
मधुबनी जिले: ऐतिहासिक बलिराजगढ़ में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा चल रहे उत्खनन कार्य की जिलाधिकारी आनंद शर्मा ने वर्चुअल माध्यम से समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने खुदाई की प्रगति, अब तक मिले पुरातात्विक अवशेषों और आगे की कार्ययोजना पर विस्तार से चर्चा की। डीएम ने वैज्ञानिक तरीके से और तय समय सीमा के भीतर गुणवत्तापूर्ण उत्खनन कार्य जारी रखने के निर्देश दिए।
बलिराजगढ़ को मिथिला की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर माना जा रहा है। जिलाधिकारी ने कहा कि यह स्थल केवल बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश की पुरातात्विक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां हो रही खुदाई से प्राचीन मिथिला सभ्यता और उसकी विकसित शहरी संरचना के कई महत्वपूर्ण प्रमाण सामने आ रहे हैं। बाबूबरही प्रखंड के भूपट्टी और पचरुखी पंचायत की सीमा में स्थित बलिराजगढ़ को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित स्मारक घोषित किया है। यहां इस समय चरणबद्ध तरीके से वैज्ञानिक उत्खनन किया जा रहा है। फिलहाल छह ट्रेंच में खुदाई चल रही है, जिनमें से तीन ट्रेंच किलेबंदी क्षेत्र में और तीन किले से लगभग 200 मीटर दूर दक्षिण दिशा में स्थित हैं।
खुदाई के दौरान विशाल ईंटों से बनी किलेबंदी, प्राचीन फर्श, पत्थर के गोले, मिट्टी के बर्तन और नॉर्दर्न ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (NBPW) जैसी वस्तुएं मिली हैं। ये सभी अवशेष उस समय की उन्नत शहरी संस्कृति के प्रमाण माने जा रहे हैं। दक्षिणी हिस्से के एक ट्रेंच में 5.40 मीटर की गहराई पर 13 परतों वाला एक रिंग वेल भी मिला है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका उपयोग जल संग्रहण, अन्न भंडारण या घरेलू जरूरतों के लिए किया जाता रहा होगा। इसके साथ ही टेराकोटा मानव और पशु प्रतिमाएं, खिलौना गाड़ी, मनके और अन्य प्राचीन वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं।
एक अन्य ट्रेंच में प्राचीन जल निकासी प्रणाली, सोख्ता गड्ढा, मुहरें, सीलिंग और टेराकोटा की प्रतिमाएं मिली हैं। यहां सात परतों वाली ईंट निर्मित संरचना भी पाई गई है, जो उस समय की व्यवस्थित नगर योजना की ओर संकेत करती है।पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार बलिराजगढ़ से प्राप्त साक्ष्य लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। यहां मिली किलेबंदी, रिंग वेल, जल निकासी व्यवस्था और अन्य अवशेष इस बात का संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र करीब तीन हजार वर्ष पहले एक विकसित, सुव्यवस्थित और समृद्ध नगरीय केंद्र रहा होगा, जो लंबे समय तक आबाद रहा।
इस उत्खनन को मिथिला क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण खोज माना जा रहा है, जिससे आने वाले समय में कई ऐतिहासिक तथ्य सामने आने की उम्मीद है।





