ए भाई जरा देख के चलो, चिल्हर ले के चलो, मिल जाएंगे भिखारी

चौराहों पर खड़े होने वाले भिखारी सरकारी नौकरी वालों से भी ज्यादा कमा रहे डेली 2500 से 3000 की आमदनी
रायपुर । राजधानी में सरकार से ज्यादा टैक्स लोगों से भिखारी वसूल रहे है हर रोज घड़ी चौक जयस्तंभ, कोतवाली चौक, तात्यापारा चौक, तेलीबांघा ,वीवीआईपी रोड, राममंदिर, मरीनड्राइव चौक, शैलेंद्र नगर चौक , तेलीबाधा थाना के आसपास, एनआईटी, रविवि के पास, टाटीबंद, सरोना, खमतराई, बिरगांव, बंजारी मंदिर, आकाशवाणी काली मंदिर, शास्त्री मार्केट, विजेता काम्प्लेक्स, डीकेएस के आसपास, शारदा चौक, एमजी रोड, रामसागर पारा , स्टेशन रोड, गुरूव्दारा के आसपास आमापारा, महोबाबाजार, पंडरी पुराना बस स्टैंड,भाठागांव नया बस स्टैंड, फाफाडीह चौक, रेलवे स्टेशन, गुढिय़ारी राम नगर, मोवा सड्डू, कांपा, अवंति चौक शंकर नगर चौक, विधानसभा रोड ब्रिज के आसपास भिखारियों का जत्था दिख जाएगा। घड़ी चौक में देर रात तक भीख मांगा जाता है। छत्तीसगढ़ में भिक्षावृत्ति कानीून अपराध है। उसके बाद भी यह गोरखधंधा धड़ल्ल् से चल रहा है, ये कोई मजबूर या खदेड़े गए मजबूर नहीं बिल्क हष्टपुष्ट रोजी मजदूरी करने वाले की तरह है जिन्हे दिनभर में जो कमाई होती है उसका आधा हिस्सा दिया जाता है। कई बार तो पैसों को लेकर खुलेआम लड़ाई तक देखने को मिल जाता है। सरकार को चाहिए की इस पर सख्त निर्णय लेकर भिक्षाटन को पूरी तरह लागू करें ताकि मजलूम के नाम पर दान देने वालों को इमोशनल ब्लेक मेलिंग से बचाया जा सके।
अगर किसी भी चौराहे के सिग्नल पर आपकी कार या बाइक के आगे कोई भिखारी अपना हाथ फैला दे तो उसकी हथेली पर यह सोचकर दस का नोट मत रखिएगा कि वो लाचार, असहाय या गरीब ही होगा, हो सकता है. कि इस भिखारी की मंथली इनकम आपके सैलरी पैकेज से ज्यादा हो। जी हां, शहर में भीख मांगने वाले ज्यादातर लोग किसी मजबूरी के कारण हाथ नहीं फैला रहे हैं, बल्कि भिक्षावृत्ति इनके लिए एक शानदार प्रोफेशन बन गया है। ऐसा प्रोफेशन जिसकी इनकम किसी कॉर्पोरेट एम्प्लाई की सैलरी से भी ज्यादा होती है। एक आम भिखारी की मंथली इनकम करीब 25 हजार रुपए तो ट्रेंड भिखारी मंथली एक लाख तक कमा रहे हैं।
मांगने की कला और भाव भंगिमा वेस्ट आइडिया
भिखारियों की दुनिया में एक छोटा बच्चा से लेकर युवतियां, बुजुर्ग महिलाएं और असहाय से दिखने वाले पुरुष भी शामिल हैं। इनको मिलने वाली भीख इस बात पर निर्भर करती है कि आप इनकी भीख मांगने की कला और इनके चेहरे पर दिखने वाली लाचारी से कितना पसीज जाते हैं। जनता से रिश्ता टीम ने 20 दिन तक शहर के अलग-अलग चौराहों, मंदिरों के बाहर, पार्कों व अन्य पब्लिक प्लेस पर जाकर इन भिखारियों की तहकीकात की तो पता चला कि एक छोटा बच्चा डेली करीब 500 से 700 रुपए कमा लेता है। वहीं एक आम महिला डेली 1500 से 2000 तक कमाती है। वहीं बुजुर्ग और असहाय सी दिखने वाली महिलाएं 2500 से तीन हजार रोज तक कमाती हैं।
ऐसे मांगते कि देने पर हो जाएंगे मजबूर
शहर के किसी भी बड़े चौराहे के सिग्नल पर गाड़ी रुकते ही कार के आस पास शीशे पर दस्तक देते हुई एक कॉमन सी आवाज सुनाई देती है भगवान के नाम पर कुछ दे दे बाबा दो दिन से कुछ खाया नहीं है 10-20 रुपये दे दो। गोद में लिए बच्चे की तरफ इशारा करके उसके दूध के लिए रुपये मांगना या प्रेगनेंट लेडी का सामने आकर ऐसा मुंह बनाना जिसे देखकर न चाहते हुए भी आपकी जेब में हाथ चला जाएगा और 10-20 रुपये देने में आप कतई संकोच नहीं करेंगे। आपकी यही आदत इन्हें यह पेशा छोडऩे नहीं देती है। कोई भी साधारण व्यक्ति 8-10 घंटे मेहनत, मजदूरी या ऑफिस में काम करके 20 से 25 हजार रुपए बामुश्किल कमा पाता हैउसके बाद बॉस की डांट, फटकार, टारगेट पूरा करने की टेंशन, ऑफिस समय से पहुंचने की भागदौड़ और नौकरी से कब बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए इसका भी डर, वहीं इन सभी टेंशन से दूर लाचारी, मजबूरी, गरीबी का भेष बनाकर बस हाथ फैलाना है और शाम तक हजार, दो हजार ढाई हजार की कमाई.ऐसे में भीख मांगने से खुद को भी रोकें भी तो कैसे। शाम होते ही सभी के सभी पास वाले शराब दुकान में शराब पीकर लड़ाई झगड़ा, लूट करते देख सकते है।
बच्चे मांगते हैं भीख, मां रखती
है दूर से निगरानी
ये जो बच्चा जमीन पर बैठा है। इसे बच्चा समझने की गलती न करिएगा। कमाई में बड़ों बड़ों को ये पीछे छोड़ देगा। यह रोज 500 से 700 रुपये कमाता है। इसकी मां एक नॉर्मल महिला है जो इस बच्चे पर नजर रखती है । यहां मौजूद दुकानदारों ने बताया कि यहा बच्चे 10 और 5 रुपये के सिक्के मांगते हैैं। 100 रुपये होने पर फुटकर देकर 100 रुपये का नोट ले जाते हैैं।
ऐ बाबू दे ना जोड़ी बनी रहेगी
अब जरा एक और भीख मांगने वाले वर्ग पर नजर डालिए ये वर्ग दिव्यांग, ब्लाइंड और सीनियर सिटीजन महिलाएं हैैं। इनकी बेचारगी और मजबूर शक्ल देखकर लोग बड़े आराम से इन्हें भीख दे ही देते हैैं। ये 100 से 150 रुपये प्रतिघंटे के औसत से रुपये कमाते हैैं। ये भीख देने वाले को देखकर जुमले बदलते हैैं मसलन आप किसी युवती के साथ हैैं और आपकी उम्र 22 से 25 साल है तो हर चौराहे पर आपको एक जुमला सुनने को मिलेगा कि भगवान के नाम पर दे दे बाबा, जोड़ी बनी रहेगी। भले ही आप भाई बहन हों। वहीं कपल को देखकर भीख मांगने वाले पीछे ही पड़ जाते हैैं। नई दूल्हा और दुल्हन गाड़ी में दिख जाए तो 100 से 200 रुपये की भीख लेने से पहले गाड़ी का हैैंडिल नहीं छोड़ते हैैं।
हमारे लिए तो यही सरकारी नौकरी
घड़ी चौक पर भीख मांगने वाला बच्चों का ग्रुप रहता है। यहां पर कुछ भिखारी भीख मांगने के साथ-साथ कूड़ा बीनने या बच्चों के खिलौने, पेन आदि बेचने का भी काम करते हैं। असली मकसद तो भीख मांगना ही है लेकिन कोई भिखारी न समझे, इसलिए हाथ में पेन, खिलौने पकड़े रहते हैं। जिससे देने वाले को लगे कि घर चलाने या पेट पालने के लिए कर रहा है। और लोग पेन या खिलौना लेकर 10, 20 या 50 रुपए भी पकड़ा देते हैं। जबकि इस सामान की वैल्यू दो-चार रुपए से ज्यादा नहीं होती है। यह इसी परपज से ही तैयार किया जाता है। काफी देर तक चौराहे पर समय बिताने और गतिविधि समझने के बाद रिपोर्टर ने एक बच्चे से पूछा कि वे पढ़ाई क्यों नहीं करते, ये सब क्यों बेच रहे हैं। एक लडक़ी ने जवाब दिया यही हमारी सरकारी नौकरी है .वह यह काम खुद नहीं करना चाहती लेकिन उसके मम्मी-पापा जबरदस्ती उसे भेजते हैं। न जाने पर मारते हैं। मम्मी-पापा खुद कूड़ा बीनने का काम करते हैं और समता कॉलोनी में रहते हैं।
सात दिनों के लिए जगह निर्धारित
जोड़ी बनी रहेजोड़ी बहुत अच्छी है.जैसे जुमले बोलकर बच्चे से लेकर महिलाएं तक रुपए मांगती हैं। एक बुजुर्ग महिला भी यहां भीख मांगते हुए दिखी। बात करने पर पता चला कि वह पिछले कई सालों से भीख मांग रही हैं। गंज की रहने वाली हैं और हर दिन अलग-अलग इलाकों में भीख मांगने के लिए जाती हैं। सोमवार को रावतपुरा, मंगलवार को मंदिरों के बाहर, बुधवार को मोतीबाग, गुरुवार को स्टेशन और इसी तरह हर दिन की एक तय जगह होती है। डेली 500 से 700 रुपये तक की कमाई हो ही जाती है।
रिकॉर्ड में 10 हजार से ज्यादा भिखारी
भीख मांगने वालों द्वार से भिखारियों को बिना भीख दिये लौटाने वालों पर भी करारी चोट करती हैं। साथ ही यह उस शहर, समाज और देश पर धब्बा हैं जहां की अर्थव्यवस्था दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो। जहां के इंडस्ट्रिलिस्ट्स दुनिया के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट में टॉप पर होंंऔर भिक्षावृत्ति कानूनन अपराध हो। भिक्षावृत्ति रोकने और भिखारी उन्नमूलन के लिए विभाग और अधिकारी नियुक्त हों। हर बच्चे को पढ़ाने के राइट टू एजूकेशन एक्ट और उस पर अरबों रुपए सालाना खर्च किए जा रहे हों। इसके बाद भी आखिर वो क्या वजह हैं कि भिखारियों की संख्या बढ़ती जा रही है। हर सडक़, चौराहा, गली, कूचे, बाजार, मॉल, दुकान और ट्रेनों में भी भीख मांगते हुए जवान, बूढ़े, औरतों, बच्चों को देखा जा सकता है। 2022 के आंकड़ों के मुताबिक, 6700 भिखारी थे, जो अब 10 हजार के ऊपर पहुंच चुके हैं। वहीं हकीकत में इनकी संख्या इससे कहीं ज्यादा है। जो बाहर से आने वाले मेहमानों के सामने शहर की छवि को खराब करते हैं।





