- Home
- /
- अन्य खबरें
- /
- सम्पादकीय
- /
- परीक्षण की परिधि में...

Editorial: ढगवार मिल्क प्लांट की संरचना में आया खोट अगर मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के पैमाने में, निर्माण के उद्देश्य को भ्रमित और अकुशल पाता है, तो यह निरीक्षण कई संकेत दे रहा है। आश्चर्य यह कि 225 करोड़ की परियोजना में भी काम निपटाने की रूटीन सामने आई और जहां ऑटोमेशन के बजाय अधोसंरचना को घिसी पिटी पुरानी तकनीक के हवाले ही रखा जा रहा था। पल भर के लिए अगर मुख्यमंत्री रुचि न लेते तो निर्माण कार्य और मशीनरी के सही उपयोग में कई दरारें बढ़ती जातीं। बहरहाल मुख्यमंत्री की पैनी और पारखी नजर ने एक गलती को सुधार दिया, अन्यथा विकास की गाथाएं ऐसा ढांचा विकसित नहीं कर पा रहीं, जो कम से कम एक सदी गुजार दें। हिमाचली विकास के मानदंड या तो पूरी तरह तय नहीं होते या उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। टांडा मेडिकल कालेज में करोड़ों व्यय करके ‘मदर एंड चाइल्ड केयर सेंटर’ आज भी पूर्ण नहीं है, तो इस कोताही के दंश स्पष्ट हैं। ऐसे में क्या मुख्यमंत्री को ही मुआयना करना पड़ेगा या गुणवत्ता के परीक्षण किसी निश्चित परिधि से गुजरेंगे। आम तौर पर ड्राइंग से निर्माण तथा विभिन्न भवनों, संस्थानों या सेवा क्षेत्रों के विस्तार तक आर एंड डी दिखाई ही नहीं देती। स्कूल से कालेज तक इमारतों में अंतर की जरूरत है, लेकिन वर्षों से एक ही ड्राइंग पर सरकारी दारोमदार चला है। सबसे कमजोर पक्ष यह है कि भूमि के इस्तेमाल में किफायती वास्तु शैली का प्रदर्शन नहीं हो रहा। अगर पूछा जाए कि हिमाचल की ऐसी कौनसी दर्जन भर इमारतें हैं, जो अपने डिजाइन, निर्माण और उपयोगिता की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ हैं, तो जवाब में बगलें झांकते मिलेंगे। शहरी जीवन में आ रहे परिवर्तन को देखते हुए विकास योजनाओं को ही देखकर पता चलता है कि सिर्फ फर्ज अदायगी हो रही है।
क्या टीसीपी कानून की शर्तों में हम शहरी ढांचे में परिवर्तन ला सके। कितनी बार उधार की नींव पर खड़े ढांचे को बेकार करेंगे। कांगड़ा के पास मटौर में बतौर पर्यटन मंत्री स्व. जीएस बाली ने एक बैंबू पार्क बनाया, लेकिन लाखों का व्यय अब एक कबाड़ गृह में ऐसे तबदील हुआ कि नशेड़ी वहां अपना दर्द बयां करते हैं। ऐसे कई निर्माण कार्य या तो अधूरे ही रह गए या पूरा होकर भी बेकार हो गए। दरअसल निर्माण की गुणवत्ता और उपयोग की सार्थकता का कोई ऑडिट ही नहीं होता है। मुख्यमंत्री के एक विजिट ने अगर थोड़ा सा ऑडिट किया तो सवा दो सौ करोड़ की लागत से भी कई सुराख निकल आए, तो ऐसे सुराखों की गुंजाइश तो हर छोटे-बड़े कार्य में रहेगी। पाठकों को याद होगा कि शाह नहर परियोजना ने ट्रायल में ही अपने घटिया निर्माण के किस्से खोल दिए थे। भवनों के डिजाइन से उनके निर्माण की उपयोगिता तक गहन चिंतन, ईमानदारी और वचनबद्धता की जरूरत है। प्रदेश को दो स्मार्ट सिटी परियोजनाएं मिलीं। अगर मुख्यमंत्री शिमला-धर्मशाला स्मार्ट सिटी परियोजनाओं के निर्माण का ऑडिट करा लें, तो पता चल जाएगा कि खजाने खोलकर भी हिमाचल का भविष्य यहां नहीं संवर रहा। विकास से निकले निर्माण की कटोरी में राजनीति की डुबकियां और भी भयंकर निष्कर्ष पैदा कर रही हैं। मनरेगा की लागत में हमारे प्राकृतिक जलस्रोत निपट गए। शहर विकास के प्रारूप में अधिकारियों के मन के नक्शे जमीन से खिलवाड़ कर गए। औचित्यहीन, संवेदनहीन तथा उद्देश्यहीन निर्माण से बेहतर है कि हम विकास को भविष्य की निगाहों से देखने का जज्बा पैदा करें।





