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विजय गर्ग : अक्षर, पांखी, मानव और देवांश आज बहुत खुश थे। ये चारों दोस्त अपने-अपने परीक्षा परिणामों को हाथ में लिए एक दूसरे के साथ आइसक्रीम खाते हुए गपशप कर रहे थे। सभी अच्छे नतीजों से पास हुए थे। वे अब सोच रहे थे कि छुट्टियों का मजा कहां और किस तरह लिया जाए ! 'पांखी! तुम कहां जाने वाली हो ?' मानव ने पूछा । 'मेरे पापा अभी टूर पर गए हुए हैं, जैसे ही वापस आएंगे हम प्लान बनाएंगे' - पांखी ने बताया ।
'मुझे भी अभी नहीं पता', मानव ने कहा। देवांश तुम्हें पता.. मैं कहां जाने वाला हूं!' अक्षर बोल पड़ा। फिर बोला- 'मुझे इस बार अपने गांव में दादा-दादी, चाचा- चाची के पास जाने का मौका मिलेगा। मुझे वहां बहुत अच्छा लगता है। खूब खेलने को मिलता है। दादा-दादी बहुत प्यार करते हैं और चाचा मुझे रोज नई-नई चीजें दिखाते हैं। कोई मुझे रोकता टोकता नहीं! बहुत सारी चीजें मेरे लिए बनती हैं।' अक्षर ने बड़ी खुशी से झूमते हुए बताया। वहां मेरे दोस्त भी बन गए और मेरी चचेरी बहन प्रिया भी मेरे साथ खेलती है। '
'लेकिन मैं छुट्टियों में एक्टिविटी क्लासेस जाऊंगा । मुझे नई-नई चीजें बनाने का शौक है'। देवांश बोला। थोड़ी देर में सभी एक-दूसरे को अलविदा कह कर, अपने-अपने घर चले गए।
'अक्षर, तुम अपना सामान अच्छी तरह से पैक करना। हम कल ही गांव के लिए निकल रहे हैं। कोई चीज भूलना नहीं ! - मां ने हिदायत देते हुए कहा ।
गांव पहुंचते ही अक्षर झूम उठा । इतनी हरियाली! दादी के घर इतने सारे पंछियों की टोली ! अक्षय ने देखा गौरैया, मैना, कबूतर, रंग बिरंगी चिड़िया सब के सब जैसे दादी के घर मेहमान बने हुए थे ! ' अक्षर ! वहां खड़ा टुकुर टुकुर ताक रहा है! यहां भी आएगा कि नहीं!' - दादी ने प्यार से आवाज लगाई। अक्षर ने दादी के पैर छूते हुए आश्चर्य मिश्रित खुशी से पूछा, 'दादी !
इतने सारे पंछी हमारे घर पर !' 'हां बेटा! ये एक राज है।
तुम्हें बताऊंगी।' दादी मुस्कुराई । अगली सुबह पंछियों के कलरव से अक्षर उठा और आंगन में पहुंचा, तो देखा दादी सबको दाना डाल रही है। अक्षर को देखा तो बोली- 'आजा ! तू भी दाना डाल दे और कल से पानी सकोरे में रखना।'
'ठीक .. दादी' - अक्षर जम्हाई लेते हुए बोला ।
शाम को चाचा के साथ प्रिया और अक्षर घूमने निकल • पड़े। गांव की सुंदर पगडंडियों, हरी-भरी फसलों से गुजरते हुए अक्षर को डूबता सूरज बड़ा सुहावना लगा। रास्ते में चाचा उसे विभिन्न पेड़-पौधों की बुआई कटाई के बारे में समझाते जा रहे थे। प्यास लगी तो प्रिया ने झट से ठंडे पानी की बोतल अक्षर को पकड़ा दी और एक पत्थर की बेंच पर बैठकर सभी ने गन्ने तोड़ कर खाए ।
दूसरे दिन सुबह अक्षर को उठने में देर हो गई। चाची ने कहा- 'आओ! अक्षर बेटा.. गरमा-गरम आलू परांठे और अभी बनाई ताजी छाछ का नाश्ता कर लो।' नाश्ता करके अक्षर अपने क्रिकेट का बल्ला
उठाकर बैग में दस्ताने और पानी की बोतल डाल कर अपने दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने मैदान पहुंच गया। घर पर दादी आज थोड़ा निश्चिंत थीं कि अक्षर ने पंछियों को दाना-पानी दे दिया होगा। पर अक्षर को तो आदत नहीं थी, सो भूल गया और खेल में मस्त खेलते-खेलते गर्मी और जोर की प्यास लगी तो अक्षर ने बैग खोला तो देखा कि पानी की बोतल तेजी से बैग फेंकने की वजह से खुल गई थी और सारा पानी फैल चुका था। हैरान-परेशान, प्यासा अक्षर घर पहुंचा और चिल्लाया- 'मुझे जोर से प्यास लगी है मां ! ठंडा पानी दो ।'
मां सुन नहीं पाई तो दादी ने आकर पानी का गिलास पकड़ाया और पूछा-'आज तो तूने दादी का काम संभाला ! पंछियों को दाना-पानी दिया न!' सुनकर अक्षर की नजरें झुक गई बस इतना ही कह पाया 'नहीं दादी' तभी प्रिया ने आकर बताया कि उसने तश्तरी और पानी का सकोरा खाली देखा तो उसमें दाना-पानी डाल दिया था। दादी ने अक्षर को झिड़कते हुए कहा, 'अक्षर ये पंछी जो तुम्हें इतने अच्छे लगे, यह सभी हमारे घर पर दाना-पानी लेने आते हैं। हम बड़े प्यार से इन्हें दाना पानी देते हैं क्योंकि ये सभी हमारे पर्यावरण के लिए बहुत जरूरी हैं और सब की बड़ी अहमियत है। इतनी गर्मी में इन्हें भी प्यास लगती है। जब इन्हें कहीं पानी मिल जाता है तो ये भी तुम्हारी तरह खुश हो जाते हैं। ये बेजुबान पंछी कुछ नहीं कहते, लेकिन हमारे पर्यावरण मित्र हैं। इनकी देखभाल करना, इनकी संख्या धरती पर कायम रखने में अगर हमारी छोटी सी कोशिश जारी रहेगी तो मानवता और पर्यावरण का बड़ा हित है। तुमने वह कहानी तो पढ़ी होगी न कि एक नन्ही लड़की रोज कौवों को दाना डालती तो वह भी उसे रोज एक तोहफा कभी मोती, सीप, सिक्के, मूल्यवान वस्तुएं दे जाते ! ये पंछी हमारे एक गुना प्यार को कई गुना करके लौटाते हैं। इनकी देखभाल और इनसे प्यार करना हमारा भी कर्त्तव्य है'। दादी ने समझाया।
'हां दादी ! आज मैंने जाना कि पानी न मिलने पर गर्मी में हमारा क्या हाल होता है! आज से मैं हर सुबह दाना पानी दूंगा। मैं अपनी मां से कहूंगा कि वह मुझे पंछियों का दाना और सकोरे लाकर दे। मैं शहर जाकर पंछी मित्रों को अपने घर बुलाकर देखभाल करूंगा।' दादी ने अक्षर को प्यार से गले लगा दिया।
जब छुट्टियों के बाद चारों दोस्त मिले तो सब ने अपनी-अपनी कहानी सुनाई कि गर्मी की छुट्टियां कैसे बिताई ! अक्षर ने भी अपनी दादी की बातें और पंछी मित्रों की कहानी सुनाई। बच्चे खुश होकर बोले- 'हां यह बहुत अच्छी बात है। हम सभी यह काम जरूर शुरू करेंगे। पंछी हमारे घर भी टोलियां बनाकर मेहमान बनने आएंगे। बड़ा मजा आएगा।' सब के चेहरे खिल पड़े।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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