कोयला व्यवसायी ने दिखाया कच्चा बिल, हाईकोर्ट ने कहा - इस आधार पर किसी को भी नहीं मान सकते कर्जदार

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक फैसले में साफ किया है कि केवल हिसाब-किताब की कॉपियों के भरोसे किसी पर देनदारी नहीं डाली जा सकती। कोर्ट ने कहा कि खाते तो एकतरफा होते हैं, जब तक माल की डिलीवरी का पक्का सबूत न हो, तब तक पैसा नहीं मांगा जा सकता। यह विवाद एक कोयला व्यापारी (लालवानी एंड संस) और ईंट भट्ठा चलाने वाली एक फर्म (चीमा ब्रिक्स) के बीच का है। लालवानी एंड संस का कहना था कि उन्होंने साल 2011 से 2013 के बीच लाखों का कोयला उधार दिया था। व्यापारी के मुताबिक, सारा हिसाब काटने के बाद भी उनके 21 लाख रुपये से ज्यादा बकाया निकल रहे थे। जब निचली अदालत ने उनका दावा खारिज कर दिया, तो वे हाई कोर्ट पहुंचे।
हाई कोर्ट में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने इस केस की बारीकी से जांच की। सुनवाई के दौरान सामने आया कि व्यापारी के पास अपनी बात साबित करने के लिए कोई ठोस स्वतंत्र सबूत नहीं था। अदालत ने पाया कि व्यापारी ने असली रजिस्टर या कैश बुक कोर्ट में पेश नहीं की, बस कंप्यूटर से निकले पन्ने थमा दिए। जिस ऑडिट रिपोर्ट का हवाला दिया गया, उसे इनकम टैक्स विभाग में जमा ही नहीं किया गया था। यह भी साबित नहीं हो पाया कि कोयला ले जाने वाले ट्रक वाकई में सामने वाली पार्टी के ही थे।
अदालत ने कानून (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी के भी नाम के आगे पैसे लिखकर उसे कर्जदार नहीं बना सकता। कोर्ट ने पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि बही-खाते केवल मदद के लिए होते हैं, वे खुद में पूरा सबूत नहीं हैं। इंसान अपने फायदे के लिए पीठ पीछे कुछ भी लिख सकता है, इसलिए लेनदेन का अलग से सबूत देना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने व्यापारी की अपील खारिज कर दी। अदालत ने माना कि दूसरी पार्टी (ईंट भट्ठा फर्म) के पास बैंक की पर्चियां और बेहतर सबूत थे।





