छत्तीसगढ़

विपक्षी विरोध के बावजूद मानसून सत्र हमें बहुत कुछ दे गया: बृजमोहन अग्रवाल

Shantanu Roy
31 Aug 2025 10:02 PM IST
विपक्षी विरोध के बावजूद मानसून सत्र हमें बहुत कुछ दे गया: बृजमोहन अग्रवाल
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छग
संसद का मानसून सत्र 21 अगस्त 2025 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। यह सत्र 21 जुलाई से शुरू होकर 21 अगस्त तक चला। इस दौरान 32 दिनों में कुल 21 बैठकें हुईं। सत्र में 14 विधेयक लोकसभा में पेश किए गए, एक विधेयक वापस लिया गया और 15 विधेयक लोकसभा और राज्यसभा दोनों से पारित हुए। बार-बार के व्यवधानों के चलते सदनों की प्रोडक्टिविटी प्रभावित रही। लोकसभा की उत्पादकता लगभग 31 प्रतिशत रही,जिसमें 120 घंटे के कुल समय में से केवल 37 घंटे की ही कार्यवाही हो पाई, जबकि राज्यसभा की उत्पादकता लगभग 39 प्रतिशत रही, जिसमें कुल 41 घंटे 15 मिनट तक ही काम हो पाया। सत्र के दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई, जिनमें पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद शुरू किए गए
ऑपरेशन सिंदूर
पर विस्तृत बहस शामिल रही। लोकसभा में इस मुद्दे पर 18 घंटे 41 मिनट तक चर्चा हुई, जिसमें 73 सांसदों ने भाग लिया और प्रधानमंत्री ने जवाब दिया, जबकि राज्यसभा में 16 घंटे 25 मिनट की चर्चा के दौरान 65 सांसदों ने हिस्सा लिया और गृहमंत्री ने जवाब दिया। विपक्ष के तमाम विरोध के बाद भी यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की जन कल्याणकारी सरकार द्वारा सत्र में कई अहम विधेयक पारित किए गए, जिनमें आयकर (संशोधन) विधेयक 2025, राष्ट्रीय खेल संचालन विधेयक 2025, ऑनलाइन गेमिंग (प्रोत्साहन और विनियमन) विधेयक 2025, पोर्ट्स और शिपिंग से जुड़े पांच विधेयक, भारतीय प्रबंधन संस्थान (संशोधन) विधेयक 2025 और खनन एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक 2025 शामिल हैं। दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक 2025 और जन विश्वास (संशोधन) विधेयक 2025 को चयन समिति के पास भेजा गया, जबकि संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025, केंद्रशासित प्रदेश शासन (संशोधन) विधेयक 2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025 को संयुक्त समिति को सौंपा गया।
इसके अलावा मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को 13 अगस्त 2025 से अगले छह महीने के लिए बढ़ाने की मंजूरी दी गई और राज्य का बजट एवं विनियोग विधेयक भी पारित किया गया। भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री के अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर पहुंचने और ‘विकसित भारत 2047’ में अंतरिक्ष कार्यक्रम की भूमिका पर भी चर्चा शुरू हुई, लेकिन बार-बार के व्यवधान के कारण यह पूरी नहीं हो सकी। सत्र के दौरान पारित किये गए कुछ प्रमुख संशोधन) विधेयकों की जानकारी इस प्रकार है। आयकर (संशोधन) विधेयक 2025:आयकर विधेयक, 2025, 12 अगस्त को संसद की पारित किया गया। नया अधिनियम कोई नई कर दर लागू नहीं करता है और केवल भाषा को सरल बनाता है, जो जटिल आयकर कानूनों को समझने के लिए आवश्यक था। नया कानून अनावश्यक प्रावधानों और पुरानी भाषा को हटाता है तथा आयकर अधिनियम 1961 में धाराओं की संख्या 819 से घटाकर 536 कर देता है तथा अध्यायों की संख्या 47 से घटाकर 23 कर देता है। नये आयकर अधिनियम में शब्दों की संख्या 5.12 लाख से घटाकर 2.6 लाख कर दी गई है, तथा पहली बार इसमें स्पष्टता बढ़ाने के लिए 1961 के कानून के सघन पाठ के स्थान पर 39 नई सारणियां और 40 नए सूत्र शामिल किए गए हैं।
नए आयकर कानून में टीडीएस, छूट और अन्य जटिल अनुपालनों को सुव्यवस्थित करने की बात कही गई है। यह कानून देरी से दाखिल किए गए आयकर रिटर्न के मामलों में भी बिना किसी दंड के रिफंड का दावा करने की अनुमति देता है। नया संशोधित आयकर बिल लोकसभा में ऐसे समय में पारित किया गया जब विपक्षी दल बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में बरती जा रही अनियमितताओं के आरोपों के विरोध में हंगामा कर रहे थे।
राष्ट्रीय खेल संचालन विधेयक 2025: इस अधिनियम में राष्ट्रीय खेल निकायों की स्थापना का प्रावधान है राष्ट्रीय ओलंपिक समिति, राष्ट्रीय पैरालंपिक समिति जैसे निकायों को राज्य और जिला स्तर पर सहयोगी इकाइयां स्थापित करनी होंगी. इन निकायों को नैतिकता संहिता बनानी होगी, साथ ही शिकायतों का निपटारा करने के लिए भी एक समिति का गठन करना होगा। राष्ट्रीय खेल प्रशासन अधिनियम में राष्ट्रीय खेल बोर्ड की स्थापना का प्रावधान है। ये खेल बोर्ड राष्ट्रीय खेल एसोसिएशंस को मान्यता देने और उनके संचालन पर निगरानी रखेगा। खेल बोर्ड महासंघों में चुनावी गड़बड़ी, वित्तीय गड़बड़ी जैसे मुद्दों की जांच करेगा, अगर कुछ भी गलत पाया गया तो राष्ट्रीय खेल बोर्ड के पास खेल एसोसिएशंस की मान्यता तक रद्द करने की शक्ति होगी।राष्ट्रीय खेल प्रशासन अधिनियम के तहत नेशनल स्पोर्ट्स ट्राइब्यूनल की स्थापना का भी प्रावधान है, जिसे सिविल कोर्ट की शक्तियां मिलेंगी। ये ट्राइब्यूनल खिलाड़ियों के चयन से जुड़े विवाद, महासंघ के चुनाव से जुड़े मामले और दूसरे प्रशासनिक मुद्दों के निपटारे करेगा। ये ट्राइब्यूनल लंबे समय तक चलने वाली कानूनी लड़ाइयों को कम करेगा जिससे खिलाड़ियों के करियर पर आंच नहीं आएगी। राष्ट्रीय खेल प्रशासन अधिनियम के पारित होने के बाद अब राष्ट्रीय खेल निकायों को सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया गया है। हालांकि, बीसीसीआई को छूट दी गई है, क्योंकि वो सरकार से कोई मदद नहीं लेती है। राष्ट्रीय खेल प्रशासन अधिनियम के तहत अब खेल निकायों में अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष के पदों के लिए तीन लगातार कार्यकाल की सीमा निर्धारित कर दी गई है। कार्यकारी समिति की अधिकतम संख्या 15 तक सीमित होगी, ताकि संस्थान पर वित्तीय बोझ ना पड़े।
ऑनलाइन गेमिंग (प्रोत्साहन और विनियमन) विधेयक 2025: संसद द्वारा 21 अगस्त 2025 को पारित ऑनलाइन गेमिंग संवर्धन एवं विनियमन विधेयक नागरिकों को ऑनलाइन मनी गेम्स के खतरे से बचाने के साथ-साथ अन्य प्रकार के ऑनलाइन गेम्स को बढ़ावा देने और विनियमित करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम है। यह कानून त्वरित धन कमाने के भ्रामक वादों पर फलने-फूलने वाले शिकारी गेमिंग प्लेटफॉर्म्स की लत, वित्तीय बर्बादी और सामाजिक संकट को रोकने के लिए बनाया गया है। यह डिजिटल अर्थव्यवस्था को सुरक्षित और
रचनात्मक विकास
की ओर ले जाते हुए परिवारों की सुरक्षा के सरकार के संकल्प को दर्शाता है। इस मुद्दे की गंभीरता को दुनिया भर में पहचाना जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने अंतर्राष्ट्रीय रोग वर्गीकरण में गेमिंग डिसऑर्डर को एक स्वास्थ्य स्थिति के रूप में वर्गीकृत किया है, और इसे नियंत्रण खोने,अन्य दैनिक गतिविधियों की उपेक्षा करने और हानिकारक परिणामों के बावजूद लगातार खेलने की एक प्रवृत्ति के रूप में वर्णित किया है।विधेयक इस बात पर प्रकाश डालता है कि भारत में भी निर्णायक कार्रवाई क्यों आवश्यक है।
ऑनलाइन मनी गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म ने व्यापक नुकसान पहुँचाया है। परिवारों ने अपनी जमा-पूंजी गँवा दी है। युवा लोग इसकी लत में फँस गए हैं। कुछ हृदयविदारक मामलों में, इन खेलों से जुड़ी आर्थिक तंगी के कारण आत्महत्याएँ भी हुई हैं। सरकार ने इन खतरों को पहचाना है और कड़े कानून बनाकर इनका समाधान किया है।साथ ही, विधेयक एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाता है। यह ऑनलाइन गेमिंग क्षेत्र को डिजिटल और रचनात्मक अर्थव्यवस्था के सबसे गतिशील क्षेत्रों में से एक मानता है, जिसमें नवाचार, संज्ञानात्मक विकास, रोज़गार सृजन, तकनीकी उन्नति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के महत्वपूर्ण अवसर हैं। यह ई-स्पोर्ट्स को प्रोत्साहित करता है, जो संगठित प्रतिस्पर्धी वीडियो गेम हैं, और सुरक्षित ऑनलाइन सामाजिक और शैक्षिक खेलों को बढ़ावा देता है। यह रचनात्मक डिजिटल मनोरंजन को सट्टेबाजी,जुए और काल्पनिक धन वाले खेलों से स्पष्ट रूप से अलग करता है जो लाभ के झूठे वादों के साथ उपयोगकर्ताओं का शोषण करते हैं। ऐसा करके विधेयक यह सुनिश्चित करता है कि भारत डिजिटल नवाचार के लाभों को अपना सके और साथ ही अपने लोगों को ऑनलाइन गेमिंग के नकारात्मक पक्ष से बचा सके।
ऑनलाइन मनी गेम्स के तेज़ी से बढ़ते प्रसार ने व्यक्तियों, परिवारों और राष्ट्र के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर दिए हैं। जहाँ डिजिटल तकनीक ने कई लाभ पहुँचाए हैं, वहीं इन खेलों ने कानूनी खामियों का फायदा उठाकर गहरा सामाजिक नुकसान पहुँचाया है। राज्यसभा में बोलते हुए, केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री, श्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि एक अनुमान के अनुसार, 45 करोड़ लोग ऑनलाइन मनी गेम्स से नकारात्मक रूप से प्रभावित हैं और इसके कारण उन्हें 20,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ है। सरकार ने इन कमियों को दूर करने और नागरिकों की सुरक्षा के लिए कदम उठाए हैं।
पोर्ट्स और शिपिंग से जुड़े पांच विधेयक :सत्र में पांच बड़े समुद्री विधेयक पारित हुए हैं, जिन्हें भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था और व्यापार जगत के लिए ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। इन नए कानूनों का उद्देश्य औपनिवेशिक युग के पुराने समुद्री कानूनों की जगह आधुनिक और वैश्विक मानकों के अनुरूप नियम लागू करना है, जिससे न केवल व्यापार आसान होगा बल्कि लागत में भी कमी आएगी। केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल के अनुसार पारित हुए नए कानूनों में बिल ऑफ लैडिंग 2025, कैरिज ऑफ गुड्स बाय सी बिल 2025, कोस्टल शिपिंग बिल 2025, मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 और इंडियन पोर्ट्स बिल 2025 शामिल हैं. ये सभी कानून क्रमशः 1925, 1958 और 1908 के पुराने औपनिवेशिक कानूनों को बदल देंगे। बिल ऑफ लैडिंग 2025 का उद्देश्य कानूनी दस्तावेजों को सरल बनाना है, ताकि आयात-निर्यात के दौरान विवाद कम हों और व्यापारियों को लेन-देन में आसानी हो। वहीं कैरिज ऑफ गुड्स बाय सी बिल 2025 हेग-विस्बी नियमों को अपनाकर मुकदमेबाजी कम करने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत बनाने में मदद करेगा। कोस्टल शिपिंग बिल 2025 भारत के 6% तटीय नौवहन हिस्सेदारी को पुनर्जीवित करने पर केंद्रित है। इससे हर साल लगभग 10,000 करोड़ रुपये की रसद लागत बचत होगी, साथ ही सड़क यातायात और प्रदूषण दोनों में कमी आएगी। मर्चेंट शिपिंग बिल 2025 वैश्विक मानकों के अनुरूप जहाजों की सुरक्षा, नाविकों के कल्याण और समुद्री पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित है। इसमें जहाज़ दुर्घटनाओं में मलबा हटाने और बचाव कार्यों को तेज़ बनाने का भी प्रावधान है।
इंडियन पोर्ट्स बिल 2025 के तहत राज्य समुद्री बोर्डों को छोटे बंदरगाहों के प्रबंधन की अधिक शक्ति दी जाएगी। इससे स्थानीय स्तर पर विवादों का समाधान होगा और डिजिटल पोर्ट सिस्टम के माध्यम से पारदर्शिता और निवेश बढ़ेगा। मंत्री सोनोवाल के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी के सागरमाला विज़न के तहत 11,000 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा भारत की ब्लू इकोनॉमी के लिए नए अवसर खोलेगी। इससे न केवल निर्यात-आयात बढ़ेगा बल्कि रोजगार और निवेश के अवसर भी मिलेंगे। ये नए कानून भारत के लिए न सिर्फ समुद्री व्यापार को सस्ता और आसान बनाएंगे, बल्कि देश को वैश्विक समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाएंगे। भारतीय प्रबंधन संस्थान (संशोधन) विधेयक 2025: भारतीय प्रबंधन संस्थान (संशोधन) विधेयक, 2025 18 अगस्त, 2025 को लोकसभा में पेश किया गया। यह विधेयक भारतीय प्रबंधन संस्थान अधिनियम, 2017 में संशोधन का प्रयास करता है। यह अधिनियम भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान घोषित करता है और उनके कामकाज को विनियमित करता है। खनन एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक 2025: इसका उद्देश्य महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों पर विशेष ध्यान देते हुए भारत के खनिज क्षेत्र को और अधिक उदार और आधुनिक बनाना है। विधेयक के जरिये मूल खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 में संशोधन किया गया है। संशोधन विधेयक में खनन ढांचे को आधुनिक बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए हैं, जिसमें खनन पट्टाधारक अब अतिरिक्त रायल्टी का भुगतान किए बिना अपने मौजूदा परिचालन में नए खनिजों, विशेष रूप से लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे महत्वपूर्ण खनिजों को शामिल कर सकते हैं। यह विधेयक गहरे खनिजों के लिए खनन क्षेत्रों के एकमुश्त विस्तार की अनुमति देता है और कैप्टिव खदानों से खनिजों की बिक्री पर 50 प्रतिशत की सीमा हटाता है। राज्यों को खनिज भंडारों की बिक्री की अनुमति देने का भी अधिकार देता है। इसके अलावा सरकार ने 24 महत्वपूर्ण और रणनीतिक खनिजों की पहचान की है और घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए 34,000 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन (एनसीएमएम) शुरू किया है।
दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक 2025 का उद्देश्य लगातार आ रही बाधाओं को दूर करना, प्रक्रियात्मक दक्षता बढ़ाना, लेनदारों को सशक्त बनाना और भारतीय दिवाला पारिस्थितिकी तंत्र को सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं के अनुरूप बनाना है। जन विश्वास (संशोधन) विधेयक 2025 : इस विधेयक का उद्देश्य 16 केंद्रीय अधिनियमों के 355 प्रावधानों में संशोधन करके उनकी प्रयोज्यता को आसान बनाना है। इनमें से 288 प्रावधानों को गैर-अपराधीकरण करने और 67 प्रावधानों में 'जीवन की सुगमता' को सुगम बनाने के लिए संशोधन का प्रस्ताव है। सरकार ने सदन के अध्यक्ष से इस विधेयक को समीक्षा के लिए प्रवर समिति को भेजने का अनुरोध किया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार यह विधेयक जन विश्वास (प्रावधानों में संशोधन) अधिनियम, 2023 पर आधारित होगा, जो विभिन्न अधिनियमों में छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाला पहला समेकित कानून था। 11 अगस्त 2023 को अधिसूचित 2023 अधिनियम ने 19 मंत्रालयों या विभागों द्वारा प्रशासित 42 केंद्रीय अधिनियमों के 183 प्रावधानों को अपराधमुक्त कर दिया। 2025 के कानून में प्रस्तावित संशोधनों की मुख्य विशेषता यह है कि पहली बार उल्लंघन करने पर केवल 10 अधिनियमों के तहत 76 अपराधों के लिए सलाह या चेतावनी दी जाएगी। इसके अलावा मामूली, तकनीकी या प्रक्रियात्मक चूक के लिए कारावास की धाराओं को मौद्रिक दंड या चेतावनी से बदल दिया जाएगा। दंड भी "आनुपातिक" बनाए जाएँगे, और बार-बार अपराध करने पर दंड धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025: यह दोषसिद्धि से पहले 'सत्ता के नैतिक मानदंड' की रक्षा करता है। ठीक उसी तरह जैसे सिविल सेवाओं में 48 घंटे से अधिक की हिरासत पर 'डीम्ड सस्पेंशन' लागू हो जाता है। वस्तुतः विधेयक में कहा गया है कि कोई भी मंत्री जो किसी गंभीर अपराध के लिए 30 दिनों तक जेल में रहेगा, वह अपना पद खो देगा। कोई मंत्री, जो इस पद पर रहते हुए लगातार तीस दिनों की किसी अवधि के दौरान, किसी भी समय प्रवृत्त कानून के तहत कोई अपराध करने के आरोप पर गिरफ्तार किया जाता है और हिरासत में रखा जाता है, जो पांच वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है, उसे ऐसी हिरासत में लिए जाने के बाद, इकतीसवें दिन तक मुख्यमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा उसके पद से हटा दिया जाएगा। विधेयक में कहा गया है कि, "बशर्ते कि यदि ऐसे मंत्री को हटाने के लिए मुख्यमंत्री की सलाह इकतीसवें दिन तक राष्ट्रपति को नहीं दी जाती है, तो वह उसके बाद आने वाले दिन से मंत्री नहीं रह जाएगा। यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 75 में संशोधन करेगा, जो मुख्य रूप से प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद की नियुक्ति और जिम्मेदारियों से संबंधित है। विधेयक के प्रावधानों के तहत, सैद्धांतिक रूप से यह संभव है कि संबंधित मंत्री को जेल से बाहर आने के बाद पुनः नियुक्त किया जा सके।
केंद्रशासित प्रदेश शासन (संशोधन) विधेयक 2025: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने लोकसभा में संविधान (एक सौ तीसवां संशोधन) विधेयक, 2025, केंद्र शासित प्रदेश (संशोधन) विधेयक, 2025 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक, 2025 पेश किया।
देश में राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी सरकार की प्रतिबद्धता और जनता के आक्रोश के जवाब में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया।
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्री जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति जेल में रहते हुए सरकार नहीं चला पाएंगे।
इस विधेयक का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के गिरते मानकों को ऊपर उठाना और राजनीति में ईमानदारी लाना है। हाल के वर्षों में, देश में एक आश्चर्यजनक स्थिति पैदा हुई है जहाँ मुख्यमंत्रियों या मंत्रियों ने बिना इस्तीफा दिए अनैतिक रूप से जेल से सरकार चलाई है। देश की जनता को यह तय करना होगा कि क्या किसी मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का जेल से सरकार चलाना उचित है? एक तरफ मोदी जी ने खुद को कानून के दायरे में लाने के लिए संविधान संशोधन पेश किया है, वहीं दूसरी तरफ पूरा विपक्ष कानून के दायरे से बाहर रहकर जेल से सरकार चलाने के लिए इसका विरोध कर रहा है। मुख्य विपक्षी दल की नीति संविधान में संशोधन करके प्रधानमंत्री को कानून से ऊपर रखने की है, जबकि हमारी पार्टी प्रधानमंत्री, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों को कानून के दायरे में ला रही है। भ्रष्ट व्यक्तियों को बचाने के लिए विपक्षी गठबंधन ने जिस अशिष्ट व्यवहार के साथ इस विधेयक का विरोध किया है, उसने विपक्ष को पूरी तरह से बेनकाब कर दिया है। जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025: यदि जम्मू-कश्मीर में किसी मंत्री को पांच वर्ष या उससे अधिक कारावास की सजा वाले अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रखा जाता है, तो उसे पद से हटाया जाना चाहिए।उपराज्यपाल (एलजी) मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्री को हटाएंगे।यदि मुख्यमंत्री कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, तो मंत्री 31वें दिन से स्वतः ही पद पर नहीं रहेंगे। यदि मुख्यमंत्री को इसी तरह के आरोपों में गिरफ्तार कर 30 दिनों के लिए हिरासत में रखा जाता है, तो उन्हें 31वें दिन तक इस्तीफा देना होगा। यदि इस्तीफा नहीं दिया जाता है तो अगले दिन से मुख्यमंत्री स्वतः ही पद खो देंगे। विधेयक में यह प्रावधान किया गया है कि इस प्रावधान के तहत हटाए गए मंत्री या मुख्यमंत्री को हिरासत से रिहाई के बाद उपराज्यपाल की मंजूरी के अधीन पुनः नियुक्त किया जा सकता है। सरकार का तर्क है कि मंत्रियों को आचरण के उच्च मानकों को बनाए रखना चाहिए और संदेह से मुक्त रहना चाहिए। वर्तमान में, 2019 जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम में गंभीर आपराधिक आरोपों में हिरासत में लिए गए किसी मुख्यमंत्री या मंत्री को हटाने का कोई प्रावधान नहीं है। संशोधन का उद्देश्य संवैधानिक नैतिकता, सुशासन और सार्वजनिक विश्वास की रक्षा के लिए इस अंतर को समाप्त करना है। यदि वरिष्ठ नेताओं को राजनीतिक रूप से आरोपित परिस्थितियों में गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है तो इस कदम का जम्मू-कश्मीर सरकार की स्थिरता पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। यह उपराज्यपाल को निष्कासनों के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका प्रदान करता है, जिसमें राजनीतिक विलंब की सीमित गुंजाइश होती है। पर्यवेक्षक इसे राजनीतिक नियंत्रण के एक उपकरण के रूप में देखते हैं, जबकि समर्थक इसे स्वच्छ शासन की दिशा में एक कदम के रूप में देख सकते हैं।
बृजमोहन अग्रवाल, रायपुर लोकसभा सांसद, पूर्व कैबिनेट मंत्री छत्तीसगढ़ सरकार
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