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आज स्मार्टफोन हमारी दिनचर्या का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। इस छोटे से उपकरण ने हमारे दैनिक जीवन को काफी सुविधाजनक बनाया है। लेकिन हर चमकती चीज सोना नहीं होती ! एक हालिया अध्ययन के अनुसार, यह केवल एक मददगार डिवाइस भर नहीं रह गया है, यह एक ऐसे 'परजीवी' का रूप ले चुका है, जो हमारा समय, ध्यान और मानसिक शांति चुपके से चूस लेता है।
स्मार्टफोन के इस दोहरे चरित्र और उसके परजीवी रूप पर दो आस्ट्रेलियाई विज्ञानियों राचेल एल. ब्राउन और राब ब्रूक्स ने 'आस्ट्रेलियन जर्नल आफ फिलासफी' में एक शोधपरक आलेख लिखा है। इस लेख में उन्होंने यह तर्क दिया है कि स्मार्टफोन समाज के लिए विशिष्ट प्रकार के जोखिम की वजह बनते हैं, जो परजीविता के दृष्टिकोण से देखने पर और भी जाहिर हो जाता है। लेखकों के अनुसार, 'जूं, पिस्सू और टेपवर्म मानव के विकास क्रम में हमारे साथी रहे हैं। फिर भी, आधुनिक युग का सबसे बड़ा परजीवी खून चूसने वाला कोई जीव नहीं है। यह अपनी लत लगाने वाली वस्तु है। इसका मेजबान आज हर इंसान बन चुका है। यह टेक कंपनियों व उनके विज्ञापनदाताओं के हित में है। '
वर्ष 1921 में प्रख्यात विचारक क्रिश्चियन लुइस लैंग ने चेताते हुए कहा था, "तकनीक एक उपयोगी नौकर है, लेकिन एक खतरनाक मालिक है।" उन्होंने यह बात तब कही थी जब न तो कंप्यूटर आम उपयोग में थे, न ही इंटरनेट की कोई कल्पना की गई थी। आज उनकी यह बात पहले से कहीं अधिक सटीक प्रतीत होती है। आज लैपटाप, टैबलेट और स्मार्टफोन जैसे उपकरण हमारी दिनचर्या में इस तरह घुल-मिल चुके हैं। कि इनसे दूरी बना पाना लगभग असंभव लगता है। हम इनके गुलाम बन गए हैं।
स्क्रीन बार-बार देखे बिना हमें चैन नहीं मिलता। इसका खामियाजा हमें कई रूपों में भुगतना पड़ता है- अनिद्रा, सामाजिक संबंधों की गहराई में कमी और मानसिक स्थिति में चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं उभरना । डिजिटल जुड़ाव ने हमारे असली जीवन से दूरी पैदा कर दी है।
जैसे-जैसे स्मार्टफोन हमारी दिनचर्या का हिस्सा बनते गए, उनमें प्रयुक्त एप्स भी यूजर्स की आवश्यकताओं के बजाय विज्ञापनदाताओं के हितों की सेवा में लगने लगे। इन्हें इस तरह डेवलप किया गया है। कि वे हमारे व्यवहार को प्रभावित करें, हमें लगातार स्क्राल करते रहने, विज्ञापनों पर ध्यान देने और उनमें उलझे रहने के लिए बाध्य करें। यह तकनीकी हस्तक्षेप खुले रूप में नहीं, बल्कि बहुत ही सूक्ष्म ढंग से होता है। हमारा आकर्षण किसी संयोग का नतीजा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे एक पूरी प्रणाली काम कर रही होती है जो हमारे व्यवहार का अनुमान लगाकर हमें उसी दिशा में प्रेरित करती है। जरूरत यह समझने की है कि तकनीक हमारे लिए बनी है, हम उसके लिए नहीं ।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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