लाइफ स्टाइल

पतली कमर के लिए पसलियों की सर्जरी, जानें रिब रीमॉडलिंग की प्रक्रिया और जोखिम

nidhi
22 Oct 2026 9:41 AM IST
पतली कमर के लिए पसलियों की सर्जरी, जानें रिब रीमॉडलिंग की प्रक्रिया और जोखिम
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कमर का आकार बदलने के लिए पसलियों में बदलाव

लाइफस्टाइल: इस प्रक्रिया में निचली पसलियों का कोण बदलकर कमर को संकरा दिखाने का प्रयास किया जाता है। कुछ तकनीकों में इसके लिए पसली में नियंत्रित आंशिक फ्रैक्चर बनाया जाता है। हालांकि, इसे केवल ‘पसलियां तुड़वाना’ कहने से प्रक्रिया की अधूरी तस्वीर सामने आती है। यह चिकित्सकीय निगरानी में की जाने वाली सर्जरी है, जिसके संभावित लाभों के साथ जोखिम भी जुड़े हैं।

रिब रीमॉडलिंग में आमतौर पर नीचे की 11वीं और 12वीं पसलियों पर काम किया जाता है। तकनीक के अनुसार दूसरी निचली पसलियों को भी शामिल किया जा सकता है। नियंत्रित बदलाव के बाद पसलियों को नए कोण पर रखा जाता है, ताकि कमर की बाहरी बनावट बदले। यह वजन घटाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि शरीर की आकृति बदलने के उद्देश्य से किया जाने वाला हस्तक्षेप है। अलग-अलग तकनीकों की प्रक्रिया और देखभाल की जरूरतों में अंतर होता है।
पसलियां निकालने की सर्जरी और रिब रीमॉडलिंग में फर्क समझना जरूरी है। पसली हटाने की प्रक्रिया में हड्डी का हिस्सा निकाला जाता है, जबकि रीमॉडलिंग में उसे बनाए रखते हुए उसकी स्थिति बदली जाती है। इसलिए दोनों प्रक्रियाओं के परिणाम और जोखिम पूरी तरह एक जैसे नहीं माने जा सकते। पसलियां हटाने से जुड़े किसी अध्ययन का निष्कर्ष बिना अंतर समझे रीमॉडलिंग पर लागू करना भी उचित नहीं होगा। शोध साहित्य में इन तकनीकों को अलग-अलग परखने की जरूरत बताई गई है।
कुछ तरीकों में अल्ट्रासाउंड की मदद से पसलियों और आसपास की संरचनाओं की स्थिति देखी जाती है। इसके बाद विशेष उपकरण से हड्डी की सतह पर काम किया जाता है। उद्देश्य अनियंत्रित चोट पहुंचाना नहीं, बल्कि तय स्थान पर नियंत्रित बदलाव करना होता है। फिर भी तकनीक का नाम आधुनिक होने से जोखिम समाप्त नहीं हो जाता। सर्जन का प्रशिक्षण, मरीज की शारीरिक स्थिति और ऑपरेशन के बाद की देखभाल महत्वपूर्ण रहती है।
सर्जरी के बाद कई तकनीकों में विशेष कॉर्सेट पहनना पड़ता है। यह एक कसाव वाला चिकित्सकीय परिधान होता है, जो हड्डी जुड़ने के दौरान नई स्थिति को सहारा देता है। कुछ प्रक्रियाओं में इसकी अवधि करीब तीन महीने बताई गई है। दूसरी तकनीकों में हड्डी को स्थिर रखने के लिए प्लेट जैसे साधन इस्तेमाल होते हैं। इसलिए हर मरीज के लिए एक ही रिकवरी कार्यक्रम नहीं होता और इंटरनेट पर देखकर कॉर्सेट कसना सुरक्षित विकल्प नहीं है।
जोखिमों में लगातार दर्द, हड्डी का ठीक से न जुड़ना, असमान आकृति और कॉर्सेट के दबाव से त्वचा पर घाव जैसी समस्याएं शामिल हैं। फेफड़े के आसपास हवा जमा होने की गंभीर स्थिति भी हो सकती है, जिसे न्यूमोथोरैक्स कहा जाता है। ऐसी जटिलता में तुरंत उपचार जरूरी हो सकता है। इन जोखिमों का अर्थ यह नहीं कि हर मरीज को परेशानी होगी, लेकिन प्रक्रिया को पूरी तरह जोखिममुक्त बताना भी सही नहीं है। वर्ष 2026 में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण आधारित अध्ययन में विभिन्न तकनीकों से जुड़े 2,351 मरीजों के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया। इसमें 86 मरीजों, यानी लगभग 3.7 प्रतिशत में जटिलताएं दर्ज हुईं। चार मरीजों में न्यूमोथोरैक्स पाया गया। यह आंकड़ा उसी अध्ययन के मरीजों और परिस्थितियों का है; इसे हर अस्पताल या हर व्यक्ति का निश्चित जोखिम नहीं माना जा सकता। अध्ययन सर्जनों से प्राप्त जानकारी पर आधारित था और इसकी अपनी सीमाएं थीं।
उपलब्ध शोध में कमर का घेरा घटने और मरीजों की संतुष्टि के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। हालांकि, लंबे समय की सुरक्षा, सांस लेने की क्षमता और अलग-अलग तकनीकों के तुलनात्मक परिणामों पर अधिक मजबूत अध्ययन जरूरी हैं। शुरुआती अच्छे नतीजे कई वर्षों तक होने वाले प्रभावों की पूरी जानकारी नहीं देते। इसलिए किसी प्रचारात्मक तस्वीर को व्यक्तिगत परिणाम की गारंटी समझना उचित नहीं होगा। इस सर्जरी पर विचार करने वाले व्यक्ति को प्रशिक्षित प्लास्टिक सर्जन से अपनी अपेक्षाओं, स्वास्थ्य, संभावित जटिलताओं और दोबारा ऑपरेशन की जरूरत पर चर्चा करनी चाहिए। यह पूछना भी जरूरी है कि आपातस्थिति में उपचार की क्या व्यवस्था होगी। कमर का कोई एक आकार अच्छे स्वास्थ्य का प्रमाण नहीं है। निर्णय पूरी जानकारी और व्यक्तिगत चिकित्सकीय मूल्यांकन के आधार पर होना चाहिए।

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