सम्पादकीय

पढ़ाई, नौकरी और परिवार का दबाव: युवाओं के मन की चुनौती

nidhi
10 Oct 2026 9:59 AM IST
पढ़ाई, नौकरी और परिवार का दबाव: युवाओं के मन की चुनौती
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मानसिक स्वास्थ्य संकट
अंकिता शर्मा और सौर्यब्रत महापात्रा द्वारा
जब दुनिया 10 अक्टूबर को 'विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस' मनाने की तैयारी कर रही है, तो भारत के सामने एक मुश्किल सवाल है: क्या हम सच में समझ रहे हैं कि हमारे युवाओं के साथ क्या हो रहा है?
चेतावनी के संकेत हर जगह दिखते हैं: क्लासरूम, कोचिंग सेंटर, यूनिवर्सिटी, घरों और काम की जगहों पर। जब कोई युवा स्टूडेंट अपनी जान दे देता है या कोई युवा प्रोफेशनल बहुत ज़्यादा तनाव या दबाव में टूट जाता है, तो लोगों का ध्यान कुछ समय के लिए पढ़ाई के दबाव, सोशल मीडिया, काम के तनाव या परिवार की उम्मीदों पर जाता है। लेकिन ये बातें अक्सर उस आखिरी वजह पर फोकस करती हैं, न कि उन दबे हुए दबावों पर जो लंबे समय से जमा हो रहे थे।
भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी में से एक है। इस पीढ़ी की इमोशनल और मानसिक सेहत का जो हाल होगा, उससे न सिर्फ़ लोगों की ज़िंदगी पर असर पड़ेगा, बल्कि देश के सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर भी असर पड़ेगा। फिर भी, इस बारे में बातचीत अक्सर एक ही बात तक सीमित रह जाती है: डिजिटल दौर के युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य संकट। असलियत इससे कहीं ज़्यादा पेचीदा है।
बहुत ज़्यादा कनेक्टिविटी, फिर भी अलगाव
आज के युवाओं के पास जानकारी, कम्युनिटी और मौकों तक बेमिसाल पहुँच है। फिर भी, ज़्यादा कनेक्टिविटी का मतलब हमेशा ज़्यादा इमोशनल जुड़ाव नहीं होता।
लगातार डिजिटल एक्सेस के साथ बड़े होने का मतलब है जानकारी, राय और विकल्पों की कभी न खत्म होने वाली बाढ़ से गुज़रना। चुनौती अब सिर्फ़ जानकारी पाने की नहीं है; चुनौती यह तय करने की है कि क्या सच है। गलत जानकारी, डीपफेक, AI से बना कंटेंट और बिना पुष्टि किए गए दावों के लिए लगातार सतर्क रहने की ज़रूरत होती है। पढ़ाई और करियर के दबाव से जूझ रहे युवा दिमागों के लिए, लगातार सोचने-समझने की यह ज़रूरत थका देने वाली हो सकती है।
भारत में युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य संकट को सिर्फ़ परीक्षा, सोशल मीडिया या काम के तनाव तक सीमित नहीं किया जा सकता। इन वजहों के पीछे पढ़ाई का दबाव, परिवार की उम्मीदें, करियर को लेकर अनिश्चितता, डिजिटल ओवरलोड और तेज़ी से बदलती दुनिया जैसी कई परतें छिपी हैं।
एक और विरोधाभास हमारे अपने घरों में भी दिखता है। भारत में, पारिवारिक नेटवर्क पारंपरिक रूप से एक ज़रूरी इमोशनल सहारा रहे हैं। लेकिन शारीरिक रूप से पास होने का मतलब यह नहीं है कि इमोशनल जुड़ाव भी हो। हो सकता है कि माता-पिता काम के मैसेज में डूबे हों, दादा-दादी शॉर्ट-वीडियो फ़ीड देख रहे हों और युवा अपनी सोशल मीडिया की दुनिया में खोए हों। 'फ़बिंग' (phubbing) यानी फ़ोन की वजह से पास बैठे लोगों को नज़रअंदाज़ करने की आदत, एक जुड़े हुए परिवार को इमोशनल तौर पर दूर कर सकती है। परिवार के WhatsApp ग्रुप, जो आपस में जुड़े रहने के लिए बनाए जाते हैं, वे भी बहुत ज़्यादा जानकारी, सेहत से जुड़ी चिंताएँ, विचारधाराओं में मतभेद और सामाजिक उम्मीदों का ज़रिया बन सकते हैं। नतीजा एक अजीब विरोधाभास है: हम डिजिटल रूप से पहले से कहीं ज़्यादा जुड़े हो सकते हैं, लेकिन साथ ही अलग-थलग महसूस करते हैं।
निजी दबाव
युवा भारतीयों के लिए, ये दबाव अकेले नहीं होते। पढ़ाई-लिखाई से जुड़ी उम्मीदें, करियर को लेकर अनिश्चितता, परिवार की नज़र और बदलते रिश्ते अक्सर एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
सामूहिक सोच वाले समाज में, परीक्षा के नतीजे, यूनिवर्सिटी में दाखिला, नौकरी, सैलरी और रिश्तों पर अक्सर सिर्फ़ निजी मामलों के तौर पर नहीं, बल्कि परिवार की इज़्ज़त और उम्मीदों के तौर पर चर्चा होती है। इसलिए, पढ़ाई में खराब नतीजे सिर्फ़ एक अस्थायी रुकावट से कहीं ज़्यादा महसूस हो सकते हैं। यह उम्मीदों के पूरे जाल पर खरा न उतर पाने की नाकामी जैसा लग सकता है।
पढ़ाई से नौकरी की ओर बढ़ना एक और परत जोड़ता है। यह पारंपरिक वादा कि कड़ी मेहनत से लंबे समय तक स्थिरता मिलेगी, अब उतना पक्का नहीं रहा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) नौकरियों और शुरुआती स्तर के कामों को बदल रहा है, जिससे युवाओं को न सिर्फ़ यह सोचना पड़ रहा है कि वे कौन सा करियर चुनना चाहते हैं, बल्कि यह भी कि क्या वह करियर अपने मौजूदा रूप में बना रहेगा।
साथ ही, युवा जलवायु आपदाओं, भू-राजनीतिक संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता और तकनीकी बदलावों के माहौल में बड़े हो रहे हैं। नतीजा यह है कि अनिश्चितता का एक लगातार शोर सा बना रहता है।
पिछली पीढ़ियाँ अपने भविष्य की योजना काफ़ी हद तक निजी हालात के आधार पर बना सकती थीं। आज के युवाओं को अक्सर एक बड़ा सवाल पूछना पड़ता है: क्या दुनिया इतनी स्थिर रहेगी कि मेरे सोचे हुए भविष्य को जगह दे सके?
दोष देने का ख़तरा
जब कोई युवा टूट जाता है, तो लोगों की प्रतिक्रिया अक्सर व्यक्ति-केंद्रित हो जाती है: वे तनाव नहीं झेल पाए, उनमें मुश्किल हालात का सामना करने की क्षमता नहीं थी, वे बहुत ज़्यादा संवेदनशील थे, या उन्होंने ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया दी।
ऐसी बातें परेशानी के धीरे-धीरे जमा होने वाली असलियत को नज़रअंदाज़ कर देती हैं।
हो सकता है कि कोई हालिया घटना - जैसे परीक्षा का नतीजा, रिश्ता टूटना, काम की जगह पर झगड़ा या नौकरी की अनिश्चितता - इसकी वजह हो। लेकिन हो सकता है कि वह घटना पहले से ही बोझ तले दबे ढाँचे पर रखा गया आखिरी वज़न हो। बाहर से जो प्रतिक्रिया एक अलग-थलग घटना लगती है, वह महीनों या सालों के अकेलेपन, अनिश्चितता, सांस्कृतिक उम्मीदों और भावनात्मक थकान से जुड़ी हो सकती है। यही वजह है कि 'बर्नआउट' (बहुत ज़्यादा थकान), 'इमोशनल एग्ज़ॉशन' (भावनात्मक रूप से थक जाना) और 'बेड रॉटिंग' (जैसे कि लंबे समय तक बिस्तर पर पड़े रहना और फ़ोन पर स्क्रॉल करते रहना या रोज़मर्रा की ज़िंदगी से कट जाना) जैसे नए व्यवहारों को महज़ आलस या कमज़ोरी मानकर नज़रअंदाज़ करने के बजाय, उनके संदर्भ को समझना ज़रूरी है।
युवाओं के लिए पढ़ाई-लिखाई का दौर तब बहुत मुश्किल हो सकता है जब उनकी अपनी अहमियत का सीधा संबंध परीक्षा के नतीजों से जुड़ जाता है। बाद में, करियर के दौर में एक अलग चुनौती सामने आती है: युवा प्रोफेशनल्स से उम्मीद की जाती है कि वे महत्वाकांक्षी बनें और साथ ही अस्थिर जॉब मार्केट में खुद को संभालते हुए अपनी मानसिक सेहत का भी ध्यान रखें। काम और निजी ज़िंदगी के बीच संतुलन बनाने को अब भी महत्वाकांक्षा या हिम्मत की कमी के तौर पर देखा जा सकता है।
मुश्किलों से उबरकर अहमियत महसूस करने तक
फिर भी, आज के युवाओं को सिर्फ़ संकट में फंसी पीढ़ी के तौर पर दिखाना गलत होगा। इस कहानी का एक और पहलू भी है: ज़बरदस्त हिम्मत और मुश्किलों से उबरने की क्षमता।
युवा लोग थेरेपी, भावनाओं को ज़ाहिर करने, बर्नआउट (काम के तनाव से थकावट) और न्यूरोडायवर्सिटी (दिमाग के काम करने के अलग-अलग तरीकों) से जुड़ी पुरानी वर्जनाओं को चुनौती दे रहे हैं। वे स्कूलों और दफ्तरों से यह समझने की मांग कर रहे हैं कि इंसान की अहमियत उसके ग्रेड, सैलरी या प्रोडक्टिविटी से कहीं ज़्यादा होती है। वे अपनी ज़बरदस्त कनेक्टिविटी का इस्तेमाल सामाजिक न्याय, जलवायु के प्रति जवाबदेही और मानवाधिकारों के मुद्दों पर एकजुट होने के लिए भी कर रहे हैं।
इसलिए, चुनौती युवाओं को "ठीक" करने की नहीं है। यह समझना ज़रूरी है कि वे किस माहौल में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
स्कूलों और यूनिवर्सिटीज़ में ऐसी जगहें होनी चाहिए जहाँ पढ़ाई में नाकामी को किसी व्यक्ति की अहमियत पर सवाल उठाने का आधार न माना जाए। परिवारों को बिना तुरंत जज किए, तुलना किए या सलाह दिए दूसरों की बात सुनने की अहमियत को फिर से समझना होगा। एम्प्लॉयर्स को यह समझना होगा कि लंबे समय तक बनी रहने वाली प्रोडक्टिविटी को इंसानी गरिमा से अलग नहीं किया जा सकता। और युवाओं की परेशानी के बारे में सार्वजनिक बातचीत में सिर्फ़ किसी एक दोषी को खोजने से आगे बढ़ना होगा।
असली और गहरा संकट सिर्फ़ यह नहीं है कि युवा तनाव में हैं। बल्कि संकट यह है कि बहुत से युवा एक ऐसी दुनिया में अपनी पहचान, रिश्ते और भविष्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिसके नियम लगातार बदलते दिख रहे हैं।
इसलिए हमारे सामने सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि युवाओं को ज़्यादा मज़बूत कैसे बनाया जाए। सवाल यह है कि क्या हम ऐसा माहौल बनाने को तैयार हैं जिसमें उनसे हर समय मज़बूती दिखाने की उम्मीद न की जाए।
अगर हम चाहते हैं कि आज के युवा कल का भारत बनाएं, तो उन्हें सिर्फ़ प्रोडक्टिव होने से कहीं ज़्यादा महसूस होना चाहिए। उन्हें सुरक्षित, अपनी बात सुने जाने और अहमियत दिए जाने का एहसास होना चाहिए।
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