
बिहार: नालंदा जिले के रहने वाले दिव्यांग भारोत्तोलक झंडू कुमार ने संघर्ष, मेहनत और जुनून की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने पूरे देश को गौरवान्वित कर दिया है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित राष्ट्रमंडल खेल 2026 में झंडू कुमार ने पुरुष पैरा पावरलिफ्टिंग में 190 किलोग्राम वजन उठाकर कांस्य पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया। उनकी यह सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि इसके पीछे वर्षों का संघर्ष, आर्थिक तंगी और अपने सपनों को पूरा करने की जिद छिपी हुई है।
नालंदा जिले के हरनौत प्रखंड के सबनहुआ डीह गांव निवासी 28 वर्षीय झंडू कुमार ने अपनी प्रतिभा को निखारने के लिए कई कठिनाइयों का सामना किया। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उन्होंने खेल को अपना जुनून बनाया और देश के लिए पदक जीतने का सपना देखा। अपने प्रशिक्षण और शरीर को मजबूत बनाने के लिए जरूरी पौष्टिक आहार जुटाने के लिए उन्होंने परिवार की सहमति से अपना ई-रिक्शा और ठेला तक बेच दिया।
झंडू कुमार के परिवार की आर्थिक स्थिति लंबे समय से कमजोर रही है। उनके माता-पिता हरनौत बाजार में सब्जी की दुकान लगाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। झंडू भी जरूरत पड़ने पर माता-पिता की दुकान संभालते थे। घर का खर्च चलाने के लिए उन्होंने ई-रिक्शा और ठेला भी चलाया, लेकिन जब उनके कोच ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने के लिए बेहतर डाइट और शारीरिक ताकत जरूरी है, तो उन्होंने बड़ा फैसला लिया।
उन्होंने अपने संसाधनों को बेचकर करीब ढाई लाख रुपये जुटाए और उसी पैसे से अपनी डाइट और प्रशिक्षण का खर्च पूरा किया। उनकी मेहनत और त्याग का परिणाम अब पूरी दुनिया के सामने है। राष्ट्रमंडल खेल में पदक जीतने के बाद उनके गांव और परिवार में खुशी का माहौल है।
झंडू कुमार के कांस्य पदक जीतने की खबर मिलते ही उनकी मां कमला देवी और पिता रामानंद पासवान की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। मां ने बताया कि झंडू बचपन से ही मेहनती और लगनशील रहा है। उसने अपनी दिव्यांगता को कभी कमजोरी नहीं बनने दिया। परिवार ने हमेशा उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
झंडू कुमार का खेल सफर जिम से शुरू हुआ था। शुरुआत में उन्होंने शौक के तौर पर जिम जाना शुरू किया था। वहां उनकी शारीरिक क्षमता को देखकर प्रशिक्षक गौतम सिंह ने उन्हें भारोत्तोलन के लिए प्रेरित किया। वर्ष 2019 में वह नालंदा पैरा स्पोर्ट्स एसोसिएशन से जुड़े और यहीं से उनके अंतरराष्ट्रीय सफर की शुरुआत हुई।
उनके कोच कुंदन कुमार पांडेय ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और लगातार मार्गदर्शन दिया। इसके बाद झंडू कुमार का चयन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र, गांधीनगर में हुआ, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण प्राप्त किया। यहां उन्हें अनुभवी प्रशिक्षकों का सहयोग मिला और उनकी तकनीक में सुधार हुआ।
झंडू कुमार इससे पहले भी कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। उन्होंने राष्ट्रीय पैरा पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में पदक जीते हैं और खेलो इंडिया पैरा गेम्स में स्वर्ण पदक हासिल किया है। इसके अलावा बीजिंग वर्ल्ड पैरा पावरलिफ्टिंग वर्ल्ड कप में भी उन्होंने भारत के लिए कांस्य पदक जीता था।
उनकी इस उपलब्धि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बधाई दी और कहा कि झंडू कुमार की सफलता उनकी ताकत, संकल्प और वर्षों की मेहनत का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि झंडू ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर शानदार प्रदर्शन कर पूरे देश का मान बढ़ाया है।
झंडू कुमार की कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि यह संदेश है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति और मेहनत से बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं। आर्थिक परेशानियों और शारीरिक चुनौतियों को पीछे छोड़कर उन्होंने साबित कर दिया कि प्रतिभा को सही दिशा और मेहनत का साथ मिले तो कोई भी मंजिल मुश्किल नहीं होती। बिहार के इस लाल ने अपने संघर्ष से देश के करोड़ों युवाओं और दिव्यांग खिलाड़ियों को नई प्रेरणा दी है।





