छत्तीसगढ़

नियम विरुद्ध पदोन्नति पर हाईकोर्ट सख्त, स्कूल शिक्षा विभाग का आदेश निरस्त

Shantanu Roy
25 Dec 2025 7:44 PM IST
नियम विरुद्ध पदोन्नति पर हाईकोर्ट सख्त, स्कूल शिक्षा विभाग का आदेश निरस्त
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Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा नियमों के विरुद्ध की गई पदोन्नति को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। एक शिक्षक द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग के आदेश को निरस्त कर दिया और स्पष्ट कहा कि सेवा नियमों की अवहेलना कर किसी पात्र कर्मचारी को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को विभाग के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करने तथा राज्य सरकार को भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के तहत तीन महीने के भीतर निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।

यह मामला याचिकाकर्ता दिनेश कुमार राठौर से जुड़ा है, जिन्होंने अपने अधिवक्ता जितेन्द्र पाली एवं अनिकेत वर्मा के माध्यम से बिलासपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में उन्होंने स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा उनके साथ की गई अनदेखी और कनिष्ठ शिक्षकों को पदोन्नति दिए जाने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता के अनुसार उनकी प्रारंभिक नियुक्ति 26 अप्रैल 1989 को निम्न वर्ग शिक्षक के पद पर हुई थी। इसके बाद 2 फरवरी 2009 को उन्हें उच्च वर्ग शिक्षक के पद पर पदोन्नत किया गया। 23 जनवरी 2015 को जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) द्वारा जारी आदेश में उन्हें 18 अगस्त 2008 से वरिष्ठता प्रदान की गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि नियमों के अनुसार उन्होंने आवश्यक पांच वर्ष की सेवा पूर्ण कर ली थी और वे व्याख्याता (लेक्चरर) पद पर पदोन्नति के लिए पूर्ण रूप से पात्र थे।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा राजपत्रित सेवा (स्कूल स्तर सेवा) भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के अनुसार व्याख्याता का पद 100 प्रतिशत पदोन्नति के माध्यम से उच्च वर्ग शिक्षकों से भरा जाना है। इसके बावजूद विभागीय पदोन्नति समिति द्वारा 19 जून 2012 को जारी आदेश में याचिकाकर्ता से कनिष्ठ शिक्षकों को पदोन्नति दे दी गई, जबकि उनके मामले पर विचार ही नहीं किया गया। विभागीय अधिकारियों द्वारा याचिकाकर्ता का दावा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि 1 अप्रैल 2010 की स्थिति में उनके पास स्नातकोत्तर (पीजी) डिग्री नहीं थी। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने 16 अप्रैल 2012 को स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर ली थी, इसके बावजूद जानबूझकर उनके नाम पर पदोन्नति के लिए विचार नहीं किया गया। उनका आरोप था कि विभागीय अधिकारियों ने नियमों की गलत व्याख्या कर उनके साथ अन्याय किया। मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के सिंगल बेंच में न्यायमूर्ति जस्टिस संजय जायसवाल के समक्ष हुई।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग सहित अन्य संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने 16 सितंबर 2016 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता को स्नातकोत्तर उपाधि के अभाव में पदोन्नति के लिए अयोग्य ठहराया गया था। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नियमों के विपरीत जाकर किसी कर्मचारी के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपनी समस्त मांगों के साथ संबंधित विभाग के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करें। साथ ही सक्षम प्राधिकारी को यह आदेश दिया गया कि वह भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2008 के प्रावधानों के अनुसार 90 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता के मामले में निर्णय ले। इस फैसले को शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि सेवा नियमों की अनदेखी कर मनमाने निर्णय नहीं लिए जा सकते।
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