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विजय गर्ग : आज सोचने-समझने का स्वरूप किस कदर बदल रहा है, इसका अंदाजा इस उदाहरण से लगाया जा सकता है कि एक परिचित व्यक्ति ने कार की साफ-सफाई करते हुए अपनी कोई तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा कर दी, तो उसे यह कहा गया कि 'क्या महोदय, आप खुद अपनी कार की साफ-सफाई करते हैं ? इसके लिए तो आजकल बड़े आराम से आदमी मिल जाते हैं, जो मात्र हजार रुपए में पूरे महीने कार की साफ-सफाई कर देते हैं।' किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को नई पीढ़ी की इस सोच पर आश्चर्य से ज्यादा खेद होगा । नई पीढ़ी में यह कैसी सोच विकसित हो रही है ? माना कि बाजार इस युग में हर काम के लिए आदमी सुलभ है, पर घर के छोटे- मोटे काम जो हम स्वयं बड़ी आसानी से कर सकते हैं, उसके लिए हम किसी बाहरी व्यक्ति पर निर्भर क्यों हों ?
कुछ साल पहले तक ज्यादातर लोग घर के कई काम स्वयं कर लेते थे। जैसे पानी की टंकी में घुसकर उसे साफ करना । दीपावली के स्वच्छता अभियान में छत से पंखे उतार लेना, उसकी पंखुड़ियों को अलग कर उनकी सफाई कर फिर जोड़कर पंखें को वापस लगा देना। महीने दो महीने में पानी का भरा हौद खाली करके उसकी सफाई कर देना। उन दिनों बिजली के लिए घरों में एमसीबी के स्थान पर 'फ्यूज' होते थे जो बिजली के जरा से उतार-चढ़ाव के साथ ही जल जाते थे, जिसे 'फ्यूज' उड़ना कहा जाता था । 'फ्यूज' को अपनी जगह से निकाल कर उसमें तांबे का तार बांधना थोड़ा खतरनाक काम था, पर उस काम को भी बड़ी कुशलता से कर लिया जाता था । दीपावली के समय रोशनी के लिए लगाई गई झालर खराब होने पर ' टेस्टर' की सहायता से खराब बल्ब को खोजकर उसके स्थान पर नया बल्ब जोड़ना उस समय बच्चों के लिए एक खेल होता था । पानी की मोटर, कूलर और पंखों के सामान और कूलर के पम्प आसानी से बदल दिए जाते थे । पानी के पाइपों और नलों की छोटी-मोटी टूट-फूट के लिए हमें कभी अन्य व्यक्ति की आवश्यकता नहीं पड़ी। पेड़-पौधों की कटाई- छंटाई और देखभाल आमतौर पर हम खुद कर लेते थे। उस दौर में साइकिल या स्कूटर के पंचर तक भी लोग खुद ही जोड़ लेते थे। स्कूटर मोटर साइकिल के स्टार्ट न होने पर प्लग को खोलकर बड़ी आसानी से साफ कर लिया जाता था। अगर घर का निर्माण कार्य चल रहा होता था तो परिवार के सदस्य बिना किसी शर्म संकोच के ईंट-पत्थर ढो लेते | बच्चों के लिए तो यह काम कम, एक प्रकार का खेल ही होता था ।
धीरे-धीरे समय बदला । बाजार ने आदमी की सोच को गहरे तक प्रभावित किया और उसकी धारणाओं को भी बदला । अब लोग अपने ही घर के छोटे-मोटे कामों को करना अपने स्टेट्स सिंबल या हैसियत के प्रतीक के विपरीत समझने लगे। जिन लोगों ने ऐसे काम करना नहीं छोड़ा, उन्हें कंजूस समझा जाने लगा और उसके पड़ोसियों एवं परिचितों द्वारा उसे हेय दृष्टि से देखा जाने लगा। नई पीढ़ी की स्थिति तो यह हो गई है कि छोटे-मोटे औजारों को हाथ में पकड़ना ही उन्हें अपमानजनक लगने लगा है। आज बाजारवाद ने हमें बहुत अधिक पराश्रित कर दिया है। दिखावे की हैसियत के मारे हम लोग दूसरों पर इतने निर्भर होते जा रहे हैं कि बाजार हमारी इस आरामपरस्ती को भुनाने में लगा हुआ है। आज हमारा मोबाइल दुनिया भर के एप से भरे हुए हैं। छोटे से छोटे काम के लिए भी हमारी युवा पीढ़ी मोबाइल एप का प्रयोग करती है और आदमी हाजिर हो जाता है। दूसरों पर यह निर्भरता इतनी खतरनाक सिद्ध हुई है कि जो काम हम स्वयं कर सकते हैं, उसके लिए भी हमें दूसरों का मुंह देखना पड़ता है । आज की पीढ़ी के कितने ही युवाओं को घरेलू गैस सिलेंडर तक नहीं बदलना आता ।
साधन-सुविधाओं का उपभोग एक हद तक ठीक है, पर हमें दूसरों पर इतना भी निर्भर नहीं होना चाहिए कि हमारे दिमाग और शरीर दोनों को ही जंग लग जाए। अगर हम अपने घर के छोटे- मोटे काम खुद करने लग जाएं तो इससे हमारी दिमागी और शारीरिक दोनों तरह की कसरतें हो जाएंगी, साथ ही कड़ी मेहनत से कमाया गया हमारा धन भी व्यर्थ खर्च होने से बच जगा। सभी माता-पिता को इस बारे में सोचना चाहिए कि वे अपने बच्चों को अपना काम स्वयं करने की शिक्षा दें। खुद बच्चे का काम न करें, बल्कि उन्हें इस ढंग से प्रेरित करें कि बच्चा स्वयं ही उस काम को करने लगे। बच्चों का पालन- पोषण इस प्रकार से हो कि वे कभी भी दूसरों पर निर्भर न रहें। बच्चों के सामने कभी भी अपने पैसे, पद और रुतबे का प्रदर्शन न करें । 'स्टेट्स सिंबल' जैसे शब्दों से या तो अपने बच्चे को दूर रखने का प्रयास करें या उन्हें समझाएं कि अपने घर का काम करना किसी भी प्रकार से रुतबे या हैसियत के विरुद्ध नहीं है । आज जब देश भयंकर बेरोजगारी की मार से जूझ रहा है, युवाओं को आत्मनिर्भर बनने का मंत्र दिया जा रहा है, देश के विभिन्न राज्य व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने लगे हैं, तरह- तरह के उद्यम कार्यक्रमों के तहत युवा पीढ़ी में विभिन्न प्रकार के कौशल विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ऐसे में ये छोटे-मोटे घरेलू कार्य हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण और प्रभावकारी सिद्ध हो सकते हैं। आज की युवा पीढ़ी को यह बताना बेहद आवश्यक है कि छोटे-मोटे कामों के लिए दूसरों का मुंह ताकना अच्छी बात नहीं। जो काम हम स्वयं कर सकते हैं, उसके लिए बाजार के भरोसे रह कर अपनी क्षमता को यों ही व्यर्थ या कुंद नहीं करना चाहिए ।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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