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इंस्टाग्राम स्क्रॉलिंग का दिमाग पर असर, क्यों कम होने लगती है जिंदगी से खुशी

Alisha
4 Oct 2026 6:58 PM IST
इंस्टाग्राम स्क्रॉलिंग का दिमाग पर असर, क्यों कम होने लगती है जिंदगी से खुशी
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सोशल मीडिया: आज के दौर में इंस्टाग्राम सिर्फ फोटो और वीडियो शेयर करने वाला प्लेटफॉर्म नहीं रह गया है। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक लोग रील्स, स्टोरी और पोस्ट स्क्रॉल करते रहते हैं। किसी की विदेश यात्रा, किसी की नई कार, शानदार घर, महंगे कपड़े, फिट बॉडी, रोमांटिक रिलेशनशिप और दोस्तों के साथ पार्टी की तस्वीरें लगातार स्क्रीन पर दिखाई देती हैं। इन्हें देखते-देखते कई बार व्यक्ति को अपनी सामान्य जिंदगी फीकी और बोरिंग लगने लगती है। सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों होता है| इसके पीछे मनोविज्ञान से जुड़े कई कारण हो सकते हैं।सोशल मीडिया पर ज्यादातर लोग अपनी जिंदगी के अच्छे और आकर्षक पल ही दिखाते हैं। शायद ही कोई रोजमर्रा की परेशानियां, आर्थिक तनाव, असफलता, अकेलापन या खराब दिन लगातार पोस्ट करता हो। ऐसे में इंस्टाग्राम की दुनिया असल जिंदगी से कहीं ज्यादा चमकदार नजर आती है। जब कोई व्यक्ति इस चुनिंदा और एडिट की हुई जिंदगी की तुलना अपनी पूरी वास्तविक जिंदगी से करता है, तो उसे महसूस हो सकता है कि बाकी लोग उससे ज्यादा खुश और सफल हैं।

इस स्थिति को समझने में ‘सोशल कम्पैरिजन’ यानी सामाजिक तुलना महत्वपूर्ण है। इंसान स्वाभाविक रूप से अपनी स्थिति की तुलना दूसरों से करता है। पहले यह तुलना परिवार, दोस्तों, पड़ोसियों या सहकर्मियों तक सीमित रहती थी, लेकिन सोशल मीडिया ने इसका दायरा बहुत बड़ा कर दिया है। अब एक व्यक्ति कुछ मिनटों में दुनिया भर के सफल लोगों, सेलिब्रिटीज, इन्फ्लुएंसर्स और अमीर लोगों की जीवनशैली देख सकता है।समस्या तब बढ़ती है जब व्यक्ति दूसरों की जिंदगी के सबसे खूबसूरत पलों की तुलना अपने सामान्य दिनों से करने लगता है। सामने वाला व्यक्ति समुद्र किनारे छुट्टियां मनाते हुए दिखाई दे रहा है, जबकि आप घर पर रोजमर्रा का काम कर रहे हैं। कोई नई कार खरीद रहा है, कोई शादी की शानदार तस्वीरें डाल रहा है और कोई अपनी फिटनेस ट्रांसफॉर्मेशन दिखा रहा है। लगातार ऐसा कंटेंट देखने पर सामान्य दिनचर्या कम रोमांचक महसूस हो सकती है।

रील्स और छोटे वीडियो भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं। कुछ सेकंड में एक के बाद एक नया वीडियो सामने आने से दिमाग को लगातार नई उत्तेजना और मनोरंजन मिलता रहता है। मजेदार वीडियो के तुरंत बाद ट्रैवल वीडियो, फिर फूड वीडियो और उसके बाद किसी सेलिब्रिटी का कंटेंट दिखाई देता है। इस तेज बदलाव की आदत पड़ने पर किताब पढ़ना, टहलना, परिवार के साथ बैठना या शांत वातावरण में समय बिताना अपेक्षाकृत कम रोमांचक महसूस हो सकता है।इसके अलावा ‘फियर ऑफ मिसिंग आउट’ यानी FOMO भी सोशल मीडिया अनुभव का जाना-पहचाना हिस्सा है। जब कोई व्यक्ति अपने दोस्तों को पार्टी करते, घूमते या किसी खास कार्यक्रम में शामिल होते देखता है, तो उसे लग सकता है कि वह जिंदगी के मजेदार अनुभवों से पीछे रह गया है। भले ही उसकी अपनी जिंदगी ठीक चल रही हो, लेकिन दूसरों की गतिविधियां देखकर असंतोष पैदा हो सकता है।इंस्टाग्राम पर दिखने वाली जिंदगी हमेशा पूरी सच्चाई नहीं बताती। एक खूबसूरत तस्वीर के पीछे दर्जनों खराब तस्वीरें हो सकती हैं। किसी शानदार ट्रिप के पीछे महीनों की बचत हो सकती है। किसी फिटनेस फोटो के पीछे वर्षों की मेहनत हो सकती है। तस्वीरों में फिल्टर, एडिटिंग, सही कैमरा एंगल और रोशनी भी वास्तविकता को ज्यादा आकर्षक बना सकते हैं। इसलिए स्क्रीन पर दिखाई देने वाली जिंदगी को किसी व्यक्ति की पूरी वास्तविकता मान लेना सही नहीं है।

ऐसी स्थिति से बचने के लिए सोशल मीडिया पूरी तरह छोड़ना जरूरी नहीं है। इसके इस्तेमाल के तरीके में बदलाव मददगार हो सकता है। लगातार स्क्रॉल करने के बजाय समय सीमा तय करना, बार-बार तुलना कराने वाले अकाउंट को म्यूट या अनफॉलो करना और ऐसे कंटेंट को प्राथमिकता देना बेहतर हो सकता है जिससे जानकारी, प्रेरणा या वास्तविक आनंद मिले।इसके साथ ही अपनी जिंदगी के छोटे अनुभवों पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है। परिवार के साथ खाना खाना, दोस्तों से बातचीत, व्यायाम, पसंदीदा संगीत सुनना, कोई नई चीज सीखना या कुछ समय फोन से दूर रहना साधारण लग सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन का संतोष अक्सर इन्हीं अनुभवों से बनता है।सोशल मीडिया पर दिखने वाली दुनिया और वास्तविक जिंदगी के बीच अंतर को समझना सबसे जरूरी है। इंस्टाग्राम किसी व्यक्ति की जिंदगी की पूरी फिल्म नहीं, बल्कि चुनिंदा अच्छे दृश्यों का छोटा-सा ट्रेलर हो सकता है। इसलिए दूसरों की हाइलाइट्स देखकर अपनी पूरी जिंदगी का मूल्यांकन करना निराशा बढ़ा सकता है। स्क्रीन से थोड़ी दूरी और वास्तविक दुनिया से ज्यादा जुड़ाव अपनी जिंदगी को फिर से दिलचस्प और संतोषजनक महसूस कराने में मदद कर सकता है।
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