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विजय गर्ग: भारत में विवाह सिर्फ एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि इसे एक संस्था का दर्जा हासिल है। इससे गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अवधारणा जुड़ी है। विवाह वह संस्था है, जो दो व्यक्तियों को जीवन भर के लिए प्रेम, भरोसे और समर्पण के रिश्ते में बांधती है। विवाह का उद्देश्य केवल एक-दूसरे का साथ निभाना नहीं, बल्कि एक संपूर्ण परिवार की नींव रखना भी होता है। यही वजह है कि विवाह से उत्पन्न होने वाले रिश्ते समाज की रीढ़ माने जाते हैं। हैं। विवाह जैसी संस्था ताउम्र सह- :-जीवन की पैरवी करती है। हमारे देश में विवाह सदियों पुरानी परंपरा है, जिसके बिना सब कुछ अधूरा सा महसूस होता है। हमारा समाज विवाह से उपजे रिश्ते को न केवल स्वीकार करता है, बल्कि इज्जत भी देता है। इतनी समृद्ध परंपरा वाले इस देश में क्षणिक रिश्तों की ओर भागने की कोशिश की जा रही है। क्षणिक रिश्तों के फायदे समाज में प्रचारित किए जा रहे हैं, पर सवाल है कि यह सब किसलिए किया जा रहा है? क्या फिर पाश्चात्य संस्कृति की यह किसी बाजारवाद से प्रेरित है या कुत्सित त्सित साजिश, जिसकी दिलचस्पी भारतीय संस्कृति को हमेशा कमजोर करने में रही है।
इन दिनों परंपराओं में यकीन करने वाले भारत में एक नया शब्द तेजी से उभारा जा रहा है, वह है- 'नैनोशिप' यह शब्द एक 'डेटिंग एप' ने पेश किया है, जिसमें दावा किया गया कि वर्ष 2025 में रूमानी रिश्तों की परिभाषा इसके जरिए बदल जाएगी। 'नैनोशिप' के बारे में भारत में पहले कोई चर्चा नहीं होती थी। यह चर्चा तो तबसे होने लगी, जब डेटिंग एप ने हौले से 'ईयर इन स्वाइप 2024' नामक एक रपट परोस दी। यह एप प्रति वर्ष ऐसी रपट में डेटिंग के अलग-अलग तरीके बताता है। इस बार भी इस रपट में ऐसा ही किया गया, जब 'नैनोशिप' की अवधारणा लोगों सामने रख कर दावा किया गया कि यह एक ऐसा नया तरीका है, वर्ष 2025 में डेटिंग की दुनिया को अलग तरह से प्रभावित कर सकता है और प्यार करने की | परिभाषा 1 को I तरह बदल सकता है। सवाल उठता है। भारतीय समाज में ऐसी अवधारणा का प्रसार क्यों किया रहा है? क्या यह विचार हमारी संस्कृति और मूल्यों के अनुकूल है ? दरअसल, 'नैनोशिप' एक ऐसा रिश्ता है जो बेहद अल्पकालिक होता है। यह यह कुछ घंटों, दिनों या हफ्तों के लिए हो सकता है। अठारह से चौतीस वर्ष के बीच के आठ हजार युवाओं के बीच सर्वे में यह पाया गया कि रोमांस और तात्कालिक जुड़ाव उनके लिए बहुत मायने रखता है। विशेष रूप से कुंआरे युवाओं के लिए 'नैनोशिप' आकर्षक विकल्प बन क्योंकि इसमें कोई जिम्मेदारी या सामाजिक बंधन नहीं होता।
यह रिश्ता सिर्फ 'पल र की खुशी' के लिए होता है। मगर सवाल यह है। क्या आठ हजार लोगों का सर्वेक्षण एक पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करता है? भारत की 1 करोड़ से अधिक है और उसमें भी युवा वर्ग करोड़ों की संख्या में है। ऐसे में मात्र आठ हजार लोगों के विचारों के आधार पर एक सामाजिक रुख को स्थापित करना न केवल भ्रामक है, बल्कि समाज को गलत दिशा में धकेलने के समान भी है। सवाल यह भी है कि क्या एक सीमित और लक्षित सर्वे से पूरे देश की मानसिकता का अनुमान लगाया जा सकता है ? यह एक विचारणीय प्रश्न है जिसका उत्तर खोजने की जरूरत है।
जो लोग इसके महिमामंडन में जुटे हैं, उनका तर्क है कि इस रिश्ते में भावात्मक जुड़ाव शून्य या नाममात्र होता है। इसमें किसी पर कोई दायित्व नहीं। न ही लंबे समय तक किसी का बोझ ढोने की मजबूरी। जिस प्रकार देश में 'नैनोशिप' को बढ़ावा देने की कोशिशें हो रही हैं, उनमें बाजारवाद साफ महसूस होता है। आज 'डेटिंग एप' एक बड़ा उद्योग बन चुका है जो रिश्तों को एक उपभोग की वस्तु के रूप में परोस रहे हैं। इससे बाजार को नए उत्पाद और नए ग्राहक मिलते हैं। सवाल है कि क्या यह प्रेम की तलाश है या मुनाफे का गणित ? बाजार में उपभोक्ताओं को भावात्मक संबंध' नहीं, बल्कि 'संतोषजनक अनुभव' चाहिए, जिसे जब चाहे लिया और जब व चाहे छोड़ा जा सके। यह भारतीय समाज की भावपूर्ण, स्थायित्व और समर्पण की मूल भावना के विपरीत है।
हमारे समाज की सबसे बड़ी ताकत उसका पारिवारिक ढांचा है। इसलिए विवाह को केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक संस्था माना गया है। विवाह में सात फेरे जैसी रस्में जीवन भर साथ निभाने का वचन हैं। यह रिश्ता केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं बल्कि दो परिवारों के बीच होता है। इसमें समाज की भागीदारी होती है और यही सामाजिक समर्थन एक परिवार को मजबूती देता है हमारी संस्कृति में विवाह को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना जाता है। इसमें शारीरिक या तात्कालिक आकर्षण से कहीं अधिक एक गहन भावनात्मक और आध्यात्मिक जुड़ाव होता है। ऐसे में केवल मस्ती और पल भर के संतोष पर आधारित 'नैनोशिप' जैसे रिश्ते क्या हमारे समाज में स्वीकार किए जा सकत सकते हैं?
हाल के वर्षों का अनुभव बताता है कि सह-जीवन में धोखा और बिखराव एवं हिंसा की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। प्रेम के रिश्ते में बंधने का दावा करने वाले लोगों ने किस प्रकार अपने साथी को निर्ममता से मौत के घाट उतारा है, यह कई बार देखा गया है। जब रिश्तों में स्थायित्व और जिम्मेदारी नहीं होती, तब उनका परिणाम अक्सर मानसिक तनाव, अकेलेपन और कभी-कभी अपराध तक पहुंच जाता है। 'नैनोशिप' जैसे रिश्तों में तो भावना और जिम्मेदारी का बिल्कुल अभाव ही है। ऐसे रिश्ते एक अस्थिर सामाजिक वातावरण ही बना सकते हैं जिसमें लोग सिर्फ अपनी तात्कालिक इच्छाओं के लिए जीते हैं। ऐसे लोगों के पास यह सोचने का समय ही नहीं होता कि उनके कर्मों का प्रभाव समाज और अन्य लोगों पर क्या होगा ?
सवाल यह नहीं है कि यह नया विचार हमारे समाज को किस कदर प्रभावित कर पाएगा, बल्कि सवाल तो यह है कि हम इसके प्रभावों के प्रति कितने जागरूक हैं? यह समय चुनौतीपूर्ण और सजग होने का है। पश्चिम का अंधानुकरण कर हम पहले ही बहुत कुछ खो चुके हैं। अब हमें बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि रिश्तों में धैर्य, समझदारी, समर्पण और जिम्मेदारी कितनी जरूरी है। हमें बाजार की ओर से से थोपे जा जा रहे 'नए 'चलन' को आंख मूंद कर स्वीकार करने के बजाय अपनी संस्कृति और परंपराओं को ध्यान में रख कर उसका मूल्यांकन करना चाहिए।
संभव है 'नैनोशिप' जैसे रिश्ते पश्चिमी देशों के समाज में फिट बैठते हों। उनके यहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता सामाजिक जिम्मेदारियों से ऊपर है, लेकिन भारत में यह विचार सिर्फ अस्थिरता, निराशा और टूटन ही लाएगा। हमारे देश में रिश्ते सिर्फ निजी नहीं हैं, रिश्तों को सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यता प्राप्त है। हमारे पारंपरिक समाज के लिए इस तरह के अल्प अवधि के रिश्ते न केवल अस्वीकार्य हैं, बल्कि यह सांस्कृतिक हमला भी है। यह विवाह बनाम वासना का मामला है, जिसके जरिए रिश्तों की परिभाषा बदलने की कोशिश की जा रही है।
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब
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