अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल की लुप्त होती मातृभाषाएं नई पीढ़ी से जुड़ी बड़ी चिंता

nidhi
18 Aug 2026 10:58 AM IST
अरुणाचल की लुप्त होती मातृभाषाएं नई पीढ़ी से जुड़ी बड़ी चिंता
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क्या खत्म हो जाएंगी अरुणाचल की सदियों पुरानी बोलियां
ईटानगर: अरुणाचल प्रदेश अपनी विविध संस्कृति और अनगिनत जनजातीय परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां कई ऐसी मातृभाषाएं बोली जाती हैं, जो सदियों से स्थानीय समुदायों की पहचान, इतिहास और संस्कृति को आगे बढ़ाती आई हैं। लेकिन बदलते समय के साथ इन भाषाओं के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर बुजुर्ग पीढ़ी के साथ ये भाषाएं भी कमजोर पड़ गईं, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी भाषाई विरासत से दूर हो सकती हैं।
अरुणाचल प्रदेश में 20 से अधिक प्रमुख जनजातियां और कई उप-जनजातियां निवास करती हैं। इनमें से कई समुदायों की अपनी अलग भाषा, बोली और मौखिक परंपराएं हैं। इन भाषाओं का ज्ञान मुख्य रूप से बुजुर्गों के पास सुरक्षित है, क्योंकि पीढ़ियों से लोककथाएं, गीत, रीति-रिवाज और पारंपरिक ज्ञान इन्हीं के माध्यम से आगे बढ़ता रहा है।
बुजुर्ग हैं भाषाओं के जीवित संरक्षक
कई आदिवासी भाषाओं में लिखित साहित्य सीमित है। ऐसी स्थिति में बुजुर्ग समुदाय के लोग ही भाषा के सबसे बड़े स्रोत माने जाते हैं। वे लोकगीतों, कहानियों, पारंपरिक शब्दों और सांस्कृतिक ज्ञान को याद रखते हैं।
लेकिन नई पीढ़ी में हिंदी, अंग्रेजी और अन्य बड़ी भाषाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण स्थानीय भाषाओं का इस्तेमाल कम हो रहा है। स्कूल, रोजगार और डिजिटल दुनिया में बड़ी भाषाओं की जरूरत के चलते युवा अपनी मातृभाषा से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं।
कई भाषाओं के विलुप्त होने का खतरा
दुनिया भर में भाषाविदों का मानना है कि जब किसी भाषा को बोलने वालों की संख्या लगातार घटती है, तो उसके खत्म होने का खतरा बढ़ जाता है। अरुणाचल की कई छोटी जनजातीय भाषाएं भी इसी चुनौती का सामना कर रही हैं।
भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं होती, बल्कि उसमें किसी समुदाय की पहचान, इतिहास, प्रकृति से जुड़ा ज्ञान और जीवन जीने का तरीका छिपा होता है। किसी भाषा के खत्म होने का अर्थ केवल शब्दों का खत्म होना नहीं, बल्कि एक पूरी सांस्कृतिक विरासत का कमजोर होना है।
युवा पीढ़ी को जोड़ने की जरूरत
भाषा संरक्षण के लिए विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को घर में अपनी मातृभाषा बोलने के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है। इसके अलावा स्थानीय भाषाओं में किताबें तैयार करना, डिजिटल रिकॉर्डिंग करना और स्कूलों में इनके बारे में जानकारी देना भी महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
कई समुदाय अब अपनी भाषाओं को बचाने के लिए लोकगीतों, कहानियों और पारंपरिक ज्ञान को रिकॉर्ड करने की कोशिश कर रहे हैं। मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से भी स्थानीय भाषाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
भाषा बची तो संस्कृति भी बचेगी
अरुणाचल की जनजातीय भाषाएं केवल शब्दों का संग्रह नहीं हैं, बल्कि वे वहां के पहाड़ों, जंगलों, नदियों और समुदायों के जीवन से जुड़ी हुई हैं। इनमें पारंपरिक चिकित्सा, खेती, पर्यावरण और सामाजिक व्यवस्था का ज्ञान भी मौजूद है।
अगर युवा अपनी मातृभाषाओं से जुड़ते हैं तो वे अपनी जड़ों और संस्कृति को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। वहीं अगर इन भाषाओं का इस्तेमाल बंद हो गया तो आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वजों की कई महत्वपूर्ण परंपराओं से अनजान रह जाएंगी।
सरकार और समाज की भूमिका अहम
भाषाओं को बचाने के लिए सरकारी संस्थाओं, शिक्षाविदों और स्थानीय समुदायों को मिलकर काम करने की जरूरत है। भाषा दस्तावेजीकरण, स्थानीय भाषा शिक्षा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से इन्हें संरक्षित किया जा सकता है।
अरुणाचल प्रदेश की मातृभाषाएं आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हैं, जहां संरक्षण के प्रयास ही उनके भविष्य को तय करेंगे। बुजुर्गों के पास मौजूद भाषाई खजाने को रिकॉर्ड करना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती है।
क्योंकि जब कोई भाषा बोलने वाला आखिरी व्यक्ति भी चला जाता है, तो केवल एक आवाज नहीं खोती, बल्कि एक पूरी सभ्यता की कहानी हमेशा के लिए खामोश हो सकती है।
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