छत्तीसगढ़

छग में भी सैंकड़ों फर्जी एमबीबीएस डॉक्टर!

Nil dhankar
16 July 2026 11:04 AM IST
छग में भी सैंकड़ों फर्जी एमबीबीएस डॉक्टर!
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सरकार के कई योजनाओं में दे रहे सेवा, रैकेट सक्रिय, स्वास्थ्य सेवाओं में करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार

मेडिकल काउंसिल, ड्रग्स इस्पेक्टर, स्वास्थ्य विभाग अपनी जि मेदारी को भूले

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री का विभागीय पकड़ कमजोर, अनुभव की कमी

ड्रग्स कंट्रोलर की नाकामी से नकली दवाई और नकली डाक्टर पूरे प्रदेश में हजारों की तादात में होने के बावजूद जांच में कोताही

छत्तीसगढ़ में अनुमान के अनुसार 3 लाख से भी ज्यादा फर्जी एमबीबीएस और एमडी की फर्जी डिग्री लेकर अनपढ़ लोग मेडिकल प्रेक्टिस कर रहे

रायपुर (जसेरि)। मध्यप्रदेश की तरह छत्तीसगढ़ में भी बड़े पैमाने पर फर्जी एमबीबीएस डिग्रीधारी डाक्टरों और पैरा-मेडिकल स्टाफ द्वारा सरकार के विभिन्न योजनाओं के तहत संचालित योजनाओं में सेवाएं दी जा रही हैं। ऐसी खबर है कि राज्य में केंद्रीय सहायता के साथ राज्य के वित्तीय सहयोग से स्वास्थ्य सेवाओं में करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार किया जा रहा है। नगरीय प्रशासन विकास विभाग एवं स्वास्थ्य विभाग के द्वारा पूरे राज्य में मु यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना अंतर्गत मोबाइल मेडिकल यूनिट को हेल्थ केयर एंड होम और जिकान्स्टेंट संस्था को 150 वाहन मोबाइल मेडिकल यूनिट द्वारा संचालित किया जा रहा है। इस योजना में 400 करोड़ रुपये का भ्रष्टाचार किया जा रहा है। इस योजना में 90 प्रतिशत फर्जी रूक्चक्चस् डॉक्टर और फर्जी पैरा मेडिकल स्टाफ छत्तीसगढ़ राज्य के जनता का उपचार करके दवाइयाँ भी समाप्त दिनांक की वितरित कर रहे हैं।

जानकारी के अनुसार बाकायदा एक सिंडीकेट के माध्यम से फर्जी रूक्चक्चस् डॉक्टरों की व्यवस्था की जाती है, जिसके बदले भारी कमीशन सदस्यों को दिया जाता है। इस सिंडीकेट में उत्तरप्रदेश के अनेक लोग जुड़े हुए हैं, जो फर्जी रूक्चक्चस् डॉक्टरों की डिग्री बनाकर पीडीएफ में देते हैं और फर्जी रूक्चक्चस् डॉक्टर पर रु. 25,000/- से 35,000/- रुपये तक वसूली करते हैं। फर्जी स्टाफ की व्यवस्था करने वाली कई संस्थाने सक्रिय है जिनमें उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश के अलावा रायपुर, भोपाल व मुंबई की संस्थाएँ भी स िमलित हैं,जो फर्जी रूक्चक्चस् डॉक्टरों की नियुक्ति करके करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार करते हैं। ये संस्थाएं स्थानीय श्रमिकों का भी शोषण कर उनके कर्मचारी भविष्य निधि श्वस्ढ्ढ और ञ्जष्ठस् जैसे अनिवार्य टैक्सों के भी इन संस्थाओं ने करोड़ों रुपए खा गए है।

जानकारी के अनुसार भोपाल की एक संस्था ने पूरे छत्तीसगढ़ राज्य की शव वाहन सेवा का कार्य लिया है। उसमें पूरा 100 प्रतिशत भ्रष्टाचार का किया जा रहा है। इस योजना में उपयोगी वाहन भी फर्जी हैं। लोडिंग वाहन को शव वाहन में लगाकर करोड़ों रुपये का फायदा प्राप्त कर चुकी है। म.प्र. की ही एक संस्था ने शहरी मोबाइल मेडिकल यूनिट छत्तीसगढ़ में फर्जी रूक्चक्चस् डॉक्टर नियुक्त कर करोड़ों रुपये का भ्रष्टाचार किया गया है।

स्वास्थ्य योजनाओं में कार्यरत डाक्टरों और अन्य चिकित्सकीय स्टाफ के डिग्री और शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच कर विभाग को इन फर्जीवाड़ा और कमीशनखोरी पर रोक लगाना चाहिए, इसके लिए उपचार करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की मूल चिकित्सकीय डिग्री एवं शैक्षणिक योग्यता, संबंधित चिकित्सा परिषद में उनका वैध पंजीयन, नियुक्ति प्रक्रिया एवं सेवा मूल अभिलेख, मोबाइल मेडिकल यूनिट संचालन की स्वीकृत शर्तों का पालन, उपचार संबंधी अभिलेख, प्रिस्क्रिप्शन एवं दवा वितरण का सत्यापन करवाना चाहिए।

ब्लैकलिस्ट कंपनी की दवा छत्तीसगढ़ में, विस में घिरे स्वास्थ्य मंत्री

विधानसभा में बुधवार को गुजरात में ब्लैकलिस्ट की गई दवा निर्माता कंपनी यूनिक्योर इंडिया लिमिटेड का मामला जोरदार तरीके से उठा। इस पूरे मामले में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने जोर देकर कहा कि प्रदेश में प्रतिबंधित दवा की खरीद नहीं हुई है। प्रश्नकाल में पूर्व सीएम भूपेश बघेल की अनुपस्थिति में कांग्रेस विधायक अटल श्रीवास्तव ने सरकार से पूछा कि क्या गुजरात में गुणवत्ता मानकों पर विफल होने के कारण ब्लैकलिस्ट की गई कंपनी की दवाओं की खरीद छत्तीसगढ़ में की गई और क्या इसके लिए वित्तीय नियमों में ढील दी गई। उन्होंने कहा कि ब्लैक लिस्टेड कंपनी से 6 करोड़ 89 लाख की दवा खर गई, और गरीब मरीजों को वितरित भी कर दिया गया। इसके जवाब में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने स्वीकार किया कि गुजरात मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने एस्पिरिन गैस्ट्रो-रेजिस्टेंट टैबलेट्स आईपी 75 और 150 मिलीग्राम को गुणवत्ता मानकों पर विफल होने के कारण ब्लैकलिस्ट किया था। उन्होंने बताया कि इस संबंध में 25 मार्च 2026 को यूनिक्योर इंडिया लिमिटेड ने सीजीएमएससी को सूचना दी थी। मंत्री ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ में जिस दवा के लिए क्रय आदेश जारी किया गया था, वह एस्पिरिन टैबलेट्स आईपी 75 मिलीग्राम (अनकोटेड टैबलेट) थी, जो गुजरात में प्रतिबंधित गैस्ट्रो-रेजिस्टेंट टैबलेट से अलग दवा है। उन्होंने कहा कि दोनों औषधियां अलग-अलग हैं और जनहित को देखते हुए सूचना मिलते ही कंपनी के जारी क्रय आदेश तथा दर अनुबंध एहतियातन निरस्त कर दिए गए। इस मुद्दे पर विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की। नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने सवाल उठाया कि जो दवाएं गुजरात में प्रतिबंधित हैं, उन्हें छत्तीसगढ़ में भी प्रतिबंधित क्यों नहीं किया गया। कांग्रेस विधायक अटल श्रीवास्तव ने आरोप लगाया कि प्रदेश के मरीजों को बिना गुणवत्ता सुनिश्चित किए दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं और पूछा कि क्या दवाओं का प्री-टेस्ट नहीं कराया जाता। इस पर स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि सीजीएमएससी के निर्धारित नियमों के अनुसार दवाओं का प्री-टेस्ट नहीं कराया जाता। दवाएं प्राप्त होने के बाद राज्य की प्रयोगशाला में उनकी गुणवत्ता की जांच की जाती है। उन्होंने कहा कि गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जाएगा और आवश्यक कार्रवाई नियमों के अनुसार की जाती है।

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