दिल्ली-एनसीआर

बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरनाक जहरीली हवा, डॉक्टर ने चेताया

Ratna Netam
5 Nov 2026 3:56 PM IST
बच्चों और बुजुर्गों के लिए खतरनाक जहरीली हवा, डॉक्टर ने चेताया
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नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता के बीच एम्स के पूर्व निदेशक और प्रसिद्ध फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ. रणदीप गुलेरिया ने लोगों को गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण एक खामोश कातिल है, जो धीरे-धीरे मानव शरीर को नुकसान पहुंचाता है और पहले से मौजूद बीमारियों को अधिक गंभीर बना देता है। प्रदूषित हवा का असर केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हृदय, रक्त वाहिकाओं और शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकती है। विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और सांस तथा हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए बढ़ता प्रदूषण बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।डॉ. गुलेरिया ने 3 नवंबर 2026 को दिल्ली में वायु प्रदूषण की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) गंभीर और अत्यंत गंभीर श्रेणी तक पहुंचना सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती है। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल में इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनल मेडिसिन, रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन के चेयरमैन डॉ. गुलेरिया ने कहा कि प्रदूषण का सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ता है, जो पहले से अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) या हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित हैं।
पहले से बीमार लोगों के लिए बढ़ता खतरा
डॉ. गुलेरिया के अनुसार, वायु प्रदूषण का असर कई बार तुरंत दिखाई नहीं देता, लेकिन यह शरीर के भीतर लगातार नुकसान पहुंचा सकता है।प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण सांस के माध्यम से फेफड़ों में प्रवेश करते हैं और सूजन बढ़ा सकते हैं। इससे सांस लेने में कठिनाई, खांसी, सीने में जकड़न और ऑक्सीजन की कमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।अस्थमा और सीओपीडी के मरीजों में प्रदूषण के संपर्क से बीमारी के लक्षण अचानक गंभीर हो सकते हैं। ऐसे मरीजों को सांस फूलने, लगातार खांसी और सीने में भारीपन की शिकायत हो सकती है।हृदय रोगियों के लिए भी प्रदूषित हवा जोखिम बढ़ा सकती है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से हृदय संबंधी जटिलताओं की आशंका बढ़ सकती है।
बच्चों के फेफड़ों के विकास पर गंभीर असर
डॉ. गुलेरिया ने बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर विशेष चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से बच्चों के फेफड़ों का सामान्य विकास प्रभावित हो सकता है।बच्चों के फेफड़े विकसित हो रहे होते हैं, इसलिए प्रदूषण के सूक्ष्म कण उनके स्वास्थ्य पर अधिक प्रभाव डाल सकते हैं।उन्होंने अध्ययनों का हवाला देते हुए कहा कि अत्यधिक प्रदूषित वातावरण में रहने वाले बच्चों के फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। इसका असर भविष्य में भी बना रह सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में लगातार खांसी, सांस लेने में परेशानी, आंखों में जलन और एलर्जी जैसे लक्षण प्रदूषण के कारण बढ़ सकते हैं। इसलिए अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में बच्चों की बाहरी गतिविधियों को सीमित रखना जरूरी है।
स्वस्थ लोगों को भी हो सकती हैं परेशानियां
डॉ. गुलेरिया ने स्पष्ट किया कि वायु प्रदूषण का खतरा केवल पहले से बीमार लोगों तक सीमित नहीं है।अत्यधिक प्रदूषित वातावरण में रहने वाले स्वस्थ व्यक्तियों को भी सांस लेने में परेशानी, गले में खराश, आंखों में जलन और लगातार खांसी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।विशेष रूप से लंबे समय तक बाहर काम करने वाले लोगों, यातायात कर्मियों, निर्माण श्रमिकों और खुले वातावरण में अधिक समय बिताने वालों को प्रदूषण के संपर्क का अधिक खतरा रहता है।प्रदूषित हवा में मौजूद PM2.5 जैसे अत्यंत सूक्ष्म कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से हृदय और श्वसन संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है।
सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है प्रदूषण?
डॉ. गुलेरिया ने बताया कि सर्दियों के दौरान मौसम की परिस्थितियां प्रदूषण को अधिक गंभीर बना देती हैं।तापमान गिरने और हवा की गति कम होने से प्रदूषक तत्व वातावरण की निचली परतों में जमा होने लगते हैं। इससे हवा की गुणवत्ता तेजी से खराब हो सकती है।दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य इलाकों में वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों की धूल, पराली जलाने और पटाखों जैसी गतिविधियां प्रदूषण बढ़ाने में योगदान देती हैं।इन सभी स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं।
जीवन प्रत्याशा पर भी पड़ सकता है असर
डॉ. गुलेरिया ने चेतावनी दी कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से व्यक्ति की जीवन प्रत्याशा प्रभावित हो सकती है।उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण से होने वाला नुकसान अक्सर धीरे-धीरे सामने आता है। यह पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं को गंभीर बनाकर अस्पताल में भर्ती होने और असमय मृत्यु का जोखिम बढ़ा सकता है।वैज्ञानिक अध्ययनों में भी लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क और हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों की बीमारियों तथा फेफड़ों के कैंसर के बीच संबंध सामने आए हैं।इसी कारण विशेषज्ञ वायु प्रदूषण को केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती मानते हैं।
प्रदूषण से बचाव के लिए जरूरी सावधानियां
डॉ. गुलेरिया और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
- घर से निकलने से पहले अपने क्षेत्र का AQI जांचें।
- प्रदूषण अधिक होने पर अनावश्यक बाहरी गतिविधियों से बचें।
- बाहर जाना जरूरी हो तो अच्छी फिटिंग वाला N95 मास्क पहनें।
- बच्चों और बुजुर्गों को अत्यधिक प्रदूषण के संपर्क से बचाएं।
- अस्थमा और हृदय रोग के मरीज अपनी नियमित दवाएं जारी रखें।
- घर के अंदर धूम्रपान, अगरबत्ती और अन्य धुआं पैदा करने वाली गतिविधियों से बचें।
- सांस लेने में गंभीर परेशानी, सीने में दर्द या ऑक्सीजन की कमी होने पर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लें।
प्रदूषण रोकने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
डॉ. गुलेरिया का मानना है कि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए केवल व्यक्तिगत सावधानियां पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए सरकार, प्रशासन और आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा।वाहनों के उत्सर्जन पर नियंत्रण, औद्योगिक प्रदूषण कम करना, निर्माण स्थलों पर धूल रोकना और पराली जलाने जैसी समस्याओं का स्थायी समाधान आवश्यक है।विशेषज्ञों का कहना है कि वायु प्रदूषण के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने में देरी आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है।डॉ. गुलेरिया की चेतावनी ऐसे समय सामने आई है, जब दिल्ली-एनसीआर में खराब वायु गुणवत्ता लोगों की चिंता बढ़ा रही है। उनका संदेश स्पष्ट है कि प्रदूषण से बचाव को गंभीरता से लेना जरूरी है, क्योंकि स्वच्छ हवा स्वस्थ जीवन की बुनियादी आवश्यकता है।
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