
मयंक गुप्ता
डिप्टी डायरेक्टर, (छग शासन)
मैं और पापा दोनों थोड़ी हड़बड़ी में थे। यह ट्रेन हमेशा रायपुर स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर तीन से ही खुलती थी। उस प्लेटफार्म तक पहुँचने के लिए फुट ओवर ब्रिज पार करके जाना होता है। हम जल्दी में थे, क्योंकि प्लेटफार्म पर पहुँचने में थोड़ी देर हो जाती तो शायद ट्रेन छूट भी सकती थी। हालाँकि ट्रेन अभी आई नहीं थी, लेकिन उसके आने और छूटने का समय तो हो ही चुका था। इसी वजह से दिल की धड़कनें थोड़ी तेज थीं और मन में एक हल्की सी घबराहट थी। दरअसल, मैं सूरजपुर जैसे छोटे जिले से हूँ। 2016 में सीजीपीएससी में मेरा 24th रैंक था और रायपुर में मुझे पदस्थ किया गया। अभी मैं डिप्टी डायरेक्टर के पद पर रायपुर में ही पदस्थ हूँ। पर जब भी मैं उस प्लेटफार्म में जाता हूँ मेरी यादे ताजा हो जाती है।
मेरे पापा और मम्मी अक्सर मुझसे मिलने के लिए सूरजपुर से रायपुर ट्रेन द्वारा आया-जाया करते थे। सूरजपुर और रायपुर को जोड़ने का सबसे सुविधाजनक साधन यही ट्रेन है, जो रात भर की यात्रा में आराम से मंजिल तक पहुँचा देती है। जीवन की यात्रा में जब हम स्कूल से कॉलेज तक पहुँचते हैं, फिर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं और सफलता की ओर कदम बढ़ाते हैं, तो इस सफर में अक्सर हमें परिवार से अलग रहना पड़ता है। इस दौरान हमारी सारी ज़िम्मेदारियाँ माता-पिता ही उठाते हैं।
बचपन से हमारी नज़रों में पिता की छवि हमेशा एक समाधानकर्ता के रूप में बनी रहती है—
वे हमारी हर समस्या का हल निकाल देते हैं,
हमारे हर सवाल का जवाब जानते हैं,
हर मुश्किल में हमारे लिए मज़बूती से खड़े रहते हैं,
और साथ ही अनुशासन, दंड, हौसला और भावनात्मक सहारा भी वही देते हैं। मेरी पढ़ाई के दौरान पापा मेरी हर यात्रा में जाने से पहले मेरा सामान पैक करते थे, हर बार रेलवे स्टेशन छोड़ने जाते और लेने आते थे। पुत्र के लिए पिता हमेशा एक संरक्षक और वटवृक्ष की तरह होते हैं, जिनकी छाया में सुरक्षा और शांति मिलती है। दिमाग में यही छवि गहराई से बस जाती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि मानव शरीर उम्र के साथ ढलता है। हमारे माता-पिता भी धीरे-धीरे बूढ़े होते जाते हैं। जीवन का यह एक ट्रांज़िशनल फेज़ होता है—जहाँ हम जवान होते जाते हैं और हमारे माता-पिता बूढ़े होते जाते हैं। दुर्भाग्य यह है कि उस समय हमें इस बात की उतनी गहरी समझ नहीं होती। हम अब भी अपने माता-पिता को उसी रूप में देखते रहते हैं—जैसे कि वे हमारे लिए सब कुछ कर सकते हैं, जैसे कि वे अटूट शक्ति और सुरक्षा के स्रोत हों।
पर सच्चाई यह है कि एक समय आता है जब हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि अब वे हमारी सेवा करने की स्थिति में नहीं हैं, बल्कि हमें अब उनकी सेवा और सहारा बनना है। यही जीवन का असली चक्र है। माता-पिता की उम्र का ट्रांज़िशनल फेज़ बहुत महत्वपूर्ण होता है। उस समय हम अक्सर इसे समझ ही नहीं पाते, लेकिन माता-पिता इस बदलाव को गहराई से महसूस करते हैं। शायद मैं भी उस रात इसी भ्रम में था। घड़ी में ट्रेन का समय हो चुका था और मैं पूरी ताकत से तेजी से चलकर प्लेटफार्म तक पहुँचना चाहता था। मेरे लिए सबसे ज़रूरी था कि समय पर ट्रेन पकड़ ली जाए।
लेकिन पापा…
वे उसी रफ्तार से मेरे साथ नहीं चल पा रहे थे। फुट-ओवर ब्रिज की सीढ़ियाँ उनके लिए आसान नहीं थीं। उनकी चाल धीमी थी, और उस क्षण मुझे यह सब अटपटा लगा।
मैं पापा पर थोड़ा नाराज़ हो उठा—
“पापा, जल्दी चलिए… हमें ट्रेन पकड़नी है!”
पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
वे चुप रहे, और कोशिश करते रहे।
आज सोचता हूँ तो लगता है कि उनकी वह चुप्पी ही बहुत कुछ कह रही थी। शायद वे मुझे समझाना नहीं चाहते थे, शायद वे अपने मन में यह स्वीकार कर चुके थे कि वे पहले जैसे तेज़ कदमों से नहीं चल सकते। वह भी इस ट्रांज़िशनल फेज़ से गुजर रहे थे, लेकिन मैं उसे समझ नहीं पाया। मेरे लिए यह पहली बार था जब मुझे अहसास होना चाहिए था कि पिता अब उतने मज़बूत नहीं रहे, जितने मैंने हमेशा उन्हें देखा था।
एक पुत्र के लिए यह क्षण हमेशा अजीब होता है
जिस व्यक्ति को हमने हमेशा वटवृक्ष की तरह मज़बूत पाया, अचानक जब वह थका हुआ और धीमा लगता है, तो दिल मानने को तैयार ही नहीं होता।
रायपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 3 पर खड़ी दुर्ग–अंबिकापुर एक्सप्रेस जब धीरे-धीरे छूटती है, तो मेरा मन पीछे मुड़कर देखता है- “मेरे पापा अब बूढ़े हो रहे हैं।” यह सोच ही आंखों में नमी भर देती है। कभी वही पापा मुझे कंधे पर बैठाकर दुनिया दिखाते थे, आज मैं उनके हाथ थामकर उन्हें सहारा देता हूँ। यही जीवन का चक्र है—माता-पिता हमें बचपन में संभालते हैं और बुढ़ापे में हमें उनकी देखभाल करनी होती है। आज अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस हमें यही याद दिलाता है कि बुजुर्ग हमारे अनुभव, धैर्य और संस्कार के सागर हैं। उनकी सेवा केवल कर्तव्य नहीं बल्कि जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है। मैं अपने अनुभव से बताना चाहूंगा कि माता-पिता/वृद्धजनों की देखभाल में किन बातों का ध्यान रखें
1. भावनात्मक देखभाल
उनसे नियमित बातें करें, उनकी भावनाओं को महत्व दें।
अकेलापन बुजुर्गों का सबसे बड़ा दुश्मन है, इसलिए परिवार के बीच उनका समय बिताना बेहद ज़रूरी है।
उनके अनुभव और कहानियों को सुनें इससे उन्हें सम्मान का अहसास होता है।
2. शारीरिक स्वास्थ्य और देखभाल
60 वर्ष के बाद हर 6 माह में रेगुलर मेडिकल चेकअप करवाना चाहिए ताकि किसी भी बीमारी को समय पर पकड़ा जा सके। अगर ज़रूरत हो तो फिजियोथैरेपी, डाइट प्लान और योग/प्राणायाम जैसी गतिविधियों को उनकी दिनचर्या में शामिल करें।
मेडिकल इंश्योरेंस – बुजुर्गों के लिए उपयुक्त स्वास्थ्य बीमा करवाना जरूरी है ताकि आपात स्थिति में आर्थिक बोझ न बढ़े।
3. आर्थिक सुरक्षा
रिटायरमेंट के बाद उनकी आर्थिक सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए। जिस पिता ने आपकी जरूरतों को पूरा किया है अब उनकी जरूरतों को पूरा करने की ना सिर्फ जिम्मेदारी, बल्कि जवाबदेही भी आपकी बनती है।
पेंशन, सेविंग्स और इंश्योरेंस का प्रबंधन उनके मन की शांति के लिए बेहद ज़रूरी है।
4. सामाजिक जुड़ाव
उन्हें समाज से जोड़कर रखें। मंदिर, सत्संग, क्लब या मोहल्ले की मीटिंग्स में उनकी भागीदारी बढ़ाएं।
बच्चों को दादा-दादी/नाना-नानी के साथ समय बिताने दें, इससे दोनों पीढ़ियों का रिश्ता मजबूत होता है।
5. धैर्य और समझदारी
बुढ़ापे में चिड़चिड़ापन या भूलने की आदत आम होती है। ऐसे में धैर्य से पेश आएं। छोटी-छोटी बातों पर बहस करने से बचें। अब वक्त है उनको समझने का।
क्या करें और क्या न करें
★क्या करें:
नियमित स्वास्थ्य जांच।
समय-समय पर दवा और डायट का ध्यान।
उन्हें परिवार के फैसलों में शामिल करना।
समय और प्यार देना।
★क्या न करें:
उनकी बातों को अनसुना करना।
यह जताना कि वे बोझ हैं।
उनकी स्वतंत्रता छीनना।
उनके सामने तनाव या परिवारिक मतभेद बढ़ाना।
माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा पुण्य है। जब हम उनके बुढ़ापे का सहारा बनते हैं, तब वास्तव में इंसानियत की परिभाषा पूरी होती है। “बुढ़ापा एक सत्य है, और सेवा उसका सबसे सुंदर उत्तर।” अब जब में खुद एक बेटी का पिता हूँ तो अपनी संतान के लिए माँ-पापा के मेरे प्रति प्यार को और अच्छे से समझ सकता हूँ और यह एहसास मुझे उनसे और जोड़ता है। मेरे बिटिया मेरे से ज्यादा उनके साथ रहती है जो दोनों के लिए अच्छा है। आज भी मुझे इस वट वृक्ष की छाव में ज्यादा सकून मिलता है। सभी बुजुर्गो का सम्मान करें।





