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वन मंडल की जमीन पर भू-माफिया का प्रेजेक्ट रेडियंस सिटी, बलबीर सिंह ने किया खुलासा

Shantanu Roy
4 Sept 2026 4:22 PM IST
वन मंडल की जमीन पर भू-माफिया का प्रेजेक्ट रेडियंस सिटी, बलबीर सिंह ने किया खुलासा
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Raipur. रायपुर। सरकारी रिकॉर्ड में कभी ‘घास जमीन’ दर्ज रही भूमि के वन विभाग के अधीन आने के बाद उस पर निजी कॉलोनी विकसित किए जाने का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में है। शिकायतकर्ता बलबीर सिंह ने इस पूरे मामले में रेडियंस सिटी के मालिक मनोज यादव की भूमिका की जांच की मांग करते हुए वन विभाग के अधिकारियों के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की है। शिकायत के अनुसार, वर्ष 1955 के राजस्व रिकॉर्ड में संबंधित भूमि ‘घास जमीन’ के रूप में दर्ज थी। इसके बाद वर्ष 1987 में तत्कालीन कलेक्टर द्वारा
भूमि वन मंडल
को दिए जाने का उल्लेख पुराने राजस्व रिकॉर्ड में होने का दावा किया गया है। इसके बावजूद वर्तमान समय में इसी भूमि पर ‘रेडियंस सिटी’ नाम से कॉलोनी विकसित होने और प्लॉट काटकर बिक्री किए जाने का मामला सामने आया है। मामले को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार परियोजना को RERA की स्वीकृति प्राप्त है। शिकायतकर्ता का दावा है कि RERA के रिकॉर्ड में परियोजना के 279 प्लॉट बिके हुए तथा 59 प्लॉट बैंक के पास मॉर्टगेज बताए गए हैं और वर्ष 2025-26 में पजेशन की जानकारी भी दर्ज है। ऐसे में मूल भूमि की स्थिति, उसके स्वामित्व में हुए परिवर्तन और निजी कॉलोनी के विकास तक पहुंचने की पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की जांच जरूरी हो जाती है।

वन विभाग को ही नहीं पता तो प्रदेश की वन भूमि कौन बचाएगा?
इस मामले ने एक बड़ा और व्यापक सवाल भी खड़ा कर दिया है—यदि पुराने रिकॉर्ड में वन विभाग को हस्तांतरित भूमि पर आज निजी कॉलोनी विकसित हो सकती है, तो प्रदेशभर में वन मंडल के नाम दर्ज या वन विभाग के नियंत्रण वाली जमीनों की वास्तविक स्थिति की निगरानी कौन कर रहा है? बलबीर सिंह ने आरोप लगाया है कि यह केवल एक स्थान तक सीमित मामला नहीं हो सकता। उनका कहना है कि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में वन विभाग अथवा वन मंडल की जमीनों पर कथित रूप से कब्जे, अवैध उपयोग और प्लॉटिंग की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसलिए वन विभाग को केवल इस एक प्रकरण की जांच तक सीमित न रहते हुए प्रदेशभर में ऐसी भूमि का रिकॉर्ड सत्यापित कराना चाहिए।

क्या राजस्व तंत्र की मिलीभगत के बिना संभव है प्लॉटिंग?
सबसे बड़ा सवाल राजस्व रिकॉर्ड और जमीन के स्वरूप में हुए कथित बदलाव को लेकर है। शिकायतकर्ता ने इस बात की भी जांच की मांग की है कि यदि भूमि वास्तव में वन विभाग के अधीन थी, तो वह निजी कॉलोनी के विकास तक कैसे पहुंची? जांच का दायरा केवल कॉलोनी विकसित करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं होना चाहिए। भूमि के रिकॉर्ड, नामांतरण, सीमांकन, भूमि उपयोग, अनुमति, NOC, विकास अनुमति और बिक्री की पूरी प्रक्रिया में पटवारी, राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार/क्षेत्रीय तहसीलदार और SDM स्तर के अधिकारियों की क्या भूमिका रही, इसकी भी दस्तावेजों के आधार पर जांच आवश्यक है। हालांकि इन अधिकारियों की किसी व्यक्ति विशेष के साथ मिलीभगत को फिलहाल प्रमाणित तथ्य नहीं कहा जा सकता, लेकिन यदि वन भूमि से निजी कॉलोनी और फिर प्लॉट बिक्री तक की प्रक्रिया नियमों के विपरीत हुई है, तो यह जांच का गंभीर विषय है कि संबंधित राजस्व अधिकारियों की जानकारी, अनुमति अथवा रिकॉर्ड संबंधी कार्रवाई के बिना ऐसा परिवर्तन कैसे संभव हुआ।

‘मनोज यादव जैसे’ भू-माफियाओं पर बलबीर सिंह की नजर तेज़
शिकायतकर्ता बलबीर सिंह का कहना है कि उनकी नजर इस मामले पर पड़ी और उन्होंने संबंधित भूमि के पुराने एवं वर्तमान रिकॉर्ड के आधार पर शिकायत की। उनका आरोप है कि मनोज यादव जैसे भू-माफियाओं द्वारा कथित रूप से सरकारी/वन भूमि पर कब्जा कर उसे कॉलोनी के रूप में विकसित करने और आम लोगों को प्लॉट बेचने का खेल चल रहा है। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है, तो मामला केवल जमीन विवाद नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और राजस्व एवं वन रिकॉर्ड की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर प्रशासनिक प्रश्न बन जाएगा।

अब वन विभाग के सामने कई सवाल
वन विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि 1987 में वन मंडल को दी गई भूमि बाद में किस प्रक्रिया के तहत निजी परियोजना तक पहुंची। संबंधित मूल आदेश, राजस्व रिकॉर्ड, वन विभाग की फाइल, नामांतरण अथवा रिकॉर्ड परिवर्तन, भूमि उपयोग परिवर्तन, NOC, विकास अनुमति, कॉलोनी स्वीकृति और प्लॉट बिक्री से संबंधित दस्तावेजों की जांच की आवश्यकता है। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि RERA में परियोजना को स्वीकृति देने से पहले भूमि के मूल स्वामित्व और पूर्व रिकॉर्ड की क्या जांच की गई थी। एक मामले की
निष्पक्ष जांच
से कहीं बड़ा सवाल सामने आ सकता है—आखिर छत्तीसगढ़ में वन मंडल की जमीनें कहां-कहां हैं और वर्तमान में उनका वास्तविक कब्जा और उपयोग किसके पास है? बलबीर सिंह ने मांग की है कि इस प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए तथा यदि जांच में वन भूमि पर अवैध कब्जा, रिकॉर्ड में हेरफेर, नियम विरुद्ध भूमि उपयोग परिवर्तन या अधिकारियों की मिलीभगत प्रमाणित होती है, तो संबंधित व्यक्ति और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही प्रदेशभर में वन मंडल एवं वन विभाग के स्वामित्व भूमि का विशेष सत्यापन अभियान चलाकर यह पता लगाया जाना चाहिए कि कहीं अन्य स्थानों पर भी सरकारी भूमि को इसी तरह निजी कॉलोनियों और प्लॉटिंग के माध्यम से बाजार में तो नहीं उतारा जा रहा है।
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