
बेगूसराय (सिमरिया घाट): आस्था और मोक्ष की भूमि कहा जाने वाला बेगूसराय का ऐतिहासिक सिमरिया घाट इन दिनों श्रद्धालुओं के लिए 'डेथ ट्रैप' (मौत का कुआं) बन चुका है। यहां प्रशासनिक संवेदनहीनता और लचर सुरक्षा व्यवस्था का आलम यह है कि केवल जून महीने में ही गंगा स्नान के दौरान डूबने से 9 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि कई लोग अब भी लापता हैं। करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र होने के बावजूद सिमरिया घाट पर न तो सुरक्षा बैरिकेडिंग है, न स्थायी गोताखोर और न ही कोई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र। नतीजतन, मोक्ष की कामना लेकर आने वाले श्रद्धालुओं की चीत्कारों से घाट गूंज रहा है।
हादसों की रूह कंपा देने वाली फेहरिस्त
जून महीने में सिमरिया घाट पर हुए हादसे इस बात का गवाह हैं कि यहाँ सुरक्षा व्यवस्था कितनी खोखली है:
3 जून: समस्तीपुर के 18 वर्षीय बजरंगी साव की डूबने से मौत हुई।
6 जून: दरभंगा से आईं ननद मुस्कान कुमारी (15 वर्ष) और भाभी मन्नु देवी (24 वर्ष) गहरे पानी में डूब गईं। मुस्कान का शव मिला, लेकिन भाभी की लाश गंगा की तेज धार में हमेशा के लिए लापता हो गई।
17 जून: बीहट नगर परिषद के उमाशंकर साह के दो सगे पुत्र—विशाल कुमार (26 वर्ष), अमन कुमार (18 वर्ष) और उनका ममेरा भाई रिशांक गुप्ता (13 वर्ष) एक साथ डूब गए। तीन मौतों से पूरे इलाके में कोहराम मच गया। अमन और रिशांक के शव मिले, पर विशाल का शव अब तक नहीं मिला है।
26 और 28 जून: सुपौल के एक अज्ञात युवक, मधुबनी के 15 वर्षीय छात्र आदित्य कुमार और स्थानीय 6 वर्षीय मासूम ओम कुमार की डूबने से मौत हो गई।
कागजी 'स्मार्ट' सिमरिया और जमीनी हकीकत
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार सिमरिया घाट को 'स्मार्ट रिवर फ्रंट' बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। नवनिर्मित स्थायी घाटों से मुख्य गंगा नदी करीब आधा किलोमीटर दूर खिसक गई है। जहाँ इस समय लोग स्नान कर रहे हैं, वह पूरी तरह असुरक्षित और खुला क्षेत्र है। अस्पताल की दूरी भी मौतों का एक बड़ा कारण है। घाट पर कोई प्राथमिक उपचार (First-Aid) केंद्र नहीं है। पानी से निकाले गए लोगों को 8 किलोमीटर दूर बरौनी अस्पताल ले जाना पड़ता है और कई लोग रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया के लिए खतरनाक जगहों पर रील्स बनाने का बढ़ता क्रेज और बांस की अस्थाई बैरिकेडिंग पर स्टंटबाजी भी हादसों को न्यौता दे रही है।
मुआवजा देना आसान, सुरक्षा करना मुश्किल: सिस्टम पर सवाल
सिमरिया में तेजी से बढ़ते मौत के आंकड़ों ने प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि धरातल पर कड़े सुरक्षा इंतजाम करने के बजाय सरकार को आपदा विभाग के जरिए मृतक के परिजनों को 4-4 लाख रुपये का मुआवजा बांटना ज्यादा आसान लगता है।
बनारस की तर्ज पर 'जल पुलिस' की मांग
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों और पीड़ितों के परिजनों ने सरकार से पुरजोर मांग की है कि बनारस के घाटों की तर्ज पर सिमरिया घाट पर भी 24 घंटे सक्रिय रहने वाली एक समर्पित 'जल पुलिस' का गठन किया जाए। साथ ही, आधुनिक सुरक्षा उपकरणों के साथ कुशल स्थानीय गोताखोरों की स्थायी तैनाती और घाटों पर पुख्ता जाल (बैरिकेडिंग) लगाया जाए, ताकि आस्था के नाम पर मासूमों की बलि चढ़ने का यह सिलसिला तुरंत बंद हो सके।





