मनोरंजन

टीवी की दुनिया पर रोहित रॉय की दो टूक बयान सुनकर चौंक जाएंगे

Ratna Netam
12 Sept 2026 4:58 PM IST
टीवी की दुनिया पर रोहित रॉय की दो टूक बयान सुनकर चौंक जाएंगे
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मुंबई। अभिनेता रोहित रॉय अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। फिल्मों, टेलीविजन और ओटीटी में काम कर चुके रोहित ने अब टीवी इंडस्ट्री की मौजूदा स्थिति को लेकर बेहद तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने टेलीविजन को लेकर ‘कूड़ेदान का मीडियम’ जैसे कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया और टीवी एक्टर्स की बढ़ती भीड़ पर सवाल उठाए। उनके बयान के बाद मनोरंजन जगत में एक बार फिर टीवी कंटेंट की गुणवत्ता, कलाकारों की पहचान और इंडस्ट्री में तेजी से बदलते कामकाज को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
रोहित रॉय खुद लंबे समय तक टेलीविजन का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में टीवी को लेकर उनकी टिप्पणी ज्यादा ध्यान खींच रही है। उनका कहना है कि एक दौर में टेलीविजन पर आने वाले कलाकारों को दर्शक उनके नाम और किरदारों से पहचानते थे, लेकिन अब इंडस्ट्री में कलाकारों की संख्या इतनी ज्यादा हो गई है कि कई चेहरे दर्शकों के लिए अनजान रह जाते हैं।
उनकी टिप्पणी को पूरे टीवी माध्यम के बजाय मौजूदा व्यवस्था और कंटेंट की गुणवत्ता को लेकर उनकी नाराजगी के तौर पर भी देखा जा रहा है।
टीवी एक्टर्स की ‘भीड़’ पर उठाया सवाल
रोहित रॉय ने टीवी कलाकारों की बड़ी संख्या का जिक्र करते हुए इंडस्ट्री की मौजूदा स्थिति पर सवाल उठाया। उनका मानना है कि पहले टेलीविजन में सीमित संख्या में कलाकार और शो होते थे। इससे दर्शकों का कलाकारों के साथ मजबूत जुड़ाव बनता था।
अब मनोरंजन चैनलों और कार्यक्रमों की संख्या बढ़ने के साथ बड़ी संख्या में नए कलाकार भी इंडस्ट्री में आ रहे हैं। कई कलाकार एक शो में दिखाई देते हैं और शो खत्म होने के बाद लंबे समय तक स्क्रीन से गायब हो जाते हैं।
रोहित का इशारा इसी बदलाव की तरफ था। उनके मुताबिक आज टीवी एक्टर्स की भीड़ को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इंडस्ट्री किस तरह बदल गई है।
एक समय घर-घर पहचाने जाते थे टीवी सितारे
भारतीय टेलीविजन के शुरुआती दौर में धारावाहिकों की संख्या सीमित थी। किसी लोकप्रिय शो का किरदार निभाने वाला कलाकार कुछ ही समय में घर-घर पहचाना जाने लगता था।
रामायण, महाभारत, हम लोग, बुनियाद और बाद के दौर में क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कहानी घर घर की और कसौटी जिंदगी की जैसे धारावाहिकों ने कई कलाकारों को बड़ी पहचान दिलाई।
टीवी सितारों की लोकप्रियता कई बार फिल्मी कलाकारों को टक्कर देती थी। दर्शक रोजाना अपने पसंदीदा किरदार को देखते थे और उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव महसूस करते थे।
समय के साथ चैनलों की संख्या बढ़ी, शो की संख्या बढ़ी और नए कलाकारों के लिए अवसर भी बढ़े। लेकिन इसके साथ प्रतिस्पर्धा कई गुना हो गई।
रोहित रॉय का टीवी से पुराना रिश्ता
रोहित रॉय की पहचान भी टेलीविजन के जरिए बड़े स्तर पर बनी। उन्होंने कई चर्चित टीवी कार्यक्रमों में काम किया और बाद में फिल्मों तथा दूसरे माध्यमों में भी अपनी जगह बनाई।
यही वजह है कि जब टीवी से लंबे समय तक जुड़े रहे कलाकार की तरफ से माध्यम को लेकर इतनी कठोर टिप्पणी आती है तो उसकी चर्चा होना स्वाभाविक है।
उनका बयान टीवी से दूरी बनाने या उसके योगदान को पूरी तरह नकारने से ज्यादा इंडस्ट्री की मौजूदा दिशा पर सवाल उठाता दिखाई देता है।
रोहित पहले भी अभिनय, स्टारडम और मनोरंजन उद्योग से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखते रहे हैं।
कंटेंट की गुणवत्ता पर पुरानी बहस
टीवी कंटेंट की गुणवत्ता को लेकर बहस नई नहीं है। लंबे समय से आलोचक यह सवाल उठाते रहे हैं कि हिंदी टेलीविजन पर कई धारावाहिक एक जैसे पारिवारिक विवाद, रिश्तों की उलझन और लंबे समय तक खिंचने वाली कहानियों पर निर्भर हो गए हैं।
कई बार लोकप्रिय शो को वर्षों तक चलाने के लिए कहानी में लगातार नए ट्विस्ट जोड़े जाते हैं। लीप, किरदारों की वापसी और अचानक होने वाले बड़े खुलासे टीवी धारावाहिकों में आम हो चुके हैं।
दूसरी ओर टीवी इंडस्ट्री से जुड़े लोगों का तर्क है कि दैनिक धारावाहिक बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। बहुत कम समय में लगातार एपिसोड तैयार करने पड़ते हैं और टीआरपी का दबाव भी बना रहता है।
ऐसे में टीवी की गुणवत्ता पर चर्चा करते समय इस कारोबारी मॉडल को भी समझना जरूरी है।
OTT ने बदल दिया दर्शकों का स्वाद
पिछले कुछ वर्षों में ओटीटी प्लेटफॉर्म के विस्तार ने मनोरंजन उद्योग को पूरी तरह बदल दिया है। दर्शकों के पास अब टीवी के अलावा वेब सीरीज, फिल्में और अलग-अलग भाषाओं का कंटेंट देखने के कई विकल्प मौजूद हैं।
ओटीटी पर दर्शक अपनी सुविधा के अनुसार कार्यक्रम देख सकता है। वहीं कहानियों की लंबाई भी सामान्यतः सीमित होती है। इससे निर्माताओं को अलग-अलग विषयों और प्रयोगात्मक कंटेंट पर काम करने की ज्यादा गुंजाइश मिलती है।
यही वजह है कि कई टीवी कलाकार भी अब ओटीटी की तरफ रुख कर रहे हैं। वहां उन्हें पारंपरिक टीवी किरदारों से अलग भूमिकाएं निभाने का अवसर मिलता है।
रोहित रॉय भी अलग-अलग माध्यमों में काम कर चुके हैं, इसलिए उनका नजरिया टीवी और डिजिटल मनोरंजन के बीच आए बदलाव से जुड़ा माना जा सकता है।
क्या टीवी कलाकारों को कम मिलता है सम्मान?
मनोरंजन उद्योग में लंबे समय से ‘टीवी एक्टर’ और ‘फिल्म एक्टर’ की पहचान को लेकर चर्चा होती रही है। कई टीवी कलाकारों ने अलग-अलग मौकों पर कहा है कि फिल्मों में काम तलाशते समय उन्हें केवल टीवी कलाकार के रूप में देखा जाता है।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में यह अंतर कुछ हद तक कम हुआ है। कई कलाकारों ने टीवी से शुरुआत करके फिल्मों और ओटीटी में बड़ी सफलता हासिल की है।
इसके बावजूद इंडस्ट्री में माध्यम के आधार पर कलाकारों की अलग पहचान अब भी दिखाई देती है।
रोहित रॉय की टिप्पणी इस व्यापक बहस को भी दोबारा सामने लाती है कि किसी कलाकार की प्रतिभा का आकलन उसके माध्यम से होना चाहिए या उसके अभिनय से।
सोशल मीडिया ने भी बदला स्टारडम
पहले किसी कलाकार को दर्शकों तक पहुंचने के लिए टीवी या सिनेमा पर निर्भर रहना पड़ता था। अब सोशल मीडिया ने यह तस्वीर पूरी तरह बदल दी है।
इंस्टाग्राम, यूट्यूब और दूसरे प्लेटफॉर्म पर कलाकार सीधे दर्शकों तक पहुंच सकते हैं। कई सोशल मीडिया क्रिएटर बिना टीवी या फिल्मों में काम किए लाखों लोगों के बीच पहचान बना चुके हैं।
इससे स्टारडम का पारंपरिक मॉडल भी बदल गया है। अब टीवी पर रोज दिखाई देना ही लोकप्रिय होने का एकमात्र रास्ता नहीं है।
दूसरी तरफ इससे मनोरंजन के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है। अभिनेता अब केवल दूसरे कलाकारों से नहीं बल्कि डिजिटल क्रिएटर्स और इंफ्लुएंसर्स से भी दर्शकों का ध्यान पाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं।
‘कूड़ेदान’ शब्द पर हो सकती है बहस
रोहित रॉय की टिप्पणी में इस्तेमाल किया गया ‘कूड़ेदान’ जैसा शब्द स्वाभाविक रूप से विवाद पैदा कर सकता है। टीवी इंडस्ट्री में हजारों कलाकार, लेखक, निर्देशक, तकनीशियन और दूसरे कर्मचारी काम करते हैं।
ऐसे में पूरे माध्यम के लिए कठोर शब्द का इस्तेमाल कई लोगों को आपत्तिजनक लग सकता है। दूसरी ओर रोहित की टिप्पणी को मौजूदा कंटेंट और इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली की आलोचना के रूप में देखा जा सकता है।
उनके बयान का पूरा संदर्भ यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि वह टेलीविजन को पूरी तरह खारिज कर रहे थे या उसके मौजूदा स्वरूप पर निराशा जाहिर कर रहे थे।
टीवी आज भी बड़ा माध्यम
ओटीटी और सोशल मीडिया के तेजी से बढ़ने के बावजूद भारतीय टेलीविजन की पहुंच अभी भी बहुत बड़ी है। खासतौर पर पारिवारिक दर्शकों के बीच टीवी धारावाहिक और रियलिटी शो लोकप्रिय बने हुए हैं।
टीवी की सबसे बड़ी ताकत उसकी व्यापक पहुंच है। देश के छोटे शहरों और कस्बों तक टेलीविजन मनोरंजन का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है।
कई कलाकारों के लिए भी टीवी आज तक करियर की शुरुआत करने और बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचने का महत्वपूर्ण मंच है।
इसलिए टीवी की समस्याओं और कंटेंट की आलोचना के साथ उसके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बयान ने छेड़ी नई बहस
रोहित रॉय के बयान के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि भारतीय टेलीविजन को बदलते दर्शकों के हिसाब से खुद में कितना बदलाव करने की जरूरत है।
क्या लंबे चलने वाले दैनिक धारावाहिकों की जगह सीमित एपिसोड वाली कहानियों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए? क्या नए लेखकों और विषयों को ज्यादा अवसर मिलना चाहिए? और क्या कलाकारों को केवल टीआरपी आधारित मॉडल से अलग प्रयोग करने की ज्यादा स्वतंत्रता मिलनी चाहिए?
ये ऐसे सवाल हैं जिन पर टीवी इंडस्ट्री में लंबे समय से चर्चा होती रही है।
फिलहाल रोहित रॉय की टिप्पणी ने इस बहस को नई हवा दे दी है। उनकी भाषा भले ही बेहद तीखी हो, लेकिन इसके केंद्र में टीवी इंडस्ट्री की बदलती पहचान, कलाकारों की बढ़ती संख्या और कंटेंट की गुणवत्ता का सवाल है। अब देखना होगा कि टेलीविजन से जुड़े दूसरे कलाकार और निर्माता इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं।
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