बिहार

रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद मखाना किसानों पर बाजार की मार, आधे से भी नीचे पहुंचे भाव

Kavita2
7 Oct 2026 4:14 PM IST
रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद मखाना किसानों पर बाजार की मार, आधे से भी नीचे पहुंचे भाव
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पटना। मखाना उत्पादन में इस साल रिकॉर्ड बढ़ोतरी ने किसानों के चेहरे पर शुरुआत में खुशी ला दी थी, लेकिन बाजार में पहुंचते ही यही खुशी मायूसी में बदल गई। बेहतर तकनीक और उन्नत बीज के कारण उत्पादन में पिछले वर्ष के मुकाबले करीब 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, लेकिन मखाना गुड़ी की कीमतों में भारी गिरावट ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

पिछले वर्ष मखाना गुड़ी का भाव करीब 30 से 35 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंचा था। इस बार बाजार में यही गुड़ी महज 14 से 17 हजार रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बिक रही है। यानी किसानों को पिछले साल की तुलना में आधे से भी कम कीमत मिल रही है।

उत्पादन बढ़ने के बावजूद किसानों की आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पा रही है। कई किसानों का कहना है कि खेती पर लागत पहले की तरह बनी हुई है, जबकि बिक्री मूल्य में भारी गिरावट आई है। इससे मखाना उत्पादकों के सामने लागत निकालने और अगली फसल के लिए पूंजी जुटाने की चुनौती खड़ी हो गई है।

मखाना किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होना भी बताया जा रहा है। मखाना गुड़ी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए उचित गोदाम और वैज्ञानिक भंडारण की आवश्यकता होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसी सुविधाओं की कमी के कारण किसान अपनी उपज को अधिक दिनों तक रोक नहीं पाते।

इस स्थिति का फायदा कथित तौर पर बिचौलियों और बड़े व्यापारियों को मिलता है। किसानों का आरोप है कि जब बाजार में एक साथ बड़ी मात्रा में मखाना पहुंचता है तो खरीदार कीमतें नीचे कर देते हैं। किसानों के पास भंडारण का विकल्प न होने के कारण उन्हें कम भाव पर ही अपनी उपज बेचनी पड़ती है।

मखाना बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP जैसी व्यवस्था नहीं होने से भी किसान खुले बाजार पर निर्भर हैं। धान और गेहूं जैसी कई प्रमुख फसलों में सरकारी खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था किसानों को एक निश्चित सुरक्षा देती है, लेकिन मखाना उत्पादकों को ऐसी कोई निश्चित कीमत नहीं मिलती।

यही कारण है कि बाजार में मांग और आपूर्ति के हिसाब से कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव सीधे किसानों की कमाई को प्रभावित करता है।

इस साल उत्पादन बढ़ने के पीछे उन्नत किस्म के बीज और खेती में तकनीकी बदलाव को प्रमुख कारण माना जा रहा है। किसानों ने नई तकनीकों को अपनाकर प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ाया है। इससे राज्य के कुल उत्पादन में लगभग 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

उत्पादन बढ़ना मखाना क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा था। किसानों को उम्मीद थी कि अधिक पैदावार के कारण उनकी कुल आमदनी में भी अच्छी वृद्धि होगी। हालांकि बाजार भाव में आई तेज गिरावट ने इस गणित को बदल दिया।

उदाहरण के तौर पर पिछले साल यदि किसी किसान को एक क्विंटल गुड़ी बेचने पर 30 से 35 हजार रुपये तक मिल रहे थे, तो इस बार वही मात्रा 14 से 17 हजार रुपये में बिक रही है। ऐसे में अधिक उत्पादन के बावजूद कुल आमदनी पर दबाव बना हुआ है।

किसानों का कहना है कि खेती में मजदूरी, बीज, पानी और प्रसंस्करण समेत कई तरह का खर्च होता है। मखाना उत्पादन सामान्य फसलों की तुलना में श्रम आधारित माना जाता है। खेत या तालाब से मखाना निकालने से लेकर गुड़ी तैयार करने तक कई चरणों में श्रमिकों की जरूरत पड़ती है।

इन सभी चरणों की लागत में खास कमी नहीं आई है। दूसरी ओर बाजार भाव गिरने से मुनाफे का अंतर कम हो गया है।

मखाना कारोबार में किसान से उपभोक्ता तक पहुंचने के बीच कई स्तर होते हैं। किसान गुड़ी बेचते हैं, जिसके बाद इसे प्रोसेस कर खाने योग्य मखाना तैयार किया जाता है। इसके बाद थोक और खुदरा बाजार के जरिए यह उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।

किसानों का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में सबसे कमजोर स्थिति उत्पादक की है। बाजार में कीमत तय करने की क्षमता किसान के पास बहुत कम है।

बिचौलियों के कथित सिंडिकेट का मुद्दा भी किसानों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। किसानों का आरोप है कि बाजार में सीमित संख्या में बड़े खरीदार और व्यापारी आपसी तालमेल से खरीद दर तय करते हैं। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है और व्यापारियों का पक्ष भी इस मामले में महत्वपूर्ण है।

किसान संगठनों की ओर से लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग की जाती रही है, जिससे उत्पादकों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके।

मखाना के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसी व्यवस्था की मांग भी इसी वजह से उठती रही है। किसानों का मानना है कि यदि एक न्यूनतम खरीद मूल्य तय हो जाए तो बाजार में अचानक गिरावट की स्थिति में उन्हें नुकसान से बचाया जा सकता है।

इसके साथ ही सरकारी या सहकारी स्तर पर मखाना खरीद केंद्र स्थापित करने की मांग भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि किसान सीधे किसी संगठित केंद्र पर अपनी उपज बेच सकें तो बिचौलियों पर उनकी निर्भरता कम हो सकती है।

भंडारण सुविधाएं बढ़ाना भी जरूरी बताया जा रहा है। किसान यदि अपनी उपज को कुछ महीने सुरक्षित रख सकें तो उन्हें तत्काल कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा।

मखाना की घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग लगातार बनी रहती है। इसे स्वास्थ्यवर्धक खाद्य उत्पाद के रूप में भी पहचान मिली है। इसके बावजूद उत्पादक किसानों तक इसका पूरा आर्थिक लाभ पहुंचना चुनौती बना हुआ है।

मखाना उत्पादन वाले क्षेत्रों में रोजगार का भी यह बड़ा माध्यम है। खेती से लेकर प्रसंस्करण, पैकिंग और व्यापार तक बड़ी संख्या में लोग इससे जुड़े हुए हैं। ऐसे में किसानों को उचित कीमत नहीं मिलने का असर पूरे स्थानीय कारोबार पर पड़ सकता है।

इस साल की स्थिति ने उत्पादन बढ़ाने के साथ बाजार व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत भी सामने ला दी है। केवल अधिक पैदावार तभी किसानों के लिए लाभकारी होगी, जब उन्हें उसकी उचित कीमत भी मिले।

फिलहाल मखाना किसानों के सामने सबसे बड़ी चिंता गिरता बाजार भाव है। एक तरफ रिकॉर्ड उत्पादन है, तो दूसरी तरफ पिछले साल की तुलना में कीमत लगभग आधी रह गई है।

किसानों को उम्मीद है कि सरकार बाजार की स्थिति पर नजर रखेगी और भंडारण, बाजार संपर्क तथा उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगी।

इस बार बेहतर बीज और तकनीक ने खेतों में उत्पादन बढ़ाया, लेकिन बाजार में गिरती कीमतों ने किसानों के लाभ की उम्मीदों को झटका दिया है। अब मखाना क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि रिकॉर्ड पैदावार का वास्तविक फायदा उत्पादक किसानों तक कैसे पहुंचे।

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