प्रफुल्ल ठाकुर के साथ-साथ स्व नितिन चौबे, के इस पैनल और उनके उम्मीदवारो के लिए नुकसानदेह साबित होता दिख रहा है।

क्रांतिकारी पैनल : नाम बड़े, जमीन कमजोर

क्रांतिकारी पैनल अपने नाम की तरह ही अलग पहचान रखता है। क्रांतिकारी विचारों और खबरों के लिए पहचाने जाने वाले चेहरे इस पैनल में हैं, लेकिन मेनस्ट्रीम से दूरी और प्रेस क्लब में सीमित पकड़ इस पैनल के लिए चुनौती बन रही है। बावजूद इसके, चर्चित चेहरों की वजह से पैनल सुर्खियों में जरूर है।

सर्व एकता पैनल : वही चेहरा, वही सवाल

सर्व एकता पैनल में हर बार की तरह इस बार भी अध्यक्ष पद को लेकर असमंजस बना रहा। अंतिम समय में उम्मीदवार तय करने और आनन-फानन में प्रचार इस पैनल की पहचान बन चुकी है। इस बार फिर के.के. शर्मा को मैदान में उतारे जाने से इस पैनल समर्थकों का एक बड़ा वर्ग नाराज बताया जा रहा है।

संकल्प पैनल : टूट-फूट से सबसे ज्यादा परेशान

पिछली बार सत्ता में रहा संकल्प पैनल इस चुनाव में सबसे ज्यादा बिखराव का शिकार है। जिनके सहारे पिछली जीत मिली थी, वही लोग इस बार दूसरे पैनलों में चले गए हैं। सदस्यता विवाद और वादों पर खरे न उतर पाने का असर साफ दिख रहा है। चुनाव से ठीक पहले महिला कक्ष के उद्घाटन की कोशिश को चुनाव अधिकारी द्वारा रोके जाने से पैनल की मुश्किलें और बढ़ गईं। रायपुर प्रेस क्लब का यह चुनाव सिर्फ पदों की नहीं, बल्कि पैनलों की साख और भविष्य की दिशा तय करने वाला बन चुका है। बिखरे समीकरण, कमजोर होती एकजुटता और कड़ा मुकाबला यह सब मिलकर इस चुनाव को अब तक के सबसे रोचक चुनावों में शामिल कर रहा है। आने वाले दिनों में ऊंट किस करवट बैठेगा, इस पर पूरे पत्रकार जगत की नजरें टिकी हुई हैं।

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