सम्पादकीय

मरम्मत की संस्कृति बनाम बदलाव की अंधी दौड़ | दुनिया मेरे आगे

Gulabi Jagat
21 April 2026 3:35 PM IST
मरम्मत की संस्कृति बनाम बदलाव की अंधी दौड़ | दुनिया मेरे आगे
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आम तौर पर हमारी सामान्य स्मृतियों में पंसारी, चाय और कपड़े की दुकानों के साथ कुछ हल्की-मध्यम रोशनी में डूबी, पुरानी तारों, मोटरों, टीवी और फ्रिज के खुले-बिखरे पुर्जों से भरी किसी मैकेनिक की छोटी-सी दुकान के दृश्य भी कहीं बसे हुए हैं। दीवार पर टंगी कुछ फीकी पड़ चुकी तस्वीरें, औजारों से भरा एक बक्सा, और कहीं कोने में बजता हुआ कोई पुराना रेडियो और अपनी किसी बिगड़ी हुई चीज के ठीक होने के इंतजार में वहां बैठकर ऊबता हुआ कोई ग्राहक, मानो समय वहां ठहरकर बैठ गया हो।

एक समय था जब रोजमर्रा की जरूरतों में गली में इन दुकानों का होना उतना ही स्वाभाविक था, जितना घर में एक पंखे या घड़ी का होना। रात-बिरात बिगड़े हुए पंखे या अचानक बंद हो गए टीवी के लिए उस व्यक्ति को ढूंढ लिया जाता था, जिसे इस्त्री, रेडियो से लेकर हर दूसरी चीज को ठीक करने का हुनर आता था। बिगड़ी हुई चीजों को उस व्यक्ति के पास ले जाने में एक अजीब-सी निश्चितता होती थी कि इन्हें ठीक किया जा सकता है। जोड़-तोड़ और सुधार की प्रवृत्ति लंबे समय से यहां की संस्कृति का हिस्सा रही है।

आज के समय में यह दृश्य तेजी से बदलता हुआ दिखाई देता है। कपड़ों, उपकरणों और दैनिक उपयोग की चीजों की बहुलता से चमचमाते बाजारों में किसी वस्तु के बिगड़ने पर पहला विचार उसे ठीक कराने का नहीं, बल्कि उसे बदल देने का आता है, एक चीज के रहते हुए उसके बाद, उसकी जगह लिए जाने वाले सामान की कल्पना पहले ही कर ली जाती है। लगातार नए रुझानों के बीच, जो कपड़े कुछ समय पहले तक सामान्य उपयोग में थे, वे बहुत जल्दी ही पुराने और अप्रासंगिक मान लिए जाते हैं।

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परिणामस्वरूप, बड़े पैमाने पर ये कचरे के ढेरों और ‘लैंडफिल’ यानी कचरापट्टी क्षेत्र में पहुंचते हैं। यह बदलाव केवल सुविधा का परिणाम नहीं है। निस्संदेह, तकनीकी विकास ने ऐसी स्थितियां निर्मित की हैं, जहां नई चीज या नई वस्तु प्राप्त करना पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया है। मगर यह भी उतना ही सत्य है कि इस सहजता ने हमारे निर्णय लेने के तरीकों को बदल दिया है। जो चीज कुछ समय और ध्यान देकर सुधारी जा सकती थी, अब वे उतने धैर्य की मांग करती हुई प्रतीत होती हैं, जितना हम देना नहीं चाहते।

असुविधा या असंतोष की स्थिति में ठहरकर समाधान खोजने के बजाय उससे बाहर निकलने की प्रवृत्ति अधिक सहज लगने लगी है। विकल्पों की उपलब्धता ने इसे और अधिक आसान बना दिया है। यही प्रवृत्ति धीरे-धीरे निजी जीवन और संबंधों में भी दिखाई देने लगी है। किसी असहमति या असुविधा की स्थिति में ठहरकर उसे समझने के बजाय रिश्ते से बाहर निकलना और छोड़ना या बदल देना अधिक सहज प्रतीत होने लगा है।

किसी भी संबंध में थोड़ी-सी संघर्ष की प्रक्रिया, कुछ ठहराव और समय के साथ आने वाली गहराई ही अपनापन और जुड़ाव विकसित करती है। इसके विपरीत, बार-बार बदलाव और नए संबंधों की ओर बढ़ना, भले ही क्षणिक नवीनता दे, पर भीतर कहीं एक प्रकार की रिक्तता छोड़ जाता है। ऐसे में केवल बाजार को प्रभाव उत्पन्न करने वाली शक्ति मान लेना पर्याप्त नहीं है। वह जितना समाज के व्यवहार को प्रभावित करता है, उतना ही समाज के भीतर मौजूद प्रवृत्तियों से संचालित भी होता है। इसलिए बदलती आदतों और बढ़ती प्रतिस्थापन-प्रवृत्ति के पीछे केवल बाजार नहीं, बल्कि समाज की स्वीकृति और उसकी अंतर्निहित प्रवृत्तियां भी शामिल हैं।

सूक्ष्मता से अवलोकन किया जाए तो इस संपूर्ण द्वंद्व के केंद्र में केवल मनुष्य ही खड़ा है। भौतिक वस्तुओं और बुनियादी जरूरतों को तुरंत बदल देने की जो प्रवृत्ति फैली है, अब वह धीरे-धीरे व्यक्तिगत संबंधों के गहरे दायरे में भी प्रवेश कर चुकी है। तात्कालिक संतुष्टि की यह अंधी दौड़ केवल वस्तुओं तक सीमित न रहकर मनुष्य की आंतरिक शांति को भी लील रही है। यह कह पाना बहुत कठिन है कि प्रतिस्थापन की यह प्रवृत्ति भविष्य में जीवन के और किन-किन पहलुओं में घुसपैठ करेगी और पहले से ही संकट झेल रही प्रकृति तथा मानवीय अस्तित्व को और कितना नष्ट करेगी।

विडंबना यह है कि आज वही मनुष्य इस पूरे द्वंद्व के बीच संघर्ष कर रहा है, जिसे जीवित रहने के लिए आत्मीयता, प्रेम और शांति की अनिवार्य आवश्यकता है। यह समझे जाने की बहुत जरूरत है कि स्वयं मनुष्य भी बदलाव की इस अंधी प्रवृत्ति के साथ अधिक समय तक स्वस्थ नहीं रह सकता। निरंतर और अकारण बदलाव की इस उत्कंठा के साथ जीवन का निर्वाह हमेशा के लिए संभव नहीं है। जीवन के इन बुनियादी तत्वों को समझने की अक्षमता के कारण ही आज असंख्य लोग मानसिक अशांति और असुरक्षा की ओर बढ़ रहे हैं। यह बड़ी भूल है कि आज मानव ने निरंतर नवीनता की ओर बढ़ते जाने की कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया को विकास का पर्याय मान लिया है, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति तीनों के समन्वय को भीतर से खोखला करता जा रहा है। इसके विपरीत मानव जीवन की वास्तविक सफलता निरंतर नवीनता को प्राप्त कर लेने की अपेक्षा इसमें अधिक है कि वह जीवन में अपने भीतर किस स्तर तक ठहराव, धैर्य और सह-अस्तित्व विकसित कर पाता है।

सोर्स : जनसत्ता

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