सम्पादकीय

सियासत में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

Gulabi Jagat
22 May 2026 8:42 PM IST
सियासत में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
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आज हिमाचल प्रदेश की महिलाएं केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं। वे प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस विभाग, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन तथा तकनीकी क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं…
हिमाचल प्रदेश सदैव सामाजिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण के क्षेत्र में अग्रणी राज्यों में गिना जाता रहा है। इसी क्रम में महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी प्रदेश ने देश के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। आज हिमाचल प्रदेश की महिलाएं केवल घर-परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सेना, न्यायपालिका और सामाजिक नेतृत्व जैसे अनेक क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा और क्षमता का लोहा मनवा रही हैं। विशेष रूप से पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने प्रदेश के लोकतंत्र को अधिक समावेशी और मजबूत बनाया है। हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2008 से पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू करके पूरे देश में एक नई मिसाल कायम की थी। यह निर्णय केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं था, बल्कि महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया का अभिन्न अंग बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल थी। एक समय ऐसा था जब समाज में महिलाओं की भूमिका को केवल चूल्हा-चौका तक सीमित समझा जाता था।
महिलाओं को घर की चारदीवारी में ही रहने योग्य माना जाता था और यह धारणा प्रचलित थी कि वे पुरुषों के समान जिम्मेदारियां नहीं निभा सकतीं। किंतु बदलते समय, शिक्षा के प्रसार और सामाजिक जागरूकता ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया। आज हिमाचल की महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी दक्षता, मेहनत और नेतृत्व क्षमता का परिचय दे रही हैं। प्रदेश में होने वाले पंचायती राज चुनावों में महिलाओं की भागीदारी इस परिवर्तन का सबसे बड़ा उदाहरण है। हिमाचल प्रदेश की 3754 पंचायतों में 26, 28 और 30 मई को तीन चरणों में मतदान आयोजित किया जा रहा है। पंचायती राज संस्थाओं में कुल 31214 पदों पर चुनाव होने हैं, जिनमें से 15656 पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि प्रदेश सरकार महिलाओं को राजनीतिक नेतृत्व में समान अवसर प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। इन चुनावों में लगभग 1900 पंचायतों की प्रधानी महिलाओं के हाथों में होगी। पंचायत सदस्य पदों के लिए 12709 महिलाएं चुनी जाएंगी, जबकि पंचायत समिति सदस्य के लिए 919 तथा जिला परिषद सदस्य के लिए 128 महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा। पंचायत प्रधानों के कुल 3758 पदों में से 453 पद अनुसूचित जाति वर्ग के लिए, 508 पद अनुसूचित जाति महिलाओं के लिए, 138 पद अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए तथा 151 पद अनुसूचित जनजाति महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 116 तथा ओबीसी महिलाओं के लिए 146 पद निर्धारित किए गए हैं। हर वर्ग की महिलाओं की राजनीति में भागीदारी से समाज में समरसता और समानता को बढ़ावा मिलता है। यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन की कहानी है। महिलाओं को नेतृत्व का अवसर देकर हिमाचल प्रदेश ने यह सिद्ध किया है कि लोकतंत्र तभी मजबूत हो सकता है जब समाज के प्रत्येक वर्ग को समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो। जिस प्रदेश में महिलाओं की जनसंख्या पुरुषों के लगभग बराबर हो, वहां महिलाओं को नेतृत्व करने का समान अधिकार मिलना अत्यंत आवश्यक है। भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार हिमाचल प्रदेश की कुल जनसंख्या 6864602 है, जिसमें पुरुषों की संख्या 3481873 तथा महिलाओं की संख्या 3382729 है।
यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि प्रदेश की सामाजिक संरचना में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए शासन और प्रशासन में उनकी भूमिका सुनिश्चित करना समय की मांग भी है और लोकतांत्रिक आवश्यकता भी। आज हिमाचल प्रदेश की महिलाएं केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं। वे प्रशासनिक सेवाओं, पुलिस विभाग, शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन तथा तकनीकी क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। प्रदेश की बेटियां भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, न्यायपालिका, सेना तथा अन्य प्रतिष्ठित सेवाओं में अपनी उत्कृष्ट पहचान बना रही हैं। यही कारण है कि आज समाज में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल रहा है। कुछ दशक पहले तक यह कल्पना करना भी कठिन था कि महिलाएं बस चालक, टैक्सी चालक, कलेक्टर, पुलिस अधिकारी या चुनाव अधिकारी के रूप में कार्य करेंगी। लेकिन आज हिमाचल प्रदेश में महिलाएं सरकारी बसों का संचालन कर रही हैं, प्रशासनिक पदों पर कार्यरत हैं, चुनाव प्रक्रिया का संचालन कर रही हैं तथा अनेक ऐसे क्षेत्रों में सफलतापूर्वक कार्य कर रही हैं जिन्हें कभी ‘पुरुष प्रधान’ माना जाता था। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। पहले मतदान प्रक्रिया की जिम्मेदारी मुख्यत: पुरुष अधिकारियों और कर्मचारियों के हाथों में होती थी, लेकिन आज महिला मतदान अधिकारी, प्रेक्षक, पुलिस कर्मी तथा प्रशासनिक अधिकारी चुनावी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। महिलाएं न केवल चुनावी प्रक्रिया को कुशलता से संचालित कर रही हैं, बल्कि अपनी ईमानदारी, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के कारण प्रशासनिक कार्यों में नई पहचान भी स्थापित कर रही हैं।
हाल ही में नगर निगम मंडी चुनावों के दौरान महिला अधिकारियों और कर्मचारियों के माध्यम से चुनावी प्रक्रिया को देखने और समझने का अवसर प्राप्त हुआ। इस चुनाव प्रक्रिया में सहायक रिटर्निंग अधिकारी के रूप में कार्य कर रहीं रुपिंदर कौर, जो एक महिला आईएएस अधिकारी हैं, ने अत्यंत कुशलता और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर पूरी चुनावी प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न करवाया। विशेष बात यह रही कि उनके साथ कार्य करने वाली अधिकांश कर्मचारी महिलाएं थीं, जिन्होंने समर्पण, अनुशासन और जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्व निभाए। चुनावों के दौरान अनेक नई चुनौतियां सामने आती हैं। कानून व्यवस्था बनाए रखना, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, मतदाताओं की सहायता, तकनीकी समस्याओं का समाधान तथा निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करना अत्यंत कठिन कार्य होते हैं। किंतु आज महिलाएं इन सभी चुनौतियों का डटकर सामना कर रही हैं।
डा. कर्म सिंह ठाकुर
स्वतंत्र लेखक
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