- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- सम्पादकीय
- /
- अब वैसी जातियां भी...
सम्पादकीय
अब वैसी जातियां भी आरक्षण मांगने लगी हैं, जिनका प्रभुत्व है और जिनके पास जमीनें हैं
Gulabi Jagat
23 April 2022 12:46 PM IST

x
एक मनुष्य के रूप में हमारा विकास जहां अपनी लैंगिक पहचान और बुद्धिमत्ता की व्यक्तिगत वृत्तियों के साथ होता है
रघुराम राजन का कॉलम:
एक मनुष्य के रूप में हमारा विकास जहां अपनी लैंगिक पहचान और बुद्धिमत्ता की व्यक्तिगत वृत्तियों के साथ होता है, वहीं हम विभिन्न पहचान-समूहों का भी हिस्सा होते हैं। तब भारत की राज्यसत्ता को एक व्यक्ति को कैसे देखना चाहिए- इंडिविजुअलिटी के आधार पर या समूहगत पहचान के आधार पर? हमारे आरम्भिक नेताओं ने व्यक्ति पर अपना फोकस रखा था। लेकिन संविधान और बाद में बनाई गई नीतियों में परम्परागत समूहों के महत्व को भी स्वीकारा गया था।
नागरिक संहिताएं भिन्न धार्मिक समूहों के लिए थीं, अलबत्ता संविधान के निर्देशक सिद्धांतों का प्रस्ताव था कि हमें अंतत: समान नागरिक संहिता की ओर जाना चाहिए। भारत के राज्यों का निर्माण भाषा के आधार पर हुआ था। अकादमिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में ऐतिहासिक रूप से वंचित अजा-जजा वर्ग के लिए स्थान आरक्षित किए गए। बाद में आरक्षण का दायरा ओबीसी तक बढ़ाया गया।
लेकिन परम्परागत पहचान-समूहों पर केंद्रित राजनीति अधिक सुविधाजनक होने के कारण आज हमारे नेताओं का ध्यान व्यक्ति और समूह के बीच संतुलन बनाने के बजाय समूह की राजनीति पर केंद्रित हो गया है। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि सामाजिक रूप से वंचित वर्ग भी अपना उचित अधिकार मांग सके हैं, जिससे विषमता घटी है। लेकिन समूहगत पहचान पर जोर देने के नुकसान भी कम नहीं।
एक समस्या तो यही है कि कोई समूह भिन्न-भिन्न परिस्थितियों का सामना कर सकता है। मिसाल के तौर पर किसी जाति के कुछ लोग गांव में हो सकते हैं और स्थानीय सरकारी स्कूल में उनकी अच्छे से पढ़ाई नहीं हो पाई हो, वहीं अन्य शहरों में शिक्षित हो सकते हों, जिन्हें अच्छी शिक्षा के लिए अनेक विकल्प मुहैया हों। ऐसे में वह जाति शिक्षा की गुणवत्ता के प्रश्न पर एकजुट नहीं हो सकेगी। उसके लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे पर एकजुट होना ज्यादा सरल होगा।
दूसरी तरफ पहचान-समूहों की वृत्ति होती है कि वे मौजूदा व्यवस्था में ही अधिकाधिक सहभागिता चाहते हैं, उन वैयक्तिक स्थितियों को बदलने की कोशिश नहीं करते, जिनसे मौजूदा व्यवस्था बेहतर बनेगी। इसका परिणाम यह रहता है कि समूह के सबसे वंचित सदस्यों को न्यूनतम लाभ मिल पाते हैं। जहां आरक्षण के चलते वंचित समूहों के पुरुषों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार आया है, वहीं यह बात उनकी स्त्रियों के बारे में नहीं कही जा सकती।
जब सभी समूह अपने लिए बड़ा हिस्सा मांगने लगते हैं तो निम्न विकास की स्थिति में किसी को लाभ नहीं मिलता। अब तो वैसी जातियां भी आरक्षण मांगने लगी हैं, जिनका समाज में प्रभुत्व है और जिनके पास जमीनें हैं। दूसरी तरफ, जब सरकारें किन्हीं समूहों को लाभ देती है तो वे उनकी समूहगत-पहचान को और मजबूत बनाती हैं, लेकिन वे सामाजिक विभेदों को पाट नहीं पातीं।
एक अर्थ में समूह-केंद्रित नीतियां व्यक्तिगत परिस्थितियों को बेहतर बनाने के बजाय सामूहिक-लाभों के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती हैं। उनसे समूहों के भीतर और समूहों के बीच विषमताएं निर्मित हो सकती हैं, क्योंकि तमाम तरह के लाभों का बंटवारा सत्ता के आधार पर ही होता है। इसका एक विकल्प यह है कि हम सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित के लिए अलग-अलग उपकरण रचें।
जब कोई जाति निरंतर सामाजिक भेदभाव का सामना करती है तो उसकी जातिगत पहचान से ही उसके साथ हो रहे अन्याय की पहचान की जाती है। तब आरक्षण की व्यवस्था प्रदान की जाती है, जिससे उस समूह में आत्मविश्वास आता है। लेकिन आर्थिक पिछड़ापन एक दूसरी चीज है। ऐसे में सरकार को एक दोहरा रवैया अख्तियार करना चाहिए, जिसके तहत वह एक तरफ शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता से वैयक्तिक क्षमताओं का विकास करे, वहीं सरकारी लाभों को केवल आर्थिक रूप से पिछड़ों को ही मुहैया कराए।
वित्त, क्रियाशीलता और संस्थाओं का विकेंद्रीकरण नागरिकों की स्थानीय रूप से मदद करेगा, जिसका परम्परागत पहचान से सरोकार नहीं होगा। सुनने में भले विरोधाभासी लगे, लेकिन परम्परागत समूहों के बजाय हर व्यक्ति के अधिकारों पर जोर देकर हम नए पहचान-समूह बना सकते हैं, जो उभरती हुई साझा चुनौतियों के आधार पर संगठित होंगे।
हम समान नागरिक संहिता पर एकमत हो सकेंगे, इसलिए नहीं एक समुदाय दूसरे पर अपनी पसंद थोपना चाहता है, बल्कि इसलिए कि हर धार्मिक समूह में मौजूद व्यक्ति सुधारों की चाह रखते हैं।
सह लेखक- रोहित लाम्बा, पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिस्ट
(ये लेखकों के अपने विचार हैं)
Next Story





