बिहार

भोजपुर एनकाउंटर केस में IPS का RJD सांसद को 5 करोड़ का मानहानि नोटिस

Rajeshwari Nishad
15 Oct 2026 9:14 PM IST
भोजपुर एनकाउंटर केस में IPS का RJD सांसद को 5 करोड़ का मानहानि नोटिस
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पटना। बिहार के चर्चित भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद एक बार फिर गरमा गया है। भोजपुर जिले में हुई पुलिस मुठभेड़ और जमुई की एक अन्य घटना पर सवाल उठाने वाले बक्सर से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद सुधाकर सिंह को वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन ने मानहानि का कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में सांसद से 15 दिनों के भीतर सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगने की मांग की गई है। ऐसा नहीं करने पर पांच करोड़ रुपये के हर्जाने का दीवानी मुकदमा और आपराधिक मानहानि की कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी दी गई है। गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 को सुधाकर सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर नोटिस मिलने की पुष्टि की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह माफी नहीं मांगेंगे और पुलिस की जवाबदेही से जुड़े सवाल उठाते रहेंगे।
15 दिनों के भीतर माफी मांगने की मांग
वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन की ओर से उनके अधिवक्ता अपूर्व हर्ष ने सांसद सुधाकर सिंह को कानूनी नोटिस भेजा है।नोटिस में कहा गया है कि सांसद ने सार्वजनिक मंचों पर अधिकारी के खिलाफ ऐसे आरोप लगाए, जिनसे उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।नोटिस में सुधाकर सिंह से 15 दिनों के भीतर सार्वजनिक रूप से बिना शर्त माफी मांगने को कहा गया है।
यदि निर्धारित अवधि में माफी नहीं मांगी जाती है, तो पांच करोड़ रुपये के हर्जाने का दावा करते हुए दीवानी मुकदमा दाखिल करने और आपराधिक मानहानि की कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी दी गई है।हालांकि, कानूनी नोटिस भेजे जाने का अर्थ यह नहीं है कि सांसद के खिलाफ मानहानि का आरोप अदालत में साबित हो गया है।सोशल मीडिया पर सांसद ने दी प्रतिक्रियानोटिस मिलने के बाद सुधाकर सिंह ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया सार्वजनिक की।
उन्होंने बताया कि वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी कुंदन कृष्णन की ओर से अधिवक्ता के माध्यम से उन्हें मानहानि का नोटिस मिला है।सांसद ने कहा कि उन्होंने भोजपुर के बिलौती गांव में भारत भूषण तिवारी की संदिग्ध मौत और जमुई की घटना को लेकर जनहित में सवाल उठाए थे।उनका कहना है कि जनप्रतिनिधि होने के नाते पुलिस और प्रशासन की जवाबदेही तय करने की मांग करना उनकी जिम्मेदारी है।सुधाकर सिंह ने स्पष्ट किया कि वह कानूनी नोटिस के दबाव में अपने सवाल वापस नहीं लेंगे।
माफी मांगने से सुधाकर सिंह का इनकार
सुधाकर सिंह ने अपने बयान में कहा कि वह कुंदन कृष्णन से सार्वजनिक माफी नहीं मांगेंगे।उन्होंने आरोप लगाया कि मानहानि के नोटिस के माध्यम से उनकी आवाज दबाने का प्रयास किया जा रहा है।सांसद ने कहा कि किसी अधिकारी के पद या वर्दी के दबाव में आकर वह जनहित के मुद्दों को उठाना बंद नहीं करेंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि उनके सवालों का जवाब कानूनी कार्रवाई की चेतावनी से नहीं, बल्कि तथ्यों और निष्पक्ष जांच के माध्यम से दिया जाना चाहिए।हालांकि, सांसद का यह कहना कि नोटिस का उद्देश्य उनकी आवाज दबाना है, उनका अपना आरोप है। नोटिस की वैधानिकता और उसमें लगाए गए दावों का निर्धारण संबंधित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होगा।
क्या है भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामला?
इस विवाद की शुरुआत भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौती गांव में हुई पुलिस कार्रवाई से जुड़ी है।17 जून 2026 को पुलिस ऑपरेशन के दौरान भारत भूषण तिवारी की मौत हो गई थी।घटना को लेकर पुलिस की कार्रवाई और मुठभेड़ की परिस्थितियों पर सवाल उठे थे।मृतक के परिजनों ने मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी।
इसके बाद स्थानीय स्तर पर विरोध और राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई।घटना की
गंभीरता
को देखते हुए संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई और प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई थी।मामले में जांच की निष्पक्षता को लेकर लगातार सवाल उठाए जाते रहे हैं।
24 जून को सांसद ने उठाए थे सवाल
आईपीएस अधिकारी की ओर से भेजे गए नोटिस के अनुसार, सुधाकर सिंह ने 24 जून 2026 को प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की थी।इस दौरान उन्होंने भरत भूषण तिवारी की मौत और पुलिस ऑपरेशन में वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए थे।नोटिस में आरोप लगाया गया है कि सांसद ने कुंदन कृष्णन के संबंध में ऐसे बयान दिए, जिनसे उनकी प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।दूसरी ओर, सुधाकर सिंह का कहना है कि उन्होंने किसी निजी दुश्मनी के कारण बयान नहीं दिए थे।
उनके मुताबिक, पुलिस हिरासत या मुठभेड़ जैसी घटनाओं में जवाबदेही तय करने की मांग जनहित से जुड़ा विषय है।अब दोनों पक्षों के दावों को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया है।संबंधित पुलिसकर्मियों पर हुई थी कार्रवाई
भरत भूषण तिवारी की मौत के मामले में कुछ पुलिसकर्मियों के निलंबन और प्राथमिकी दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई थी।मृतक की मां आशा देवी की शिकायत भी जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनी।पुलिस मुख्यालय ने घटना से संबंधित प्राथमिकी और शिकायत के दस्तावेज तलब किए थे।
सुधाकर सिंह का कहना है कि जब इस मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई और जांच का आदेश दिया गया, तो वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाना अनुचित नहीं है।हालांकि, किसी पुलिसकर्मी का निलंबन या जांच का आदेश अपने आप में किसी अन्य वरिष्ठ अधिकारी की आपराधिक जिम्मेदारी साबित नहीं करता।
न्यायिक जांच की मांग पर कायम सांसद
सुधाकर सिंह ने भरत भूषण तिवारी की मौत की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की मांग दोहराई है।उन्होंने कहा कि जांच केवल घटनास्थल पर मौजूद पुलिसकर्मियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
सांसद चाहते हैं कि तत्कालीन पुलिस कमान, निर्णय प्रक्रिया, पुलिस मुख्यालय की भूमिका और संबंधित अधिकारियों के बीच हुए संवाद की भी पड़ताल की जाए।उनका कहना है कि निष्पक्ष जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि घटना के लिए किस स्तर पर जिम्मेदारी बनती है।सांसद ने मृतक के परिवार को न्याय दिलाने की मांग भी की है।
जमुई की घटना पर भी उठाए सवाल
भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर के अलावा सुधाकर सिंह ने जमुई में एक किशोरी से जुड़ी कथित घटना का भी उल्लेख किया है।उन्होंने कहा कि महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
सांसद के अनुसार, जमुई की घटना में भी पुलिस की जवाबदेही और पीड़िता को न्याय दिलाने से जुड़े सवाल उठाए गए थे।उन्होंने कहा कि महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा किसी राजनीतिक दल का निजी मुद्दा नहीं, बल्कि सार्वजनिक जिम्मेदारी है।
हालांकि, जमुई की घटना के विस्तृत तथ्य और आईपीएस अधिकारी के खिलाफ लगाए गए विशिष्ट आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस समय उपलब्ध नहीं है।कुंदन कृष्णन ने आरोपों को बताया निराधार
कुंदन कृष्णन की ओर से भेजे गए कानूनी नोटिस में सांसद के आरोपों को निराधार और प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया गया है।नोटिस के अनुसार, सार्वजनिक रूप से लगाए गए आरोपों से अधिकारी की पेशेवर छवि प्रभावित हुई है।
इसी आधार पर उनसे माफी मांगने और बयान वापस लेने को कहा गया है।वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की ओर से संभावित दीवानी और आपराधिक कानूनी कार्रवाई का उल्लेख किया गया है।
यह मामला अब इस प्रश्न से भी जुड़ गया है कि सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की तथ्यात्मक जांच और प्रतिष्ठा की कानूनी सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
बिहार की राजनीति में बढ़ा विवाद
बक्सर सांसद सुधाकर सिंह के इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।राष्ट्रीय जनता दल के सांसद पहले से ही भोजपुर मुठभेड़ की जांच को लेकर प्रशासन पर सवाल उठाते रहे हैं।अब वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी की ओर से मानहानि का नोटिस मिलने से विवाद का कानूनी पहलू भी सामने आ गया है।एक ओर अधिकारी ने अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाए जाने का आरोप लगाया है, वहीं सांसद खुद को जनहित से जुड़े सवाल उठाने वाला जनप्रतिनिधि बता रहे हैं।दोनों पक्षों के अलग-अलग दावों के कारण आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
नोटिस के बाद आगे क्या होगा?
कानूनी नोटिस में सुधाकर सिंह को 15 दिनों की समयसीमा दी गई है।सांसद ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगने से इनकार कर दिया है।ऐसे में यदि संबंधित अधिकारी आगे मुकदमा दाखिल करते हैं, तो अदालत उपलब्ध दस्तावेजों, बयानों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर मामले पर विचार करेगी।संसदीय पद पर होने से किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से दिए गए हर बयान पर स्वतः कानूनी छूट नहीं मिलती। वहीं जनहित में सवाल उठाने का अधिकार भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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