
जगदलपुर। लंबे समय तक माओवादी हिंसा के साए में दबी रही बस्तर की धरती अब नई कहानी लिख रही है। गोलियों की गूंज थमने लगी है और उसकी जगह जंगलों में फिर ‘लाइट, कैमरा, एक्शन’ की आवाजें लौट आई हैं। अबूझमाड़ से दक्षिण बस्तर तक फिल्मकार नए दृश्य तलाश रहे हैं। कहीं ‘दण्डा कोटुम’ की शूटिंग जारी है, तो हाल ही में रिलीज माटी ने खूब चर्चा बटोरी। ‘ढोलकल’, ‘आरजे बस्तर’ और मुंदरा मांझी पर आधारित फिल्में भी कतार में हैं। सुरम्य प्रकृति और आदिवासी संस्कृति बस्तर को फिर फिल्मों का प्रिय ठिकाना बना रही है।
छत्तीसगढ़ी फिल्मकार अमलेश नागेश कहते हैं, ‘मैं ऐसी फिल्म बनाना चाहता हूं, जो केवल मनोरंजन न दे बल्कि अबूझमाड़ की असल पहचान को दुनिया के सामने रखे। इसी वजह से मैंने दण्डा कोटुम की शूटिंग के लिए अबूझमाड़ को चुना।
इसी का परिणाम है कि कभी माओवादी गतिविधियों का गढ़ माने जाने वाले मसपुर, गारपा और होरादी गांवों में कैमरे घूम रहे हैं, लाइटें जल रही हैं और स्थानीय लोग अभिनय कर रहे हैं। अमलेश की फिल्म यूनिट में करीब 150 सदस्य हैं, जिनमें कई स्थानीय कलाकार और ग्रामीण युवा शामिल हैं। गांव की महिलाएं फिल्म क्रू के लिए भोजन बना रही हैं, बच्चे सेट पर कलाकारों के पीछे-पीछे दौड़ते हैं।





