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धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से ज्यादा जरूरी क्या था सोनम वांगचुक ने खोला राज
Ratna Netam
30 Aug 2026 4:34 PM IST

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दिल्ली : शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक एक समय केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए थे। लेकिन जब उन्होंने 26 दिनों तक चले अपने अनशन को खत्म किया तो उनकी प्रमुख मांगों में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की बात नहीं रही। इसके बाद सवाल उठने लगे कि आखिर सोनम वांगचुक ने अपनी इस मांग को पीछे क्यों किया और क्या वजह थी कि उन्हें समझौते का रास्ता अपनाना पड़ा।
सोनम वांगचुक ने बाद में बताया कि उनका फैसला किसी गुप्त समझौते का हिस्सा नहीं था। उन्होंने कहा कि उस समय उनकी सबसे बड़ी चिंता आंदोलन से जुड़े छात्रों और प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा थी। उन्हें डर था कि अगर स्थिति ज्यादा बिगड़ी तो प्रदर्शनकारियों पर सख्त कार्रवाई हो सकती है और आंदोलन हिंसक मोड़ ले सकता है।
इस्तीफे की मांग क्यों उठाई गई थी?
सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों ने शिक्षा व्यवस्था में कथित अनियमितताओं, परीक्षा प्रक्रिया में खामियों और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर आवाज उठाई थी। आंदोलनकारियों का कहना था कि ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और सरकार को जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए।
इसी क्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी सामने रखी गई थी। आंदोलनकारियों का तर्क था कि शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे मंत्री को व्यवस्था में हुई बड़ी चूक के लिए नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
26 दिन के अनशन के बाद बदला रुख
सोनम वांगचुक ने लंबे समय तक भूख हड़ताल जारी रखी। उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल भी ले जाया गया। इस दौरान सरकार की ओर से बातचीत की कोशिशें हुईं। बातचीत के बाद उन्होंने अनशन समाप्त करने का फैसला लिया।
हालांकि, इस फैसले के बाद लोगों ने सवाल उठाया कि जिस मांग को लेकर आंदोलन शुरू हुआ था, उसमें बदलाव क्यों किया गया। वांगचुक ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि आंदोलन का उद्देश्य केवल किसी एक व्यक्ति का इस्तीफा नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करना था।
सबसे बड़ा डर था प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा
सोनम वांगचुक के मुताबिक, उन्हें सबसे ज्यादा चिंता इस बात की थी कि कहीं आंदोलन में शामिल छात्रों और युवाओं के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई न हो जाए। उन्होंने कहा कि दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के साथ तनाव की स्थिति देखकर उन्हें पहले की घटनाएं याद आ गई थीं।
उन्होंने आशंका जताई कि अगर आंदोलन लंबा चलता और स्थिति बिगड़ती तो इसका नुकसान छात्रों और आम प्रदर्शनकारियों को उठाना पड़ सकता था। इसलिए उन्होंने शांति बनाए रखने और लिखित आश्वासन मिलने के बाद अनशन खत्म करने का फैसला किया।
सरकार से मिला लिखित आश्वासन
वांगचुक ने कहा कि उन्होंने सरकार के साथ किसी गुप्त समझौते के तहत कदम नहीं उठाया, बल्कि उन्हें कुछ मुद्दों पर लिखित आश्वासन मिला था। उनका कहना था कि आंदोलन का मकसद टकराव पैदा करना नहीं बल्कि व्यवस्था में सुधार लाना था।
उनके अनुसार, अगर सरकार छात्रों की मांगों पर सकारात्मक कदम उठाती है तो यह आंदोलन की बड़ी उपलब्धि होगी। उन्होंने जवाबदेही के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया।
आलोचकों ने उठाए सवाल
हालांकि, सोनम वांगचुक के इस फैसले पर कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए। आलोचकों का कहना था कि जब आंदोलन की मुख्य मांग शिक्षा मंत्री का इस्तीफा थी तो उसे पूरा किए बिना अनशन खत्म करना कमजोर पड़ने जैसा है।
वहीं वांगचुक के समर्थकों का कहना है कि किसी भी आंदोलन में रणनीति बदलना जरूरी होता है। उनका कहना है कि अगर आंदोलनकारियों की सुरक्षा खतरे में हो तो बातचीत के रास्ते को अपनाना गलत नहीं है।
आंदोलन का असली मुद्दा शिक्षा सुधार
सोनम वांगचुक का कहना है कि उनका संघर्ष किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए है। उन्होंने कहा कि केवल इस्तीफा हो जाने से समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, छात्रों का भरोसा और जवाबदेही जरूरी है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि आगे भी शिक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर आवाज उठाई जाती रहेगी।
राजनीति भी हुई तेज
इस पूरे मामले ने राजनीतिक रंग भी लिया। विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। वहीं सरकार का कहना रहा कि वह शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए लगातार कदम उठा रही है।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और आंदोलन को लेकर देशभर में चर्चा हुई। बाद में जब इस्तीफे की खबर आई तो सोनम वांगचुक ने इसे लोकतंत्र और शांतिपूर्ण आंदोलन की जीत बताया।
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