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- कहानी : विजय पताका

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विजय गर्ग: "ऐसा कीजिये, दोनों बच्चियों की यूनिफार्म के दो-दो सेट्स और दे दीजिये", दुकानदर को पेमेंट कर मैंने सारे पैकेट्स उठाए और बाहर किताबों के बण्डल पकड़े खड़े अपने चपरासी माधोसिंह को पकड़ाते हुए कहा, "हो गए सब काम, चलो"। सारे पैकेट्स कार में रखवा कर, मैंने माधोसिंह को ऑटो से ऑफिस वापस भेज दिया और खुद अपनी कार में, दोनों बच्चियों को घर छोड़ने आ गयी।
इतने समय से लगे-लगे अब जाकर सब काम पूरे हो पाए थे। सब काम - यानि अन्नू दी की अभय जीजाजी से डिवोर्स की प्रक्रिया और उनकी दोनों बच्चियों का एक अच्छे नामी स्कूल में एडमिशन। अब जाकर थोड़ी शांति मिली थी मुझे कि मेरे बाबा का यह काम तो पूरा कर पायी मैं।
दोनों बच्चियों को खाना खिलाकर मैंने और माँ ने भी खा लिया। जितना मैंने सोचा था, उससे काफी कम समय में ही बच्चियों के स्कूल में सारे काम हो गए थे। शायद इसलिए कि मिड-सेशन था और वर्किंग डे था। माँ ने मुझसे बहुत प्यार से कहा था थोड़ी देर आराम करने के लिए। मैंने भी सोचा कि अब अगली मीटिंग तो शाम छह बजे से ही है और बीच में इतना काम भी नहीं है, तो माँ के पास रुक ही जाती हूँ।
दोनों बच्चियाँ, थकी हुई तो थीं ही, लेटते ही सो गयी थीं। दूसरे पलंग पर माँ लेटी थीं। आज मैं भी थोड़ी हिम्मत करके माँ के बगल में ही आकर लेट गयी थी। वैसे तो मैं हमेशा अपने कमरे में ही लेटती थी। आशा के विपरीत, माँ लेटे-लेटे मेरे कंधे पर, सिर पर हाथ फेरने लगी थीं। बिलकुल नया सा अनुभव था यह मेरे लिए, जब माँ इस तरह मेरा दुलार कर रही थीं। कितना भरोसा, कितना आश्वासन मिल रहा था मुझे आज। जैसे अब मुझे संसार की कोई ताक़त नहीं हरा सकती। अभी तक तो यह मज़बूती सिर्फ बाबा से ही मिलती थी। आज माँ से मिली, तो अचानक बाबा मेरी आँखों के आगे आकर मुस्कुराने लगे थे, जैसे कह रहे हों, "देखा न, कैसे तूने अपनी माँ को भी जीत लिया मेरी अपराजिता, मेरी अप्पू” और हमेशा की तरह ज़ोर से हँसे थे ।
ऐसे में मुझे बाबा की कमी और अधिक खलने लगी। माँ भी शायद यही महसूस कर रही थीं, तभी अचानक बोल उठी थीं, "अप्पू, तू नाराज़ तो नहीं है मुझसे"?
चौंक उठी थीं मैं। जीवन में यह प्रथम अवसर था, जब माँ ने मुझसे ऐसा कुछ कहा था।
“ऐसे क्यों कह रही हैं आप”? इस बात से ही मेरा गाला भर आया था।
माँ भी चुप थीं, मैं भी चुप थी। दोनों सब कुछ जानते थे, सब कुछ समझते थे। कौन किसे समझाए? दोनों ही विगत के गर्त में डुबकी लगा चुके थे।
बाबा, माँ और हम तीन बहनों का मध्यम-वर्गीय परिवार था। माँ बाबा की पहली बेटी आनंदिता - यानि मेरी अन्नू दी - के जन्म के समय घर में खूब खुशियां मनायी गयी थीं। उनके दो वर्ष के होते-होते दूसरी संतान की आहट से सभी उत्साहित थे। दबी-दबी सी बेटे की चाहत भी थी इस बार। पर आयी दूसरी बेटी, अर्चिता, यानि मेरी अर्चू दी। पापा तो संतुष्ट थे अपनी दो बेटियों के परिवार के संग। पर माँ की एक बेटे की चाहत ने घर में एक और संतान का आगमन करवा दिया था। पर इस बार भी संतान के रूप में बेटे की जगह आयी थी, एक और बेटी, तीसरी बेटी यानि मैं - अपराजिता।
पहले हम सब एक साथ, दादाजी के घर में ही रहते थे। ताऊ, ताई, उनके दो बच्चे - बड़ी प्रियांशी दी और छोटा प्रगल्भ यानि बबलू। बबलू और मैं हमउम्र थे और माह भर के अंतर पर ही जन्मे थे। माँ अक्सर बतातीं थीं कि जब बबलू और मैं होने वाले थे, तब ताई और माँ दोनों ने एकसाथ गर्भावस्था का समय खूब एन्जॉय किया था। दोनों एक दूसरे की हर तरह से मदद करती थीं। दादी के गुस्से से एक दूसरे को बचाया करती थीं और सबसे छुप-छुप कर एक दूसरे को उसकी पसंद की चीज़ें भी खिलाया करती थीं। जब तक मेरा और बबलू का जन्म नहीं हुआ था, दोनों पक्की सहेलियां थीं । शायद ऐसे ही चलता भी रहता, पर ताई के यहाँ आये बेटे यानि बबलू, और माँ के यहाँ आयी तीसरी बेटी - यानि मैं - ने ताई का स्वागत दादी के पाले में करवा दिया था। बस, इसके बाद से ही दादी के माँ को दिए जाने वाले ताने, अक्सर ताई के मुँह से भी सुनायी देने लगे थे। ‘बेटे की माँ’ और ‘तीसरी बेटी की माँ’ की एक अनदेखी, मज़बूत दीवार दोनों के बीच खिंच चुकी थी, और इस तरह से, एक सीधी-सच्ची दोस्ती ने अपने अंत को प्राप्त किया था।
बाद में बेटा न होने के ताने सुनने से बेतरह दुखी माँ की ज़िद के चलते, हम लोग, यानि मेरे बाबा का परिवार, दादाजी का घर छोड़ कर इस नए घर में रहने चला आया था।
एक बार बहुत पहले, मेरे पड़ोस की एक आँटी मेरी दोनों बहनों से बता रही थीं, तभी मैंने भी सुन लिया था कि जब मेरा जन्म हुआ तब, जब नर्स ने मुझे माँ की गोद में पकड़ाना चाहा, तो यह सुनकर कि बेटी हुई है, माँ ने मुँह दूसरी ओर फेर लिया था और आँसुओं की कुछ बूँदें उनकी आँखों से छलक पड़ी थीं।
मेरे बचपन के दौरान भी, माँ मेरी ओर से उदासीन ही रहती थीं। जब किसी परीक्षा में मेरे नंबर अच्छे आते या मैं कक्षा में प्रथम आती, तब, जब कभी भी माँ मेरी ओर मुस्कुरा कर देख लेतीं, या बात करती थीं, तो मुझे लगता, जैसे मैं सातवें आसमान में उड़ रही हूँ, वरना अधिकतर तो वह मुझसे खिंची-खिंची सी ही रहती थीं। पर मेरे बाबा मेरा हौसला कभी कम नहीं होने देते थे। अक्सर वह मुझे गोद में बैठा कर कहते थे, "मेरी अप्पू क्या बेटों से कम है। देखना, यह बेटों की तरह काम भी करेगी और हमारा नाम भी रोशन करेगी । यह है मेरी अपराजिता", यह सुन माँ एक फीकी सी मुस्कान फेंक काम में व्यस्त हो जाती थीं।
जाने यह माँ की उस फीकी, दर्दभरी मुस्कान का असर था या बाबा के मेरे ऊपर भरोसे का नतीजा था कि मेरा पढ़ने-लिखने का शौक़ बढ़ता चला गया था । छुटपन से ही मुझे यह बात समझ में आ गयी थी कि जीवन में सफल होने के लिए, ख़ासकर माँ को खुश और प्रभावित करने के लिए, अच्छी पढ़ाई करना प्रथम अनिवार्यता थी। हर परीक्षा, हर टेस्ट में प्रथम आना जैसे मेरी आदत बन चुकी थी। मेरी दोनों बहनें भी पढ़ाई में बहुत अच्छी थीं।
परन्तु, खानदान में हम सबकी सहानुभूति के पात्र थे। हर कोई जैसे हम पर तरस खाता था। ताऊ हम लोगों के बचपन से ही बाबा को पैसा जोड़ने की सलाह देते थे। उनके अनुसार माँ-बाबा पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा है। कई बार मैं गुस्से में बाबा से कहती थी कि आप तो कहते हैं कि हम ताऊ के भी बच्चे हैं, तो हमारी शादी की ज़िम्मेदारी ताऊ की भी तो है और बबलू के होते आप को भी तो बेटे का सुख मिलना चाहिए। पर मेरी ऐसी बातों को बाबा हँसी में उड़ा दिया करते थे। फिर मुझे समझाया करते थे कि “हम सब एक परिवार हैं, भाई है वह मेरे। कोई कुछ भी करे, तुम लोगों को हमेशा सही काम करना है और सबको इज़्ज़त देनी है”।
उधर ताई भी अपने तौर-तरीकों से माँ को अक्सर नीचा दिखाती रहती थीं। मुझ पर तरस भरी गहरी नज़र डालते हुए "दो लड़कियां तो चलो, फिर भी ठीक हैं, पर तीसरा बच्चा तो लड़का ही होना चाहिए था" जैसे वाक्य कहने से नहीं चूकती थीं। ऐसे चुभते हुए वाक्य मेरे मन-मस्तिष्क में अपना डेरा जमाते जाते थे और मेरी और अच्छी पढ़ाई करने की इच्छा बलवती होती जाती थी।
अभी अन्नू दी ने बीस वर्ष भी पूरे नहीं किये थे कि एक दिन ताऊ उनके लिए एक रिश्ता लेकर आ गए थे। अन्नू दी बेहद मासूम सी, भोली-भाली रूपसी बाला थीं। ज़माने की ऊंच-नीच से पूरी तरह अन्जान । उस समय उन्होंने BA में प्रवेश लिया ही था। खानदान के किसी विवाह समारोह में, ताऊ के किसी दोस्त के बेटे अभय, अन्नू दी को देख उनके स्निग्ध सौंदर्य से अछूते नहीं रह पाए थे। महीने भर बाद ही ताऊ के माध्यम से उनके घर से अन्नू दी के लिए शादी के लिए प्रस्ताव आ गया था। अर्चू दी और मैंने काफी विरोध किया था इस विवाह का। पर ताऊ का मानना था कि ‘हीरे जैसा लड़का है। जाना-पहचाना घर-बार है। तीन-तीन बेटियां निपटानी हैं बाबा को, तो इस रिश्ते को हाथ से जाने देना निरी मूर्खता ही होगी’। यह सब बातें सुन-सुनकर अन्नू दी ने भी इस विवाह के लिए हामी भर दी थी। जल्दी ही हमारी हैसियत के अनुसार अन्नू दी का विवाह हो गया था।
तब तक मैं एक प्रतिष्ठित इंस्टिट्यूट से अपनी बीटेक की डिग्री ले चुकी थी। मेरा सपना था किसी अच्छी पीएसयू, यानि पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग में काम करना। मैंने गेट की परीक्षा भी बहुत अच्छी रैंक के साथ उत्तीर्ण की। इसके बाद मेरा सेलेक्शन मेरी ड्रीम पीएसयू में हो गया था। मुझे मेरी मंजिल दिख गयी थी। बस, अब मेहनत से आगे बढ़ना था।
इस बीच पता चला था,अर्चू दी किसी को पसंद करती हैं। मलय जीजाजी में कोई कमी नहीं थी, सिवाय इसके कि वह अभय जीजाजी के मुकाबले, रईसी में काफी नीचे के पायदान पर थे। हाँलाँकि समझ और संस्कारों में उनसे ऊंचे पायदान पर थे। दूसरे, उस समय तक अभय जीजाजी और उनके घरवालों की कलई उतरनी भी शुरू हो गयी थी। इसलिए उनसे अर्चू दी शादी तय कर दी गयी थी। अर्चू दी और मलय जीजाजी दोनों की नौकरी अच्छी थी। अर्चू दी अपनी ससुराल में खुश थी।
इधर अन्नू दी के, कभी हाथ में पट्टी बंधी होती, तो कभी चेहरे पर सूजन दिखाई देती। कभी खुलकर कुछ न बताने पर भी, हम काफ़ी कुछ समझने लगे थे। उन दिनों माँ-बाबा अर्चू दी के विवाह की तैयारियों में व्यस्त थे। बाबा अक्सर काफी परेशान दिखते थे। एक बार बहुत ज़िद करने मुझे मुझे पता चला कि उन्होंने सोच रखा है कि पहले अर्चू दी की शादी अच्छी तरह से निपट जाए, फिर आनंदिता को डिवोर्स दिलवा देंगे और बच्चियों का यहीं किसी अच्छे स्कूल में एडमिशन करवा देंगे। अन्नू की पढ़ाई पूरी करवा कर, उसे आत्मनिर्भर बनायेंगे । पर उस नारसिस्टिक आदमी के साथ अब अपनी बेटी को नहीं रहने देंगे। ज़ाहिर है, माँ-बाबा के साथ, अब यह मेरा भी लक्ष्य बन चुका था।
परन्तु नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। अर्चू दी की शादी की बाद से ही बाबा को सीने में हल्का-हल्का दर्द रहना शुरू हो गया था और जल्दी ही वह परलोकवासी हो गए थे। हमारी दुनिया उजड़ गयी थी। अब मैंने सबकी ज़िम्मेदारी स्वतः ही ले ली थी। हमें आश्चर्य इस बात का था कि अब ताऊ लोगों ने हमसे सम्बन्ध समाप्त कर लिए थे। बाद में किसी ने बताया था कि बेटियों की ज़िम्मेदारी से घबरा कर उन लोगों ने ऐसा किया था।
मेरी गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ से मैं वर्तमान में आ गयी। ऑफिस से ड्राइवर मुझे लेने आ गया था।
चाय पीते हुए सोच रही थी कि माँ को बताऊँ या नहीं कि कल ऑफिस में क्या हुआ था। लेकिन माँ जब अपना कप लेकर मेरे पास आकर बैठीं, तो मेरी वाणी ने खुद ही मेरी चुगली कर दी।
"माँ, कल ऑफिस में मेरे पास बबलू आया था"।
"क्या" माँ के कप से थोड़ी सी चाय छलक कर उनकी साड़ी पर गिर गयी।
“क्यों? क्यों आया था”?
"उसको अपने इंस्टिट्यूट में लोगों को स्किल ट्रेनिंग करवाने के लिए आर्थिक मदद चाहिए”।
“फिर? तूने किया उसका काम”? माँ की उत्सुकता छलकी पड़ रही थी।
मैं चुप रही। समझ नहीं आया क्या जवाब दूँ। माँ बेध्यानी में आगे झुक आयी थीं और उत्सुक निगाहों से मेरी ओर देख रही थीं।
मैंने धीरे से कहा, "अभी नहीं"।
"हम्म" माँ एकदम से शांत होकर कुर्सी पर वापस पीछे टिक गयीं। धीरे-धीरे चाय के घूँट भरती हुई। आँखें शून्य में देखती हुई।
हाँलाँकि मेरी नौकरी ने घर के हालात, रहन-सहन के स्तर को काफी पहले ही बदल दिया था, पर आज माँ की आँखें असली विजय के दर्प से चमक रही थीं। उनकी जेठानी ने अपने जिस बेटे की वजह से उन्हें बार-बार नीचा दिखाया था, आज किस्मत ने उसी बेटे को, उनकी उसी बेटी के रहमो-करम पर लाकर छोड़ दिया था।
मीटिंग शुरू होने का समय छह बजे से था। अभी सिर्फ साढ़े तीन बजे थे। समय था हमारे पास। माँ की आँखों में विजय दर्प का सागर लहलहा रहा था। होंठों पर वक्र मुस्कान थी। गर्वोन्मत्त चेहरा दमक रहा था। माँ एकदम से तैयार होकर आ गयीं, “चल तेरी ताई के पास चलते हैं। इतने बरस हम दोनों ने जो इतनी बेइज़्ज़ती करवाई है, आज उसका हिसाब बराबर करने का समय आ गया है”।
कुछ ही देर में हम ताई के दरवाज़े के बाहर खड़े थे।
आज इतने वर्षों बाद माँ ताई से मिलने जा रही थीं । उनकी देवरानी की हैसियत से नहीं, वरन एक ऐसे अफसर की माँ की हैसियत से, जिसके पास ताई के बेटे का ज़रूरी काम अटका हुआ था। एक कामयाब बेटी की माँ होने का गर्व उनकी विजय पताका को ऊंचा फहरा रहा था।
समय के पासे ने अपनी गोट कितनी चुन कर फेंकी थी, सही जगह पर और सही समय पर। पिछली बार जब माँ वह घर छोड़ कर आयी थीं, तब भी कारण मैं और बबलू थे। आज चौबीस बरस बाद, जब माँ उसी घर में वापस आयी हैं, तब भी कारण मैं और बबलू ही हैं।
हम दोनों तैयार खड़े थे कि दरवाज़ा खुले और हम इतने बरस तक अपने साथ किये गए अन्याय का हिसाब पूरा करें। अपनी विजय पताका फहराएं।
हमने घंटी बजायी। अंदर से कुछ देर तक कोई जवाब नहीं आया।
पर उन क्षणों में न जाने क्या हुआ। बाबा की बातें याद आने लगीं। ‘असली अपराजिता वही है, जो दूसरों को भी पराजित न होने दे, फिर वह तो तुम्हारा अपना परिवार है’। अंदर जैसे कुछ बिखरने सा लगा था। मैंने माँ से कहा, "माँ रहने देते हैं। अब तो यह साबित हो ही गया है कि आपकी बेटी किसी बेटे से कम नहीं। दुखियारे को और दुःख क्या देना, चलिए वापस चलते हैं"।
माँ ने गर्दन घुमा कर मेरी ओर देखा। उनके चेहरे के भावों से लगा कि वह भी शायद ऐसा ही कुछ कहने के लिए मुँह खोलने ही वाली थीं कि 'खड़ाक' की आवाज़ के साथ दरवाज़ा खुल गया। सामने ताई खड़ी थीं।
पर, यह तो वह पहले वाली रोबीली ताई न होकर, कोई दूसरी ही ताई थीं। निर्बल कलेवर एक साधारण सी, सूती धोती में लिपटा हुआ था। ढेर सारी झुर्रियों वाला चेहरा मुरझाया सा था। आँखों में दीनता का भाव पसरा हुआ था।
माँ को देख ताई अचकचा गयीं। फिर अस्फुट स्वर में मुँह से निकला, "सरोज”?
फिर मुझे देख बोलीं, "ये कौन है? सबसे छोटी वाली है"?
माँ पहले थोड़ी ठिठकीं, फिर उनके पैर छूते हुए हामी भरी।
"अच्छा, इसी के बारे में बबलू बता रहा था कल"।
अंदर दालान में जाकर बैठते हुए मेरी आँखों के आगे बचपन के वही दृश्य साकार हो उठे थे जब बबलू भैया मुझे 'लड़की लड़की, तीसरी लड़की’ कह कर चिढ़ाया करते थे और ताई हमें ताने दिया करती थीं।
ताऊ के बाद से, घर की खस्ता हालत के बारे में बताते हुए, ताई ने बबलू के इंस्टिट्यूट की गिरती हुई हालत के बारे में भी बताया, "पैसा बिलकुल है नहीं। काम करे तो कैसे ? अब सरकार के यहाँ अर्ज़ी दी है। कल बता रहा था, जिस अफसर के हाथ में सब कुछ है, वह अपनी अप्पू ही है। शर्मिंदा भी हो रहा था कि किस मुँह से जाऊं उसके पास”?
ताई की आँखें बार-बार भर आ रही थीं जिन्हें वह पल्लू से पोंछती जा रही थीं। शायद कुछ कहना चाह रही थीं, पर संकोच कर रही थीं।
फिर एकदम से बोलीं, "सरोज, बबलू के इस काम की वजह से नहीं कह रही हूँ, पहले भी कई बार सोचा बात करने को, पर हिम्मत ही नहीं पड़ी। तुम्हारी कुसूरवार हूँ मैं। याद है मुझे, कैसे इसके होने पर मैं तुम्हें तीसरी बेटी होने का ताना देती थी। बुद्धि फिर गयी थी मेरी उस समय। पर देखो, किस्मत आज बबलू को तुम्हारी उसी बेटी के पास ले गयी। मेरा कहा-सुना सब भूल जाओ सरोज। जान गयी हूँ मैं कि अपना किया-धरा लौट कर यहीं वापस आता है"।
ताई के स्वर में किसी भी तरह की कृत्रिमता नहीं थी। भरी हुई आँखें भी साफ़-साफ़ बता रही थीं कि पश्चाताप के ये उद्गार सीधे उनके हृदय से निकल रहे थे।
मैं कुछ बोलती, उससे पहले ही ताई ने मेरे ऊपर आशीषों की बरसात कर दी, "मेरी गुड़िया, मेरी बिटिया, खूब आगे बढ़ो। भगवान तेरी सब इच्छाएं पूरी करें"।
फिर अचानक मेरा हाथ पकड़ लिया, बोलीं, "बिटिया, यह सब मैं इसलिए नहीं कह रही कि तुम हमारा काम करो। पर अब इस उम्र में मैं अपनी पहले की गयी गलतियां सुधारना चाहती हूँ। माफ़ कर दे अपनी ताई को"।
आँखों में भरी झील के पार, मैंने माँ को देखने की कोशिश की । वहां भी अनवरत अश्रुधार बह रही थी। मैंने और माँ ने एक दूसरे की और देखा। जाने किसने क्या कहा, क्या समझा, पर तत्क्षण मेरे मुँह से निकला, "आपकी बेटी हूँ ताई, माफ़ी क्यों मांग रही हैं आप मुझसे"। ठीक उसी क्षण माँ के भी मुँह से निकला, "अरे, जीजी, आपकी बेटी है, बबलू उसका भाई है। उसका काम नहीं करेगी तो किसका करेगी"?
कुछ समय पश्चात, रिश्तों पर बरसों से जमा कुहासा छंट चुका था । जेठानी-देवरानी के गिले-शिकवे चुक गए थे और मैं ताई की छोटी सी रसोई में हम तीनों के लिए चाय बना रही थी। दालान से ताई और माँ की आवाज़ें आ रही थीं। दोनों अपने पुराने दिनों की यादें ताज़ा कर रही थीं। माँ कह रही थीं, "और याद है जीजी, जब हम अम्मा जी से झूठ बोल कर, कि कुछ देर आराम करने जा रहे हैं, खेत में अम्बिया चुराने चले गए थे और बाबूजी की आवाज़ आते ही कैसे घबरा कर गिरते-पड़ते भागे थे", दोनों के समवेत कहकहों की आवाज़ से मैं भी रसोई में मुस्कुरा पड़ी थी।
आज सुबह, ऑफिस आते ही,मैंने बबलू की फ़ाइल निकलवा कर, अपनी ओर से अप्प्रूव कर दी है और ख़ुद फाइल लेकर चल दी हूँ अपने सर की टेबल पर सबसे ऊपर रखने, जिससे सर सबसे पहले इसी फाइल पर काम करें।
कॉरिडोर से गुजर रही थी तो अचानक ऐसा लगा, जैसे सामने बाबा खड़े मुस्कुरा कर कह रहे हैं कि "अब तू बनी है मेरी असली अपराजिता। देख, अब तेरी विजय पताका कितनी ऊंची फहरा रही है"।
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- विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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