छत्तीसगढ़

नशीली गोलियों की बरामदगी में 11 खामियां, भिलाई में आरोपी बरी

Shantanu Roy
3 Oct 2026 2:02 PM IST
नशीली गोलियों की बरामदगी में 11 खामियां, भिलाई में आरोपी बरी
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Bhilai. भिलाई। सेक्टर-6 में नशीली गोलियों की बरामदगी के मामले में अदालत ने आरोपी बी. पवन कल्याण को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश सुनीता टोप्पो की अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान जांच और बरामदगी की प्रक्रिया में सामने आई 11 खामियों को महत्वपूर्ण माना। अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता ज्ञान प्रकाश दांडेकर ने पैरवी की।
मामला 15 दिसंबर 2024 का है। पुलिस के मुताबिक, उसे आयकर भवन, सेक्टर-6 के पास नशीली गोलियां बेचे जाने की सूचना मिली थी। सूचना के आधार पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची और बी. पवन कल्याण को पकड़ने का दावा किया। तलाशी के दौरान उसके कब्जे से अल्प्राजोलम की 1280 गोलियां बरामद किए जाने की बात पुलिस ने कही थी। इस मामले में अपराध क्रमांक 510/2024 दर्ज किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान बरामद गोलियों के वजन को लेकर महत्वपूर्ण अंतर सामने आया। पुलिस ने जब्ती के समय 1280 गोलियों का वजन 153.06 ग्राम दर्ज किया था। बाद में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने हुई गिनती और जांच के दौरान इन्हीं 1280 गोलियों का वजन 294.98 ग्राम पाया गया। दोनों रिकॉर्ड के बीच 141.92 ग्राम का अंतर था। अदालत के सामने अभियोजन इस अंतर का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सका।
हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी इस मामले में 1280 गोलियां 61 पट्टियों में बरामद होने और उनका वजन 294.98 ग्राम दर्ज होने का उल्लेख है। वजन से जुड़े दस्तावेजों में अंतर ने बरामदगी की प्रक्रिया को लेकर अदालत के सामने सवाल खड़ा किया। सुनवाई के दौरान स्वतंत्र गवाहों की भूमिका भी अभियोजन के पक्ष में पूरी तरह नहीं रही। मामले के दोनों स्वतंत्र गवाह राधेश्याम और प्रदीप कुमार ठाकुर ने पुलिस कार्रवाई का पूरा समर्थन नहीं किया। इसके अलावा गोलियों का वजन करने वाले व्यक्ति को भी अभियोजन ने अदालत में गवाह के तौर पर पेश नहीं किया। मालखाने के मुंशी को गवाह नहीं बनाए जाने की बात भी सामने आई। इससे जब्त सामग्री को सुरक्षित रखने और उसकी कस्टडी की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे।
अदालत ने एफआईआर और मौके पर तैयार किए गए दस्तावेजों के क्रम को लेकर भी सवाल उठाया। एफआईआर 15 दिसंबर को शाम 5.21 बजे दर्ज की गई थी, लेकिन पुलिस के अनुसार मौके पर तैयार किए गए तौल पंचनामा, नमूना सील पंचनामा और जब्ती पत्रक में पहले से ही अपराध क्रमांक 510/2024 अंकित था। अदालत में यह सवाल सामने आया कि एफआईआर दर्ज होने से पहले तैयार बताए गए दस्तावेजों पर अपराध क्रमांक कैसे दर्ज हो गया। जांच में नमूना लेने की प्रक्रिया भी विवादित रही। पुलिस ने बरामद सभी पट्टियों से नमूने नहीं लिए। वहीं नमूने लेने की कार्रवाई में चार दिन का अंतर सामने आया। मुखबिर से प्राप्त सूचना को वरिष्ठ अधिकारी तक पहुंचाने के संबंध में भी पुलिस के बयानों और दस्तावेजों में एकरूपता नहीं मिली।
अदालत ने विवेचना से जुड़ी इन सभी कमियों को समग्र रूप से देखा। अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों में मौजूद विरोधाभासों और प्रक्रियागत कमियों के कारण आरोपी के खिलाफ आरोप पूरी तरह प्रमाणित नहीं हो सके। इसके बाद अदालत ने बी. पवन कल्याण को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। यह फैसला बरामदगी की प्रक्रिया, दस्तावेजों की विश्वसनीयता और जब्त सामग्री की कस्टडी से जुड़े कानूनी पहलुओं के महत्व को भी सामने लाता है। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराने के बजाय संदेह का लाभ दिया।
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