छत्तीसगढ़
जेल में बंद कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच पर हाईकोर्ट की रोक
Shantanu Roy
7 Sept 2026 3:29 PM IST

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छग
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्यायिक हिरासत में बंद एक कर्मचारी के खिलाफ जारी विभागीय जांच पर फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने कहा कि जेल में रहने वाला कर्मचारी विभागीय जांच के दौरान अपने बचाव में प्रभावी तरीके से पक्ष प्रस्तुत नहीं कर सकता। वह जरूरी दस्तावेज जुटाने, गवाहों से संपर्क करने और आरोपों का जवाब तैयार करने की स्थिति में नहीं रहता। ऐसी परिस्थिति में जांच आगे बढ़ाने से कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिल पाएगा।
जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ ने जेल में बंद हेड कांस्टेबल शिवकांत तिवारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। हाईकोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया कि जब तक याचिकाकर्ता न्यायिक हिरासत में है, उसके खिलाफ विभागीय जांच की कार्रवाई स्थगित रखी जाए। अदालत ने विभाग को यह स्वतंत्रता भी दी है कि कर्मचारी की जेल से रिहाई के बाद विभागीय जांच दोबारा शुरू की जा सकती है।
मामले के अनुसार शिवकांत तिवारी 5वीं बटालियन छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल में हेड कांस्टेबल के पद पर पदस्थ थे। उनकी पदस्थापना जगदलपुर में थी। उनके खिलाफ बस्तर के फ्रेजरपुर थाना क्षेत्र में भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 409, 467, 468, 471 और 34 के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया है। ये धाराएं कथित धोखाधड़ी, आपराधिक न्यासभंग, जालसाजी और जाली दस्तावेजों के उपयोग जैसे आरोपों से संबंधित हैं।
आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद शिवकांत तिवारी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। इसके बाद विभाग ने उन्हें सेवा से निलंबित करते हुए आरोपों के संबंध में विभागीय जांच भी प्रारंभ कर दी। न्यायिक हिरासत में रहते हुए विभागीय जांच जारी रखने के फैसले को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुशील दुबे ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि जेल में बंद रहने के कारण संबंधित कर्मचारी अपने बचाव की तैयारी नहीं कर सकता। विभागीय जांच में लगाए गए आरोपों का उत्तर देने के लिए कई दस्तावेजों की आवश्यकता हो सकती है। इसके साथ ही बचाव से जुड़े गवाहों से मुलाकात और उनसे आवश्यक जानकारी प्राप्त करना भी जरूरी होता है। जेल में रहने के कारण याचिकाकर्ता के लिए ये सभी कार्य करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
अधिवक्ता ने कहा कि इस स्थिति में विभागीय जांच जारी रहने से कर्मचारी को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का वास्तविक और प्रभावी अवसर नहीं मिलेगा। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा। किसी कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करते समय उसे आरोपों का जवाब देने और अपने समर्थन में साक्ष्य पेश करने का पर्याप्त अवसर दिया जाना आवश्यक है।
राज्य शासन की ओर से पैनल लॉयर अपूर्वा तिवारी ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि केवल न्यायिक हिरासत में होने के आधार पर विभागीय जांच पर रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। आपराधिक प्रकरण और विभागीय जांच अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं, इसलिए विभाग अपनी जांच जारी रख सकता है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि न्यायिक हिरासत में रहते हुए याचिकाकर्ता प्रभावी बचाव करने की स्थिति में नहीं है। अदालत ने विभागीय जांच को समाप्त नहीं किया, बल्कि कर्मचारी की रिहाई तक स्थगित किया है। रिहाई के बाद विभाग नियमानुसार जांच को उसी चरण से आगे बढ़ा सकेगा।
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