सम्पादकीय

अस्तित्व की रक्षा के लिए कांग्रेस वाम दलों के साथ खड़े होने में देख रही अपना भविष्य

Gulabi
2 Nov 2020 10:18 AM GMT
अस्तित्व की रक्षा के लिए कांग्रेस वाम दलों के साथ खड़े होने में देख रही अपना भविष्य
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बंगाल में वाम दलों से मिलकर चुनाव लड़ने की कांग्रेस की तैयारी यही बताती है

जनता से रिश्ता वेबडेसक।बंगाल में वाम दलों से मिलकर चुनाव लड़ने की कांग्रेस की तैयारी यही बताती है

कि वह अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ऐसे कदम उठा रही है, जो अंतत: उसे और कमजोर करने का ही काम करेंगे। वाम दलों से कांग्रेस का तालमेल इस धारणा पर मुहर ही लगाएगा कि उसका उस वामपंथी विचारधारा की ओर झुकाव बढ़ता जा रहा है, जो दुनिया के साथ-साथ भारत में भी अपना महत्व खो रही है।

एक समय वाम दल बंगाल और केरल के साथ त्रिपुरा में भी असर रखते थे, लेकिन अब वे केवल केरल में सिमटकर रह गए हैं। इसके बावजूद कांग्रेस वाम दलों के साथ खड़े होने में अपना भविष्य देख रही है। यह कांग्रेस के भटकाव का सूचक तो है ही, इसका भी संकेत है कि वह अपनी मूल विचारधारा की ओर लौटने को तैयार नहीं।

कोई नहीं जानता कि कांग्रेस यह समझने को तैयार क्यों नहीं कि मध्यमार्ग ही उसकी ताकत हुआ करता था। आश्चर्य का विषय केवल यह नहीं है कि केरल में वाम दलों से मुकाबला करने वाली कांग्रेस बंगाल में उनके ही साथ जाना पसंद कर रही है, बल्कि यह भी है कि उसकी रीति-नीति भी वामपंथ से प्रभावित होती जा रही है।

क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि पी. चिदंबरम अनुच्छेद 370 की वापसी की मांग करते हैं और कांग्रेस नेतृत्व चुप रहना पसंद करता है? इसी तरह तेलंगाना में कांग्रेस के नेता फ्रांस के उत्पादों पर रोक लगाने की मांग करते हैं और पार्टी नेतृत्व मौन धारण किए रहता है। पार्टी नेतृत्व का यही रवैया भोपाल के अपने उस विधायक के मामले में भी दिखा, जिसने फ्रांस के विरोध में हजारों लोगों की भीड़ उतार दी। कांग्रेस अपने हिसाब से राजनीति करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन उसकी मौजूदा रीति-नीति देखकर यह कहना कठिन है कि वह राष्ट्रवादी विचारों वाली पार्टी है।

ध्यान रहे इसके पहले खुद राहुल गांधी ने जेएनयू के उन छात्र नेताओं के साथ खड़े होना पसंद किया था, जिन्होंने बेहद आपत्तिजनक नारे लगाए थे। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राम मंदिर और तीन तलाक के सवाल पर कांग्रेस का रवैया कैसा रहा?

बेहतर हो कि कांग्रेस यह समझे कि वह जिस राह पर चल रही है, उससे और कमजोर ही होगी, क्योंकि अब उसकी विचारधारा करीब-करीब वही दिखती है, जो वाम दलों की है। यदि उसे वाम दलों की विचारधारा अपनाने में कोई आपत्ति नहीं तो फिर वह केरल में उनके खिलाफ क्यों है? सवाल यह भी है कि गठबंधन राजनीति के नाम पर अपनी जमीन छोड़कर विरोधी दलों से समझौता करके क्या हासिल होना वाला है?

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