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Editorial : अभी तो आम आदमी पार्टी (आप) के 7 राज्यसभा सांसदों ने दलबदल किया है और भाजपा के पाले में चले गए हैं। पंजाब के 50-60 विधायक भी पार्टी नेतृत्व से नाराज और असंतुष्ट हैं। वे ‘आप’ की बिखरती ईकाई हैं। रपटें ये भी हैं कि भाजपा ‘आप’ के 3 लोकसभा सांसदों को भी तोडऩे के मिशन में जुट गई है। यह कोई सामान्य दलबदल अथवा राजनीतिक टूट, बिखरन नहीं है। बेहद अहम राजनीतिक घटना है, जो कमोबेश ‘आप’ का परिदृश्य बदल सकती है। इस बगावत ने पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल के गुमान को खंडित कर दिया है। केजरीवाल मात्र दो साल के लिए संयोजक बने थे, लेकिन 2018 में पार्टी संविधान में संशोधन कराया गया। अब केजरीवाल हमेशा के लिए पार्टी के ‘आलाकमान’ हो गए हैं। ‘आप’ 14 साल पुरानी पार्टी हो गई है। कार्यकर्ताओं और नेताओं के एक गुट को ‘आलाकमान संस्कृति’ पसंद नहीं है, नतीजतन बिखराव और टूटन शाश्वत हो गई है। केजरीवाल कहा करते थे कि ‘आप’ के कार्यकर्ता और नेता इतने मजबूत हैं कि उन्हें कोई भी लालच, पैसा, पद या जांच एजेंसियों का दबाव तोड़ नहीं सकता। उन्हें ऐसे साथियों पर गर्व और गुमान है। राज्यसभा सांसदों की टूट और उनके भाजपा में शामिल होने की घटना ने तमाम धारणाएं खंडित की हैं और सवाल उठाए हैं कि आखिर राघव चड्ढा और संजीव पाठक ने बगावत क्यों की? राघव पेशेवर चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं और संजीव पाठक आईआईटी प्रोफेसर थे। वे तो केजरीवाल के ‘प्रियतम’ में एक थे। उन्हें केजरीवाल ही राजनीति में लाए और संसद के सर्वोच्च सदन तक पहुंचने का मौका दिया।
कमोबेश इन दोनों ‘आप’ नेताओं का अलग होना और अंतत: भाजपा में शामिल होना बहुत बड़ा आश्चर्य है। केजरीवाल को आत्ममंथन, आत्मचिंतन करना चाहिए कि ऐसे लोग पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं? इन दोनों नेताओं पर किसी ‘दागदार मामले’ की छाया तक नहीं है, जो सीबीआई या ईडी की जांच का डर, खौफ हो। शेष सांसद या तो उद्योगपति हैं अथवा हरभजन की तरह पेशेवर हैं। अशोक मित्तल को तो इसी माह राज्यसभा में ‘आप’ संसदीय दल का उपनेता बनाया गया था। 15 अप्रैल को ईडी ने उनकी ‘लवली यूनिवर्सिटी’ और अन्य ठिकानों पर छापेमारी की और 24 अप्रैल को वह टूट कर भाजपा की गोद में आ गए। मित्तल यूनिवर्सिटी के चांसलर भी हैं। साफ है कि जांच एजेंसियों के प्रभाव और जेल जाने की संभावनाएं अपना काम जरूर करती हैं, लिहाजा नेतागण दलबदल करने को विवश होते हैं। बहरहाल इस टूटन के अंतिम फलितार्थ ऐसे हो सकते हैं कि ‘आप’ राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा खो सकती है। सबसे अहम संकट और चुनौती पंजाब में है, क्योंकि वहां विधानसभा चुनाव फरवरी, 2027 में होने हैं। बेशक विधायकों के टूटने की आशंका तो है, लिहाजा मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात का समय मांगा है। मुख्यमंत्री राष्ट्रपति से मांग करना चाहते हैं कि जो पंजाब विधायकों के वोट से राज्यसभा सांसद चुने गए थे, उन्हें ‘अयोग्य’ करार दिया जाए। सवाल है कि राष्ट्रपति किसी भी सांसद को ‘अयोग्य’ कैसे घोषित कर सकते हैं? यह संवैधानिक अधिकार उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा सभापति को ही है, जिसकी अपनी एक प्रक्रिया है। ‘आप’ संसदीय दल के नेता संजय सिंह भी सभापति राधाकृष्णन को पत्र लिख कर सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग करेंगे। यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि भाजपा ने तमाम औपचारिकताएं पहले ही पूरी करवा रखी हैं। इस दलबदल से राज्यसभा में भाजपा के 113 सदस्य हो जाएंगे। सामान्य बहुमत से मात्र 10 सांसद ही कम हैं।





