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- ये पंजाबी संगीत उत्सव

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शिमला के विंटर कार्निवल के पीछे कांगड़ा कार्निवाल खड़ा है या हरोली उत्सव की तर्ज पर इंदौरा उत्सव पड़ा है। हिमाचल में अब ये उत्सव, बे-उत्सव होने लगे हैं। जिला स्तरीय उत्सवों को ठीक से ये याद नहीं होता कि वे कब राज्य स्तरीय हो गए, लेकिन उत्सवों के खेल में विरासत गुम हो गई है। कभी कुल्लू दशहरा महोत्सव का सीधा मुकाबला मैसूर दशहरा से होने लगा था। वहां अंतरराष्ट्रीय गीत-संगीत की टोलियां सारे वातावरण को मदहोश करती थीं, तो देश हमारी संस्कृति, परंपराओं और पर्यटन की लियाकत बढ़ा देता था। क्या ङ्क्षमजर विसर्जन या मंडी शिवरात्रि के जलेब को देखना या अनुभव करना एक सौगात नहीं, लेकिन अब पगडिय़ों की बारात में महज राजनीतिक शो होता है, वहां न समाज और न ही समाज की प्रतिष्ठित हस्तियां दिखाई देतीं। मिंजर में ‘कुंजड़ी मल्हार’ या देव परंपरा में बजंतरियों के ताल पर अगर हिमाचल की संस्कृति-हिमाचल की आभा नाचती, तो मेलों में हडक़ंपी संगीत न पनपता। आश्चर्य यह कि प्रशासन की मिलकीयत में हिमाचल के सांस्कृतिक समारोहों ने आर्केस्ट्रा व गीत-संगीत का आयात करना शुरू कर दिया है। इन उत्सवों का बजट कई गुना बढ़ गया है, लेकिन खर्च की रसीदों में हिमाचल का लोक संगीत व स्थानीय कलाकार का कद बेहद छोटा होने लगा है। अभी कार्निवाल उतर रहे हैं और भाजपा ने विरोध की तंग गलियों में अपना बसेरा बना कर आय-व्यय में सियासत शुरू कर दी, लेकिन यह नहीं पूछा कि इन उत्सवों में हिमाचल है कहां। क्यों वे चेहरे खोजे जाते हैं, जिनके सरोकार और न ही माटी की दरकार हमसे मेल खाती है।
चिंतपूर्णी में मां की गरिमा के लिए जो उत्सव अंब को निढाल कर गया, वहां का अमृतपान एक पंजाबी सिंगर अमृत मान को मिला। हमारा यश, हमारी कीर्ति और सारी कसौटी पर हर बार और कितनी बार ये पंजाबी कलाकार सारी पंूजी बटोरते रहेंगे। यह हिमाचली समुदाय की कसौटी है या प्रशासनिक अधिकारियों की बपौती कि सारा तामझाम और उत्सवों की कमाई बाहरी कलाकारों की लुगाई बन जाए। अब इंदौरा उत्सव की मूंछें पहन कर लखविंदर वड़ाली का ही उत्सव बन जाए, तो विधायक महोदय को इस नेक कार्य के लिए प्रणाम। इसी क्षेत्र से हिमाचल के कई नामी गायक मसलन सुनील मस्ती, अनुज शर्मा, कुमार साहिल, काकू राम ठाकुर इत्यादि भी तो हो सकते थे। हो सकता है अगले साल विधायक पंजाबी गायकों का एक और बड़ा नाम खरीद लें, लेकिन ऐसे महोत्सवों की खरीद-फरोख्त में उनके अपने क्षेत्र के कई गायक-कलाकार हारेंगे जरूर। इसी क्षेत्र के कटनोरिया मिंटू के कई गाने हाल ही में यू ट्यूब पर छाए हैं, तो क्या इंदौरा उत्सव के लिए जुटाई गई राशि से माननीय विधायक मलेंद्र राजन के पास उनके लिए चवन्नी भी नहीं थी। इधर धर्मशाला कार्निवाल की सौगात में कांगड़ा के ही गायक उपेक्षित हैं, तो करनैल राणा, संजीव दीक्षित, धीरज शर्मा, ईशांत भारद्वाज व सुनील राणा जैसे लोक संस्कृति को समर्पित कलाकारों को कब स्वतंत्र नाइट व सम्मानजनक पारिश्रमिक मिलेगा। आश्चर्य यह है कि पर्यटन एवं संस्कृति के नाम पर सजने वाली महफिलों को हुल्लड़ बाजी या पंजाबी गानों के शोर को हिमाचली कानों में भरने का इंतजाम किया जाता है। कांगड़ा कार्निवाल का सबसे बड़ा तोहफा या पारिश्रमिक का लोहा मनवाने इस बार आएंगे बब्बूमान तथा कंवर ग्रेवाल और तब हमारी बोलियों का एहसास परवान चढ़ जाएगा।
शिमला कार्निवाल में सतिंदर सरताज और शाबान शाबरी की आवाज जादू दिखाएगी तो इसके सामने अजय चौहान की ‘नाटी सिरमौर वालिए’ की क्या औकात रह जाएगी। वो हंस राज रघुवंशी जो अपने गायन की प्रतिभा से अयोध्या के फलक पर ‘राम’ का गुणगान और सद्गुरु जग्गी वासुदेव के शिवरात्रि समारोह की शान बन जाते हैं, उनके लिए क्या एक संगीतमयी शाम भी हिमाचल उपलब्ध नहीं करा सकता। क्या गीता, ममता भारद्वाज, कुलदीप शर्मा, ठाकुर दास राठी, विक्की चौहान, इंदरजीत, मोहित चौहान, अजय चौहान व अरुण जस्टा सरीखे हिमाचली कलाकारों के नाम से हिमाचली उत्सव नहीं चल सकते। विडंबना यह कि प्रदेश के लोक रंगमंच, करयाला, बांठडा, भगत, हरण यात्तर, बुदेछु, बरलाज को तो सांस्कृतिक समारोहों ने अछूत ही बना दिया है। यह भी तब जब सरेआम सांस्कृतिक समारोहों, कार्निवालों तथा तमाम हिमाचली उत्सवों व मेलों की अस्सी फीसदी कमाई बाहरी कलाकारों पर व्यय हो रही है। भाजपा नेताओं का विरोध केवल सियासी है, असली बात तो यह कि उन्हें हिमाचली कलाकारों के पक्ष में आवाज उठाते हुए यह मांग करनी होगी कि ऐसे समारोहों की कम से कम पचास फीसदी आय से हिमाचली कला व कलाकारों को प्रोत्साहन मिले।
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