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कुछ लोग तर्क देते नज़र आ जाएंगे कि ऐसा इसलिए किया जाता है कि ताकि जाने पहचाने चेहरे ज्यादा ताकतवर न बन जाएं, जिससे पार्टी में ऊपर बैठे लोगों को खतरा हो जाए। हालांकि इस तर्क में अधिक दम नहीं दिखता है, क्योंकि ऐसा होता तो उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को दूसरी बार मुख्यमंत्री क्यों बनाया जाता? उनकी छवि तो अन्य राज्यों के बड़े भाजपा नेताओं से कहीं अधिक विराट है। खतरा होता तो योगी से होता, पर वे तो मुख्यमंत्री हैं। यदि यह कोई गोपनीय रणनीति है तो इसके पीछे तर्क क्या है? उद्देश्य क्या है?
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जाने पहचाने चेहरों से उसे कोई परेशानी है, या भाजपा की कोई गोपनीय रणनीति है?
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इन 13 दिनों तक कई नामों की चर्चा रही कि ये भी मुख्यमंत्री बन सकते हैं। हर बार की तरह राजनीतिक पंडितों के सारे अनुमानों पर भाजपा ने इस बार भी पानी फेर दिया और मुख्यमंत्री के तौर पर ऐसे चेहरे की घोषणा की, जिसकी चर्चा बहुत कम थी। भाजपा के लिए चुनौती बने आप के मुखिया अरविन्द केजरीवाल को हराने वाले प्रवेश वर्मा की बजाय रेखा को चुनने के पीछे कई कारण हैं।
वैसे तो राजनीतिक निर्णयों में भाजपा अक्सर चौंकाने रहती है, विशेष कर जब मुख्यमंत्री चुनने की बात आती है तो उसकी सोच बाकी से हटकर होती है। राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया जैसे वरिष्ठ नेता को अनदेखा कर भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय हो या मध्यप्रदेश में मामाजी शिवराज सिंह चौहान को किनारे कर मोहन यादव को गद्दी पर बैठाना हो या छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की अनदेखी कर विष्णु देव साय को मुख्यमंत्री बनाना हो या फिर अब, अनेक दिग्गजों को किनारे कर पहली बार विधायक बनी रेखा गुप्ता को शक्तिशाली पद सौंपना हो, हर बार चेहरा चौंकाने वाला ही होता है।
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लेकिन भाजपा ऐसा क्यों करती है?
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भाजपा भले ही खुद को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बताए, पर वह सफलता के लिए अब भी काफी हद तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निर्भर है। यह अहसास उसे लोकसभा चुनावों में अच्छी तरह हो चुका है। उन चुनावों में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृहमंत्री अमित शाह ने बयान दे दिया था कि भाजपा अब अपने दम पर चुनाव जीतने में सक्षम है। बस, फिर क्या था, आर एस एस पीछे हट गया और चुनाव परिणाम ने भाजपा को झटका दे डाला। इसके बाद भाजपा ने संघ को मनाने में ही भलाई समझी और परिणाम सामने है। पहले संघ ने उसे हरियाणा और महाराष्ट्र का चुनाव जिताया और अब दिल्ली में उसका 27 साल का वनवास खत्म करवाया।
संघ का जिक्र इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि ये जो नये चेहरे देखने में आ रहे हैं, ये सब संघ के हीरो लोग हैं और संघ की पसंद पर उन्हें इतने बड़े पद सौंपे जा रहे हैं। पिछली बार हरियाणा में मुख्यमंत्री रहे मनोहर लाल खट्टर हों या छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय हों या राजस्थान में भजन लाल शर्मा, सब संघ के कर्मठ कार्यकर्ता रहे हैं। संघ अपने उन कार्यकर्ताओं को आगे बढाने में विश्वास रखता है, जो ज्यादा चर्चा में आज बिना चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। ये सारे चेहरे वैसे ही हैं।
रेखा पिछले 32 सालों से संघ से जुड़ी हैं यानि 18 साल की उम्र से। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से होते हुए वह राजनीति में आईं और दो बार हारने के बाद इस बार चुनाव जीतकर पहली बार विधायक के साथ साथ मुख्यमंत्री भी बन गयीं।
उनके चयन का एक कारण यह है कि दिल्ली में भाजपा को ऐसे चेहरे को गद्दी पर बैठाना, जो उप राज्यपाल के साथ मिलकर चले। किसी बडे नेता को सीएम बनाया जाता तो वह अपनी मर्जी चलाता, इसलिए रेखा को चुना गया।
महिला होने का लाभ तो रेखा को मिला ही, अब भाजपा के पास गिनाने को एक महिला मुख्यमंत्री भी हो गई।
यानि पार्टी ने एक तीर से कई शिकार कर लिए। सौम्य चेहरा दे दिया, दिग्गजों को ठिकाने लगा दिया और महिला वोटरों को रिझाने का प्रबंध भी कर लिया।
(लेखक यूपी के जाने माने स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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