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11 साल की बच्ची की कैंसरग्रस्त हड्डी का अनोखा इलाज

Ratna Netam
30 Sept 2026 5:48 PM IST
11 साल की बच्ची की कैंसरग्रस्त हड्डी का अनोखा इलाज
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नई दिल्ली। दिल्ली के द्वारका स्थित आकाश हेल्थकेयर सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में उज़्बेकिस्तान की 11 वर्षीय बच्ची के बोन कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष अंग-बचाव प्रक्रिया अपनाई गई। डॉक्टरों ने बच्ची की जांघ की कैंसर प्रभावित हड्डी यानी फीमर के हिस्से को शरीर से निकालकर रेडिएशन के लिए दूसरे अस्पताल भेजा और उपचार के बाद उसी हड्डी को वापस लाकर रिकंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल किया। हड्डी को सुरक्षित और कम समय में पहुंचाने के लिए दोनों अस्पतालों के बीच ‘ग्रीन कॉरिडोर’ की व्यवस्था की गई।
बच्ची को बाईं जांघ में ऑस्टियोसारकोमा था। ऑस्टियोसारकोमा हड्डी का कैंसर है, जो बच्चों और किशोरों में ज्यादा देखा जाता है और अक्सर जांघ या पैर की लंबी हड्डियों को प्रभावित कर सकता है। बच्ची का भारत आने से पहले उज़्बेकिस्तान में कीमोथेरेपी के आठ साइकल हो चुके थे। दिल्ली पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने उसकी स्थिति का दोबारा आकलन किया।
जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि कैंसर से प्रभावित फीमर में कड़ापन था। मेडिकल टीम के सामने मुख्य चुनौती कैंसर प्रभावित हिस्से को हटाने के साथ बच्ची के पैर को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित रखने की थी। इसके बाद डॉक्टरों ने ऐसी प्रक्रिया की योजना तैयार की, जिसमें प्रभावित हड्डी को शरीर से निकालकर कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के लिए हाई-डोज रेडिएशन दिया जाता है और फिर उसी हड्डी को ग्राफ्ट के रूप में दोबारा लगाया जाता है।
इस तकनीक को चिकित्सा भाषा में **Extracorporeal Radiation Therapy and Reimplantation (ECRT)** कहा जाता है। इसमें ट्यूमर प्रभावित हड्डी को आवश्यक सर्जिकल मार्जिन के साथ निकाला जाता है, फिर शरीर से बाहर उस पर उच्च मात्रा में रेडिएशन देकर कैंसर कोशिकाओं को निष्क्रिय किया जाता है। इसके बाद उपचारित हड्डी को मरीज के शरीर में वापस लगाकर प्लेट और स्क्रू जैसे उपकरणों से स्थिर किया जा सकता है। इस तकनीक का इस्तेमाल कुछ बोन सारकोमा मामलों में अंग बचाने वाली सर्जरी के विकल्प के रूप में किया जाता है।
मेडिकल टीम ने बच्ची को सीधे उस हाई-डोज रेडिएशन के संपर्क में लाने के बजाय केवल निकाले गए कैंसर प्रभावित फीमर के हिस्से पर रेडिएशन देने का फैसला किया। इसके लिए ऑपरेशन के दौरान हड्डी का प्रभावित हिस्सा सावधानीपूर्वक अलग किया गया। इसके बाद उसे निर्धारित मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत रेडिएशन थेरेपी के लिए द्वारका स्थित मणिपाल हॉस्पिटल भेजा गया।
इस पूरी प्रक्रिया में समय बेहद महत्वपूर्ण था। ऑपरेशन चल रहा था और उपचारित हड्डी को जल्द से जल्द वापस ऑपरेशन थिएटर तक पहुंचाना जरूरी था। इसी कारण दोनों चिकित्सा संस्थानों के बीच ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया, ताकि हड्डी को सड़क यातायात में देरी के बिना एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल और वापस पहुंचाया जा सके।
रेडिएशन पूरा होने के बाद फीमर के उस हिस्से को वापस आकाश हेल्थकेयर लाया गया। इसके बाद सर्जिकल टीम ने इसे रिकंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल किया। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मरीज की अपनी हड्डी को संरचनात्मक ग्राफ्ट के रूप में बचाकर रखना होता है। उच्च मात्रा की रेडिएशन कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करती है, जबकि हड्डी का ढांचा आगे रिकंस्ट्रक्शन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस तरह की प्रक्रिया का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कुछ मामलों में मरीज को पूरी हड्डी को कृत्रिम इम्प्लांट से बदलने की जरूरत कम हो सकती है। खासकर बच्चों और किशोर मरीजों में अंग को बचाना डॉक्टरों के लिए महत्वपूर्ण लक्ष्य होता है। हालांकि ECRT हर मरीज के लिए उपयुक्त नहीं होती। ट्यूमर की जगह, आकार, हड्डी की स्थिति, कैंसर का फैलाव और मरीज की उम्र समेत कई पहलुओं का आकलन करने के बाद ही इसका फैसला किया जाता है।
मणिपाल हॉस्पिटल की जानकारी के अनुसार extracorporeal radiation and reimplantation बोन सारकोमा के लिए स्थापित जैविक रिकंस्ट्रक्शन तकनीकों में शामिल है। इसका उपयोग ऑस्टियोसारकोमा, ईविंग सारकोमा और कुछ अन्य बोन ट्यूमर के चुनिंदा मामलों में किया जा सकता है। उपचारित हड्डी शरीर में धीरे-धीरे ग्राफ्ट की तरह जुड़ सकती है, लेकिन इसके लिए लंबे समय तक निगरानी और फॉलो-अप की जरूरत होती है।
ऑस्टियोसारकोमा के इलाज में आमतौर पर कीमोथेरेपी और सर्जरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आधुनिक चिकित्सा में जहां संभव हो, डॉक्टर अम्प्यूटेशन के बजाय limb-salvage surgery यानी अंग बचाने वाली सर्जरी को प्राथमिकता देने की कोशिश करते हैं। हालांकि अंतिम उपचार योजना कैंसर के प्रकार, स्टेज और मरीज की व्यक्तिगत स्थिति पर निर्भर करती है।
इस मामले में डॉक्टरों के सामने एक और चुनौती बच्ची की उम्र थी। 11 साल की उम्र में हड्डियों का विकास जारी रहता है, इसलिए रिकंस्ट्रक्शन के दौरान भविष्य की गतिशीलता और हड्डी की मजबूती को भी ध्यान में रखना पड़ता है। इलाज का उद्देश्य केवल कैंसर प्रभावित हिस्से को हटाना नहीं, बल्कि लंबे समय तक पैर की कार्यक्षमता बनाए रखने की कोशिश करना भी था।
यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली में कैंसर प्रभावित हड्डी को शरीर से बाहर रेडिएशन देकर वापस लगाने की तकनीक इस्तेमाल की गई है। 2018 में भी आकाश हेल्थकेयर में उज़्बेकिस्तान की एक बच्ची के ऑस्टियोसारकोमा के इलाज के लिए इसी तरह की limb-salvage प्रक्रिया की रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें निकाली गई हड्डी को रेडिएशन के बाद दोबारा लगाया गया था।
मौजूदा मामले में ग्रीन कॉरिडोर की मदद से सर्जरी और रेडिएशन थेरेपी के बीच तेजी से समन्वय बनाया गया। डॉक्टरों की बहु-विषयक टीम ने ऑर्थोपेडिक ऑन्कोलॉजी, रेडिएशन और रिकंस्ट्रक्शन को एक साथ जोड़कर बच्ची के पैर को बचाने की दिशा में उपचार किया। आगे उसकी रिकवरी, हड्डी के जुड़ने और कैंसर की स्थिति पर नियमित मेडिकल फॉलो-अप के जरिए निगरानी की जाएगी।
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