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हमारे हर भाव के साथ एक ऊर्जा जुड़ी होती है। यदि वह व्यक्त न होकर मन में दबी रह जाए, तो शरीर को बीमार बना सकती है। आज ज्यादातर बीमारियों का कारण यही है। खुश रहने का राज भी इसी में छिपा है। अक्सर लोग भय, चिंता या तनाव को एक ही समझ लेते हैं। लेकिन इनके बारे में बात करते समय यह जरूर ध्यान रखें कि ये तीनों एक-दूसरे से अलग हैं। हर बात तनाव नहीं देती। आप किसी बात से भयभीत हो जाते हैं। उसकी कल्पना से परेशान रहने लगते हैं तो यह चिंता है।
तनाव क्या है
चिंता जब सच में सामने आ जाए, तो आपको आगे कैसे उसका समाधान करना है, वह आपको तनाव देने लगता है। जैसे कोई परीक्षार्थी परीक्षा की चिंता करता है। वह तरह-तरह की कल्पनाओं के कारण खुद को भय के घेरे में रखता है। पर जब परीक्षा हाल में प्रश्नपत्र हल करते समय जवाब न आए तो वह भयभीत हो जाता है। वही परीक्षा देकर बाहर आ जाए तो उसे परिणाम और उसके बाद की परिस्थितियों को लेकर तनाव होने लगता है।
भावनाओं के व्यक्त करना जरूरी
कुछ लोग अनुभव के स्तर में लंबे समय तक तनाव में रहते हुए इसके आदी हो जाते हैं। स्वीकार भी नहीं कर पाते कि उन्हें तनाव है। इसलिए विशेषज्ञ की सलाह भी नहीं लेते। यही चीज भीतर से उन्हें सूक्ष्म रूप से परेशान करती रहती है और बीमारियों के रूप में व्यक्त हो जाती है। ऊर्जा हमारे भाव को प्रेरित करती है कि हम उसे व्यक्त करते रहें। पर उसे आपने दबा लिया या किसी कारणवश दबाना सही समझा तो वह किसी न किसी रूप में व्यक्त हो ही जाती है। आपके हाव-भाव से या शारीरिक बीमारियों, मानसिक बीमारियों के रूप में। आप भले ही अपनी भावनाओं की अभियक्ति न करें, पर वह बाहर निकलने के लिए राह तलाशती ही रहती है।
दरअसल, भावनाओं को दबा लेना बीमारियों का एक बड़ा कारण बन गया है। आज हाइपरटेंशन, डिप्रेशन, एंजाइटी जैसी आम समस्याएं हो गई हैं। इन सभी की वजह से खुशी आपके जीवन से गायब हो गई है। खुशी पाने का एक बेहतर तरीका अपनी भावनाओं को व्यक्त करना है, इसलिए अपनी भावनाएं व्यक्त करने के लिए राह तलाशें। आप इन छोटे-छोटे तरीकों की मदद से खुद को खुश रख सकते हैं।
कृतज्ञता व्यक्त करें। इसे मन से महसूस करने का अभ्यास डालें।
क्षमा कर देने से मन की कड़वाहट धुलने लगती हैं। इसमें खुद को भी माफ कर देना शामिल है।
कुछ लोग जंगल या दूर पहाड़ी पर जाकर जोर-जोर चीखते हैं, खुद से बातें करते हैं।
रिश्तेदारों, दोस्त से मन की बातें साझा करें।
डायरी लेखन की आदत है, तो इससे दबी भावनाओं के प्रबंधन में मदद मिलेगी।
यदि लिख नहीं सकते तो बस कुछ पंक्तियां ही खींचकर भाव को बाहर आने दें।
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Apurva Srivastav
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