सम्पादकीय

बदलाव का वाहक बनती मधुमक्खियां

Gulabi Jagat
4 Jun 2025 11:12 PM IST
बदलाव का वाहक बनती मधुमक्खियां
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विजय गर्ग

गांव की किसी पगडंडी पर चलते हुए दूर से आती भनभनाहट और रंग-बिरंगी मधुमक्खियों की कतार देख कर बहुत से लोग शायद यही सोचें कि यह प्रकृति का कोई सामान्य दृश्य है मगर यही मधुमक्खियां अब ग्रामीण भारत में बदलाव की नई तस्वीर बना रही हैं।

मधुमक्खी पालन ऐसा व्यवसाय है, जिसमें रोजगार, पर्यावरण संतुलन, कृषि उत्पादकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की संभावनाएं घुली हुई हैं। ये संभावनाएं केवल शहद बेचने तक सीमित नहीं, बल्कि एक पूरी मूल्य श्रृंखला का निर्माण करती हैं जो भारत को 'मीठी क्रांति' की ओर ले जा सकती हैं। भारत में मधुमक्खी पालन की परंपरा कोई नई नहीं है, लेकिन जिस रूप में अब यह वैज्ञानिक, संगठित और व्यावसायिक स्तर पर सामने आ रही है, वह पिछले कुछ दशकों की मेहनत और जागरूकता का परिणाम है।

देश में शहद का उत्पादन 1.33 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच चुका है। यही नहीं, भारत से शहद का निर्यात भी अब 50 से अधिक देशों में हो रहा है जिससे 750 1750 करोड़ रुपए 5 रुपए से अधिक की विदेशी मुद्रा अर्जित हो रही है। आंकड़े केवल व्यापार की कहानी नहीं सुनाते, ये एक नई आजीविका, आत्मनिर्भरता और जैव विविधता की संभावनाओं का द्वार खोलते हैं। मधुमक्खी पालन की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह • यह बहुत कम निवेश में शुरू हो सकता है। किसी भी उम्र, वर्ग और शिक्षा का व्यक्ति इसे सीख कर अपना काम शुरू कर सकता है। देश के कई हिस्सों में इस व्यवसाय ने बेरोजगार युवाओं, छोटे किसानों, महिलाओं और आदिवासियों को एक स्थायी और सम्मानजनक आय का माध्यम दिया है। झारखंड, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों में अब यह एक मजबूत ग्रामीण उद्यम बन कर उभरा है। राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन (एनबीएचएम) जैसी योजनाएं भी इस दिशा में मील का पत्थर साबित हुई हैं। वर्ष 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत इसके लिए 500 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज घोषित किया गया। इससे प्रशिक्षण, उपकरण, कालोनी वितरण, गुणवत्ता नियंत्रण और विपणन के लिए सुदृढ़ संरचना विकसित की जा रही है।

मधुमक्खी पालन का एक बड़ा वैज्ञानिक पहलू यह भी है कि 5 यह केवल शहद के लिए नहीं, बल्कि परागण के लिए भी अत्यंत जरूरी है। शोध बताते हैं कि जिन खेतों में मधुमक्खियों की उपस्थिति होती है, वहां फसलों की उत्पादकता में 15 से 40 फीसद तक की वृद्धि देखी जाती जाती है। । इसका सीधा लाभ किसानों को होता है, क्योंकि बिना किसी अतिरिक्त लागत के उसकी फसल अधिक फलने-फूलने लगती है। सरसों, सूरजमुखी, तिल, सेब, अमरूद, मूंगफली और खीरा जैसी कई फसलें ऐसी हैं जो मधुमक्खियों की मदद के बिना बेहतर उपज नहीं दे सकतीं। यानी मधुमक्खी न केवल शहद देती है, बल्कि किसान की जमीन भी उपजाऊ बना देती है। | इतना ही नहीं, मधुमक्खी पालन से मोम, जेली और मधु पराग जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पाद भी मिलते हैं, जिनका उपयोग औषधि, सौंदर्य प्रसाधन, खाद्य पूरक और आयुर्वेदिक दवाओं में होता है। मोम से बनी मोमबत्तियां, साबुन और क्रीम अब शहरी बाजारों उच्च मांग वाले उत्पाद बन चुके हैं।

भारत में शहद की मांग लगातार बढ़ रही है, विशेषकर कोविड के बाद जब लोग प्रतिरक्षा बढ़ाने के लिए प्राकृतिक विकल्पों की ओर मुड़े आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में शहद को 'योगवाहि' कहा गया है, जो अन्य औषधियों को शरीर में पहुंचाने में सहायक होता है। यही नहीं, 'फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथारिटी आफ इंडिया' यानी भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने भी शुद्ध शहद के लिए नए मानक तय कर दिए हैं, जिससे बाजार में गुणवत्तापूर्ण उत्पादों की मांग और बढ़ी है। इस बदलाव ने प्रशिक्षित मधुमक्खी पालकों के लिए बड़ा बाजार खोल दिया है। हालांकि, यह राह पूरी तरह फूलों से नहीं भरी है। जलवायु परिवर्तन, कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल, जैव विविधता का ह्रास और शुद्ध चारागाहों की कमी मधुमक्खियों के लिए खतरे की घंटी हैं। भारत में पांच प्रमुख मधुमक्खी प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से कई प्रजातियां अब घटती जा रही हैं। शोध बताते हैं कि यदि मधुमक्खियां विलुप्त हो जाएं, तो केवल वर्षों के भीतर पूरी खाद्य श्रृंखला असंतुलित हो सकती है। इसलिए यह न केवल एक व्यवसाय है, बल्कि प्रकृति संरक्षण की भी एक जिम्मेदारी है।

भारत में मधुमक्खी पालन पालन उद्योग ने पिछले कुछ वर्षों में तेजी से विकास किया है। आंकड़े बताते हैं कि शहद उत्पादन निर्यात में बेतहाशा वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2018-19 से 2022-23 के बीच भारत का घरेलू शहद उत्पादन 72. 172 फीसद बढ़ कर 77,000 टन से 1,33,000 टन तक पहुंच गया, जबकि निर्यात 86 फीसद की बढ़ोतरी के साथ 43,000 टन से से लगभग 80,000 टन तक जा पहुंचा। आज भारत वैश्विक शहद बाजार में छठा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है। हालांकि, निर्यात का अधिकांश हिस्सा, लगभग 80 फीसद, अमेरिका तक सीमित है, जबकि यूरोपीय संघ और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे नए बाजारों में में प्रवेश कर भारत इस उद्योग को और अधिक विस्तार दे सकता है। सरकार भी मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय है।

भविष्य की दृष्टि से देखें तो भारत तो भारत में मधुमक्खी पालन को एक संगठित कृषि सहयोगी व्यवसाय के रूप में विकसित किया जा सकता है। कृषि, बागवानी और मधुमक्खी पालन को एकीकृत करने की योजनाओं और डिजिटल विपणन मंच की उपलब्धता ने इस क्षेत्र को नई उड़ान दी है। आज ग्रामीण युवा न केवल अपने गांव में मधुमक्खी पालन कर रहे हैं, कर रहे हैं, बल्कि ई-कामर्स वेबसाइटों और सोशल मीडिया के माध्यम से से देशभर में अपना नाम कुछ कृषि शहद बेच रहे हैं। युवा किसानों को इस और आकर्षित करने के लिए विश्वविद्यालयों और विज्ञान केंद्रों की ओर से चलाए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। एक और जहां मधुमक्खी पालन किसानों की आमदनी बढ़ाने में महिला सशक्तीकरण का भी माध्यम रहा है। है, वहां यह बन उत्तर प्रदेश के के मुजफ्फरनगर, , झारखंड के गुमला और राजस्थान के बांसवाड़ा जैसे क्षेत्रों में र सैकड़ों महिलाएं स्वयं सहायता समूहों की मदद से मधुमक्खी पालन कर आत्मनिर्भर हो चुकी हैं।

पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की दृष्टि से भी यह एक हरित व्यवसाय है। न तो इसमें बड़े पैमाने पर भूमि की आवश्यकता होती है, न ही भारी मशीनरी की और न ही कार्बन उत्सर्जन होता है। यह एक ऐसा व्यवसाय है जो प्रकृति से सीधे जुड़ता है और टिकाऊ विकास की अवधार को | साकार करता है। जिस समय दुनिया जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ आजीविका की बात बात कर रही है, भारत का मधुमक्खी पालन एक प्रेरणा बन सकता है। । इस पूरे परिदृश्य मैं एक बात स्पष्ट है कि मधुमक्खी पालन अब केवल एक ग्रामीण कारीगरी नहीं रहा, यह आधुनिक कृषि विज्ञान, उद्यमिता, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक बाजार की संभावनाओं से जुड़ चुका है। यह शहद से आगे की कहानी है, फूलों से शुरू होकर खेतों तक और खेतों से होकर आर्थिक स्वतंत्रता तक पहुंचने वाली। आज जब भारत आत्मनिर्भरता की राह पर अग्रसर है, तब हर गांव में गूंजती मधुमक्खियों की भनभनाहट हमें यह याद दिला रही है कि असली शक्ति हमारे खेतों, फूलों और हाथों में है। शहद की मिठास न केवल स्वाद है, यह ग्रामीण भारत की संभावनाओं का एक सुवासित प्रतीक भी है। एक उड़ान, जो आत्मनिर्भरता, समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण की ओर जाती है।

विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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