रायपुर साहित्य उत्सव : समाज में सकारात्मक बदलाव लाने महिला लेखन की भूमिका अहम

रायपुर। रायपुर साहित्य उत्सव के पहले दिन लाला जगदलपुरी मण्डप में आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम के प्रथम सत्र में “समकालीन महिला लेखन” विषय पर गहन एवं सार्थक परिचर्चा संपन्न हुई। इस सत्र में इंदिरा दांगी, श्रद्धा थवाईत, जया जादवानी तथा सोनाली मिश्र ने सहभागिता करते हुए महिला लेखन की बदलती भूमिका और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि समकालीन महिला लेखन अब भावनाओं की अभिव्यक्ति के साथ ही समाज के यथार्थ, संघर्ष, असमानताओं और संवेदनाओं को सशक्त रूप में सामने लाने का माध्यम बन चुका है। आज का स्त्री लेखन आत्मकथात्मक होने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन को भी प्रतिबिंबित कर रहा है, जो पाठक को सोचने और प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है।
परिचर्चा के दौरान महिला सशक्तिकरण, समानता, सामाजिक न्याय और बदलते पारिवारिक व सामाजिक ढांचे जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि महिला लेखन ने साहित्य में नई भाषा, नए अनुभव और नए सरोकार जोड़े हैं, जिससे साहित्य अधिक समावेशी और यथार्थपरक बना है। वक्ताओं ने कहा कि समकालीन महिला लेखन समाज में सकारात्मक बदलाव का सशक्त माध्यम बन रहा है। यह न केवल स्त्री अनुभवों को स्वर देता है, बल्कि सामाजिक चेतना को भी जागृत करता है। साथ ही महिला लेखन भारतीय साहित्य को नई दृष्टि, नई संवेदना और नई दिशा प्रदान कर रहा है।
उप सभापति हरिवंश ने अपने संबोधन की शुरुआत छत्तीसगढ़ के महान साहित्यकार स्वर्गीय विनोद कुमार शुक्ल को नमन करते हुए की। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ी साहित्य की एक समृद्ध और प्राचीन परंपरा रही है तथा इस प्रदेश ने अपनी स्थानीय संस्कृति को सदैव मजबूती से संजोकर रखा है। रायपुर साहित्य उत्सव के आयोजन में अत्यंत रचनात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने कबीर के काशी से गहरे संबंधों का उल्लेख करते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ के कवर्धा से भी उनका विशेष जुड़ाव रहा है। उप सभापति हरिवंश ने कहा कि एक पुस्तक और एक लेखक भी दुनिया को बदलने की शक्ति रखते हैं। उन्होंने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्य समाज को दिशा देता है, आशा जगाता है, निराशा से उबारता है और जीवन जीने का साहस प्रदान करता है।उपसभापति श्री हरिवंश ने कहा कि आज भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और 2047 तक विकसित भारत का संकल्प हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि भारत आज स्टील, चावल उत्पादन और स्टार्टअप्स के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। देश की आत्मनिर्भरता से दुनिया को नई दिशा मिली है और इस राष्ट्रीय शक्ति के पीछे साहित्य की सशक्त भूमिका रही है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अपने संबोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ प्रभु श्रीराम का ननिहाल है और इस पावन भूमि पर तीन दिवसीय रायपुर साहित्य उत्सव का शुभारंभ होना हम सभी के लिए गर्व का विषय है। उन्होंने देशभर से आए साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों का स्वागत करते हुए कहा कि रायपुर साहित्य उत्सव 2026 साहित्य का एक महाकुंभ है, जिसमें प्रदेश और देश के विभिन्न राज्यों से आए 120 से अधिक ख्यातिप्राप्त साहित्यकार सहभागिता कर रहे हैं। आयोजन के दौरान कुल 42 सत्रों में समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषयों पर गहन विमर्श होगा। यह समय गणतंत्र के अमृतकाल और छत्तीसगढ़ राज्य के रजत जयंती वर्ष का है, इसी भाव के अनुरूप इस उत्सव का आयोजन किया गया है।
मुख्यमंत्री ने स्वतंत्रता संग्राम की तुलना समुद्र मंथन से करते हुए कहा कि जिस प्रकार समुद्र मंथन में विष और अमृत दोनों निकले, उसी प्रकार स्वतंत्रता आंदोलन में हमारे सेनानियों ने विष रूपी कष्ट स्वयं सहकर आने वाली पीढ़ियों को आज़ादी का अमृत प्रदान किया। उन्होंने कहा कि हमारे अनेक स्वतंत्रता सेनानी लेखक, पत्रकार और वकील भी थे। माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा बिलासपुर जेल में रचित पुष्प की अभिलाषा जैसी रचनाओं ने देशवासियों को प्रेरित किया। माधवराव सप्रे की कहानी एक टोकरी भर मिट्टी को हिंदी की पहली कहानी माना जाता है।
मुख्यमंत्री ने पंडित लोचन प्रसाद पांडेय, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे साहित्यकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी स्मृतियों को सहेजना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। राजनांदगांव में त्रिवेणी संग्रहालय का निर्माण इसी भावना का प्रतीक है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि रायपुर साहित्य उत्सव के मंडपों को विनोद कुमार शुक्ल, श्यामलाल चतुर्वेदी, लाला जगदलपुरी और अनिरुद्ध नीरव जैसे महान साहित्यकारों को समर्पित किया गया है, जिन्होंने छत्तीसगढ़ की संस्कृति और साहित्य को नई पहचान दी। उन्होंने कहा कि कविता अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध करना सिखाती है और यही साहित्य की वास्तविक शक्ति है।
मुख्यमंत्री ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में आयोजित काव्यपाठ कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि अटल जी कवि हृदय थे और उनकी कविताओं ने करोड़ों लोगों को प्रेरणा दी। “हार नहीं मानूंगा…” जैसी पंक्तियाँ आज भी जनमानस को संबल देती हैं।
मुख्यमंत्री ने इमरजेंसी काल के दौरान साहित्यकारों की भूमिका को रेखांकित करते हुए दुष्यंत कुमार की प्रसिद्ध पंक्तियों का उल्लेख किया और कहा कि आज जब बड़ी संख्या में युवा साहित्यप्रेमी इस उत्सव में शामिल हो रहे हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि प्रदेश में साहित्य का वातावरण उजला और सशक्त है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह तीन दिवसीय आयोजन एक मील का पत्थर सिद्ध होगा। इस अवसर पर उन्होंने स्वर्गीय सुरेंद्र दुबे को भी नमन किया।
रजत जयंती वर्ष में साहित्य को समर्पित ऐतिहासिक आयोजन है रायपुर साहित्य उत्सव
छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने स्वागत उद्बोधन देते हुए कहा कि रायपुर साहित्य उत्सव के आयोजन के पीछे तीन माह का निरंतर परिश्रम और एक दूरदर्शी सांस्कृतिक कल्पना निहित है। उन्होंने बसंत पंचमी के पावन अवसर पर सभी अतिथियों, साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों को शुभकामनाएं देते हुए मां शारदा का स्मरण किया। शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में मुख्यमंत्री की कल्पना के अनुरूप इस साहित्य उत्सव को आकार दिया गया है, जिसका उद्देश्य पिछली पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के बीच साहित्य के माध्यम से एक सशक्त सेतु का निर्माण करना है। उन्होंने कहा कि देशभर में चल रहे अन्य साहित्य महोत्सवों के बावजूद ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों की उपस्थिति इस आयोजन की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को दर्शाती है।
अमृतकाल का गणतंत्र भारत को आत्मबोध और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ रहा है डॉ. कुमुद शर्मा
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की कुलपति कुमुद शर्मा ने “अमृतकाल में गणतंत्र” विषय को संबोधित करते हुए कहा कि अमृतकाल का यह प्रारंभिक चरण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि भारत का मौजूदा नेतृत्व देश की आज़ादी की शताब्दी को स्वर्णिम शताब्दी बनाने के लिए कृतसंकल्प है। डॉ. शर्मा ने कहा कि अमृतकाल के पंचप्राण हमें आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी चेतना, सांस्कृतिक दिशा और इतिहास बोध से जोड़ते हैं। हमारी कलाएं, साहित्य, लोक परंपराएं और प्रकृति से जुड़ी आस्थाएं ही भारत की आत्मा को परिभाषित करती हैं। उन्होंने साहित्यकार निर्मल वर्मा के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि छोटी-सी घटनाएं भी राष्ट्रीय चेतना और दायित्व बोध का आधार बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य और भारतीय भाषाएं सदैव समरसता, एकात्मकता और मानवीय मूल्यों की संवाहक रही हैं। साहित्यकारों और रचनाकारों का दायित्व है कि वे लोक, प्रकृति और संस्कृति से जुड़े इस सांस्कृतिक बोध को नई पीढ़ी तक पहुंचाएं, ताकि अमृतकाल का गणतंत्र भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व कर सके।
वाचिक परम्परा में साहित्य पर हुई सार्थक परिचर्चा
रायपुर साहित्य उत्सव 2026 के अंतर्गत “आदि से अनादि तक” थीम पर आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में लाला जगदलपुरी मण्डप में द्वितीय सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र में “वाचिक परम्परा में साहित्य” विषय पर गहन, विचारोत्तेजक एवं सार्थक परिचर्चा संपन्न हुई, जिसमें भारतीय साहित्य की मौखिक परम्पराओं की ऐतिहासिक भूमिका और समकालीन प्रासंगिकता पर व्यापक विमर्श किया गया।
इस परिचर्चा में प्रख्यात साहित्यकार रुद्रनारायण पाणिग्रही, शिव कुमार पांडे, डॉ. जयमती तथा सुधीर पाठक ने अपने विचार साझा किए। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. महेन्द्र मिश्र ने की। वक्ताओं ने अपने संबोधन में वाचिक परम्परा की विविध विधाओं और उनके साहित्यिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. महेन्द्र मिश्र ने कहा कि वाचिक परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह समकालीन साहित्य और समाज को समझने की एक सशक्त कुंजी है। उन्होंने कहा कि बदलते समय में वाचिक परम्पराओं का संरक्षण, दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी तक उनका संवेदनशील हस्तांतरण आज की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है।
वक्ताओं ने वाचिक परम्परा को भारतीय साहित्य की मूल धारा बताते हुए कहा कि लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, मिथक और जनश्रुतियाँ सदियों से समाज की सांस्कृतिक स्मृति को संरक्षित करती आई हैं। उन्होंने कहा कि लिखित साहित्य के उद्भव से पूर्व वाचिक परम्परा ही ज्ञान, इतिहास, जीवन मूल्यों और सामाजिक अनुभवों के संप्रेषण का प्रमुख माध्यम रही है, जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा है।
साहित्य के लिए डिजिटल माध्यम चुनौती नहीं, बल्कि अवसर
रायपुर साहित्य उत्सव 2026 के अंतर्गत “आदि से अनादि तक” थीम पर आयोजित सत्रों की श्रृंखला में अनिरुद्ध नीरव मंडप में एक विचारोत्तेजक चर्चा सत्र संपन्न हुआ। “डिजिटल साहित्य : प्रकाशकों के लिए चुनौती” विषय पर केंद्रित इस सत्र में डिजिटल युग में साहित्य प्रकाशन की बदलती प्रकृति, संभावनाओं और चुनौतियों पर गंभीर विमर्श किया गया। सत्र में प्रभात प्रकाशन, दिल्ली के प्रतिनिधि प्रभात कुमार ने डिजिटल माध्यमों के प्रभाव पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि ई-बुक्स, ऑडियो बुक्स और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने साहित्य को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के नए अवसर प्रदान किए हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि डिजिटल परिवर्तन के चलते पारंपरिक प्रकाशन मॉडल को नई प्रतिस्पर्धा और संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सत्र के सूत्रधार डॉ. सुधीर शर्मा वैभव प्रकाशन, रायपुर ने डिजिटल तकनीक, कॉपीराइट संरक्षण, पाठकों की बदलती रुचियों और साहित्यिक गुणवत्ता बनाए रखने जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर संवाद को आगे बढ़ाया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि डिजिटल माध्यम को चुनौती नहीं, बल्कि अवसर के रूप में अपनाकर नवाचार के जरिए साहित्य प्रकाशन को और अधिक सशक्त बनाया जा सकता है।





