
Bihar: पटना से शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा बदलाव सामने आया है। बिहार के अंगीभूत महाविद्यालयों में प्रधानाचार्य (प्रिंसिपल) की नियुक्ति के नियम अब और सख्त कर दिए गए हैं। राज्यपाल सचिवालय की ओर से जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार अब इस पद के लिए कम से कम 15 वर्षों का शिक्षण अनुभव अनिवार्य होगा। इसके साथ ही आरक्षण नियमों और यूजीसी गाइडलाइन का पालन भी पूरी तरह जरूरी कर दिया गया है।
नए नियमों के अनुसार, चयन प्रक्रिया में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और नियमों का उल्लंघन करने पर संबंधित कुलपतियों पर कार्रवाई भी हो सकती है। इसका उद्देश्य कॉलेजों में नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना बताया गया है।
नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन अभ्यर्थियों पर गंभीर आरोप लंबित हैं, उन्हें प्रधानाचार्य पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा। नियुक्ति से पहले उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि और पात्रता की गहन जांच की जाएगी ताकि किसी भी तरह की विवादित स्थिति से बचा जा सके।
यूजीसी गाइडलाइन को भी अनिवार्य कर दिया गया है। सभी विश्वविद्यालयों को निर्देश दिया गया है कि चयन प्रक्रिया पूरी तरह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मानकों के अनुसार ही हो। इसके अलावा प्रधानाचार्य का कार्यकाल पांच वर्षों का निर्धारित किया गया है, जिसे बेहतर प्रदर्शन की स्थिति में पांच साल और बढ़ाया जा सकता है।
नए नियमों में यह भी प्रावधान है कि यदि कार्यकाल के दौरान किसी प्रधानाचार्य पर गंभीर आरोप साबित होते हैं तो उन्हें पद से हटाया जा सकता है। यानी अब नियुक्ति के बाद भी प्रदर्शन और आचरण पर नजर रखी जाएगी।
प्रधानाचार्य चयन के लिए साक्षात्कार के 20 अंक निर्धारित किए गए हैं। उम्मीदवारों की अधिकतम आयु सीमा 60 वर्ष तय की गई है। इसके बाद चयन प्रक्रिया में तीन सदस्यीय समिति उम्मीदवारों की योग्यता, अनुभव और इंटरव्यू के आधार पर अंतिम चयन करेगी।
राजभवन के अनुसार इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य कॉलेजों में योग्य, अनुभवी और जिम्मेदार नेतृत्व सुनिश्चित करना है, ताकि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सके।





