लाल लड़ाकों से बस्तर को मिली मुक्ति, अब वहां अनगिनत विकास का दौर

रजत जयंती महोत्सव
बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में कई इलाके ऐसे थे, जहां पुलिस और प्रशासन की पहुंच नहीं थी. इन इलाकों में लाल आतंक की सरकार का राज था. हालांकि, फोर्स ने बीते कुछ महीनों में नक्सलियों के सबसे मजबूत गढ़ में घुस कर अपने कैंप स्थापित किए हैं। इससे पहले नक्सली इन बीहड़ों में आजादी के पर्व पर काले झंडे फहराते थे, लेकिन जवानों के शौर्य के चलते सुकमा, बीजापुर और नारायणपुर जिले के कई गांवों में पहली बार तिरंगा लहराया. सरकार के ठोस कदम से फोर्स के इन गांवों में पहुंचने के बाद यहां की तस्वीर और तकदीर बदल रही है।
तीन दशकों के आतंक और दहशत का खत्म हो रहा दौर, छत्तीसगढ़ में तेजी से सिमट रहा नक्सली हिंसा का दायरा
आदिवासी बाहुल्य आबादी, अनुपम नैसर्गिक सुंदरता और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर बस्तर में आज विकास का सबसे बड़ा अवरोधक है नक्सलवाद। पिछले 4 दशकों में नक्सली हिंसा ने यहां अपने पैर पसारे। बंदूक के दम पर हिंसा के साथ विकास कार्यों में बाधा पहुंचाई। नक्सलियों ने अपने झूठे और खोखले सिद्धांतों के जरिए लंबे समय तक भोले- भाले आदिवासियों को भ्रम में डाला। हिंसा का सहारा लेकर उन्हें डराने की कोशिश की। बच्चों से उनके स्कूल छीने, उनका बचपन छीन, उन्हें हिंसा के राह पर धकेला। कई परिवारों को बर्बाद किया, सुहागनों के सिंदूर उजाड़े। बेटियों को अगवा किया और उन्हें भी हिंसा के रास्ते पर ले गए। इसी वजह से संसाधनों से परिपूर्ण बस्तर पर देश के सबसे पिछड़े इलाकों में एक होने का धब्बा लगा। लेकिन अब छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व वाली सरकार दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ विकास के इस अवरोध को पूरी तरह से समाप्त करने पर डटी हुई है। अब वह दिन दूर नहीं जब नक्सलवाद की काली छाया छत्तीसगढ़ से पूरी तरह मिट जाएगी। बस्तर में विकास का नया सवेरा अब होने ही वाला है। यहां नक्सलवाद की कमर टूट चुकी है, अब बस इसका समूल खात्मा बाकी है, जिसकी डेट लाइन भी तय हो चुकी है। मजबूर आदिवासी ग्रामीणों पर हुए इन अत्याचारों का अब हिसाब- किताब होने वाला है। उन्हें अब न्याय मिलेगा। उन्हें अब अपना खुशहाल बस्तर मिलेगा, जो इन हिंसा वादियों के चंगुल से पूरी तरह मुक्त होगा और विकास के रास्ते पर पूरी गति से आगे बढ़ेगा। छत्तीसगढ़ में सिमटते हुए नक्सली उग्रवाद के अतीत पर अगर गौर करें तो यह बेहद दर्दनाक रहा है। नक्सली हिंसा की वजह से बस्तर के स्थानीय लोगों ने करीब चार दशकों तक बहुत कुछ सहा है। बहुत सी ऐसी कड़वी यादें हैं जो कभी भी भुलाई नहीं जा सकतीं, और इन्हें जब भी याद कर करें तो नक्सली हिंसा को परास्त करने का हौसला और भी मजबूत हो जाता है। पुलिस और सुरक्षा बलों के जवान पूरे हौसले के साथ नक्सल मोर्चे पर डटे हैं और अब जल्द ही नक्सलियों का समूल अंत होगा।
बारूदी सुरंगें बिछाकर फैलाई तबाही
विकास के विरोधी रहे नक्सली नहीं चाहते कि बस्तर में किसी भी तरह का अधोसंरचना विकास हो, इसलिए वह विस्फोटकों का सहारा लेकर पुल- पुलिया, सड़कों और सड़क निर्माण में लगे वाहनों- मशीनरी को तबाह करते। इसके साथ ही बस्तर में जगह- जगह बारूदी सुरंगें बिछाकर मानवता को भी तबाह करने की कोशिश की। उनके बिछाए बारूदी सुरंगों की चपेट में आने से सुरक्षा बलों के जवानों सहित कई निर्दोष ग्रामीणों व बेजुबान मवेशियों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। इन बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय कर नष्ट करना बड़े-बड़े चुनौती भी रही। इस प्रक्रम में बड़ी कुर्बानी भी हमारे पुलिस व सुरक्षा बलों के जवानों को देनी पड़ी है। वर्ष २००३ से अब तक आईईडी के चपेट में आने से कुल १४७ लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि ३०६ लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं। वहीं अब तक कुल ४,१७३ लैंड माइंस रिकवर की गई हैं।
खुल रहे स्कूलों के द्वार
झूठे सिद्धांतों की दुहाई देने वाले नक्सली बच्चों की शिक्षा के भी घोर विरोधी रहे हैं। उन्हें हमेशा यह डर रहा है कि यदि बस्तर की नई पीढ़ी पढ़- लिखकर जागरूक हो जाएगी, तो उनके बहकावे में नहीं आएगी। इसी भय के चलते नक्सली शिक्षा के मंदिरों पर हमले करते, उन्हें तोड़ते और बच्चों को स्कूल जाने से रोकते थे। विगत 20 वर्षों में नक्सलियों ने 200 से अधिक स्कूल भवनों को क्षतिग्रस्त किया। अब बस्तर संभाग में करीब साढ़े तीन सौ बंद पड़े स्कूलों को दोबारा शुरू किया गया है।
बस्तर के इतिहास में लाल रंग में दर्ज हैं यह तारीखें
28 फरवरी 2006
दरभागुड़ा, जिला- सुकमा
ग्राम दोरनापाल में नेता प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा के नेतृत्व में आयोजित सलवा जुडूम जन जागरण अभियान से 4 ट्रकों में कोंटा के ग्रामीण अपने अपने गांव वापस हो रहे थे, कि एर्राबोर थाना क्षेत्र के ग्राम दरभागुड़ा के समीप नक्सलियों द्वारा बारूदी सुरंग विस्फोट किया गया, जिसमें 28 ग्रामीणों की मौके पर ही मौत हो गई। घटना में अन्य 27 ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हुए थे। 3 ट्रकों को आग के हवाले कर दिया गया था।
24 मार्च 2006 संगम, जिला- सुकमा
थाना पखांजूर क्षेत्र के ग्राम संगम में साप्ताहिक बाजार से ग्रामीण बाजार कर जीप से पखांजूर लौट रहे थे। इसी दौरान घोडागांव एवं संगम गांव के मध्य नक्सलियों द्वारा बम विस्फोट कर जीप को उड़ा दिया गया। इस घटना में १३ ग्रामीणों की मौत हो गई और ४ ग्रामीण घायल हुए थे।
25 अप्रैल 2006
मनीकोंटा, जिला- सुकमा
थाना दोरनापाल के राहत शिविर में रह रहे ग्राम मनीकोंटा के 40 - 60 ग्रामीण सामान लेकर वापस आ रहे थे, कि नक्सली उन्हें अगुआ कर पकड़ ले गए। नक्सलियों ने इनमें से 15 ग्रामीणों की हत्या कर दी थी।
16 जुलाई 2006
एर्राबोर, जिला- सुकमा
थाना एर्राबोर राहत शिविर कैंप में अज्ञात लगभग डेढ़ हजार नक्सली व संघम सदस्यों द्वारा गोलीबारी के साथ हमला कर दिया। नक्सलियों द्वारा २२० घरों को आग के हवाले कर दिया था, जिससे राहत शिविर में रह रहे 6 एसपीओ, 1 स्वास्थ्य कार्यकर्ता व 17 ग्रामीण मारे गए थे। इनके अलावा 47 अपहृत ग्रामीणों में से 6 की हत्या कर दी गई और 20 घायल ग्रामीणों में से 3 ने ईलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
15 मार्च 2007
रानीबोदली, जिला- बीजापुर
नेशनल पार्क दलम के नक्सली कमाण्डर व करीब 500 अन्य नक्सलियों ने हथियार लूटने की नीयत से रानीबोदरी में सुरक्षा बलों के कैम्प पर सशस्त्र हमला किया। स्वचलित अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोली-बारी की गई, जिससे कैम्प तबाह हो गया और वहां तैनात छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल ९वीं वाहिनी सी कम्पनी कैम्प के ५५ जवान शहीद हो गए थे।
16 मई 2010
चिंगावरम, जिला- सुकमा
सुकमा से जिला पुलिस बल एवं एसपीओ की संयुक्त पुलिस पार्टी गादीरास थाना क्षेत्र में भूसारास से मुकमा की ओर लौट रही थी। इसी दौरान चिंगावरम के पास नक्सलियों द्वारा उस बस को निशाना बनाया गया जिसमें पुलिस जवान सवार थे। घटना में 11 आरक्षक, 1 एसएसबी वेटनरी फिल्ड असिस्टेंट व 4 एसपीओ शहीद हो गए थे। इस घटना में 15 निर्दोष ग्रामीण भी मारे गए।
6 अप्रैल 2010
ताड़मेटला, जिला- सुकमा
नक्सलियों द्वारा सीआरपीएफ कैम्पों के आसपास प्रभाव बनाकर स्वयं का प्रभुत्व स्थापित करने की सूचना पर चिंतलनार में तैनात 62 वीं वाहिनी सीआरपीएफ के बी कंपनी द्वारा एरिया डॉमिनेशन व नक्सली गश्त सर्चिग अभियान चलाया गया। अभियान के दौरान ताड़मेटला पहाड़ी जंगल क्षेत्र में नक्सलियों के साथ मुठभेड़ हुई। फोर्स की सहायता हेतु चित्तलनार कैम्प से अन्य पार्टी रवाना हुई थी, कि रास्ते में ही नक्सलियों द्वारा फायरिंग शुरू कर दी और बुलेट प्रुफ वाहन को विस्फोट कर क्षतिगस्त कर दिया। उक्त घटना में सीआरपीएफ के ७५ जवान व जिला पुलिस बल के १ प्रधान आरक्षक शहीद हुए थे।
29 जून 2010
राकस नाला, जिला- नारायणपुर
कैम्प थौड़ाई से केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल की पार्टी रोड ओपनिंग हेतु ग्राम झारा की ओर से वापस आ रही थी। इसी समय राकस नाला के पास पूर्व से घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने हथियार लूटने की नियत से अंधाधुन्ध फायरिंग की। पुलिस पार्टी द्वारा भी तत्काल पोजिशन लेते हुए फायर का जवाब दिया गया। इस घटना में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के २७ जवान शहीद हो गए थे।
9 जुलाई 2007
रेगड़गट्टा, जिला- सुकमा
थाना एर्राबोर से जिला बल सीआरपीएफ एवं एसपीओ के साथ दो पार्टी नक्सली गश्त- सर्चिंग हेतु रवाना हुई थी कि, एरांचोर से लगभग 12 - 15 किलोमीटर दूरी पर उत्पलमेटा पहाड़ी के पास नक्सली व पुलिस पार्टी के बीच मुठभेड़ हो गई। मुठभेड़ के दौरान जिला बल के २ जवान, ६ एसपीओ व सीआरपीएफ के 15, कुल 23 जवान शहीद हुए और 2 सीआरपीएफ जवान व 5 एसपीओ घायल हुए।
24 अप्रैल 2017
चिंतागुफा, जिला- सुकमा
बुरकापाल कैम्प से सीआरपीएफ के ७१ जवान और जिला बल का १ जवान संयुक्त बल रोड निर्माण पार्टी की सुरक्षा हेतु चिंतागुफा की ओर रवाना हुए थे। इसी बीच करीब 200 - 250 हथियार बंद नक्सलियों ने सुरक्षा बलों पर अत्याधुनिक व देशी हथियारों, गोला बारूद से हमला कर दिया। सुरक्षा बलों द्वारा जवाबी कार्यवाही की गई, लेकिन दुर्भाग्यवश घटना में सीआरपीएफ 74 वाहिनी के 25 जवान शहीद हो गए। इस घटना में नक्सली बड़ी तादाद में सुरक्षा बलों के हथियार भी लूट कर ले गए थे। लाल आतंक के खात्मे के लिए नक्सलवाद के खिलाफ हमारी निर्णायक लड़ाई जोर-शोर से जारी है, जिसका परिणाम है कि नक्सलियों की कमर अब टूट गई है। प्रदेश से जब तक नक्सलवाद का अंत नहीं हो जाता हम चुप नहीं बैठेंगे।
पिछले वर्षों में सुरक्षा बलों की नई रणनीति, शिविरों की स्थापना और लगातार दबाव के चलते नक्सली कैडर कमजोर हुआ है। आत्मसमर्पण नीतियों ने बड़ी संख्या में उग्रवादियों को मुख्यधारा में लौटाया है। वहीं सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि केवल सुरक्षा उपाय ही नहीं, बल्कि विकास ही स्थायी समाधान है। इसी कारण नियद नेल्ला नार योजना सहित सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाओं का तेजी से विस्तार हो रहा है।
प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा और अन्य योजनाओं से ग्रामीणों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने लगा है। ग्रामीणों का भरोसा जीतना इस ऐतिहासिक बदलाव का सबसे बड़ा आधार रहा है। स्वास्थ्य शिविर, शिक्षा और रोजगार के नए अवसर तथा प्रशासन का संवेदनशील रवैया ग्रामीणों को यह संदेश दे रहा है कि सरकार उनके साथ खड़ी है।





