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प्रदर्शन का अधिकार है पर अनुमति जरूरी लोक पाल सिंह

Ratna Netam
7 Oct 2026 9:02 PM IST
प्रदर्शन का अधिकार है पर अनुमति जरूरी लोक पाल सिंह
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नई दिल्ली। उत्तराखंड हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस लोक पाल सिंह ने बुधवार को कहा कि लोकतंत्र में हर व्यक्ति को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल कानून और निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ विरोध करते समय भी आवश्यक अनुमति लेना और निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शन करना जरूरी है।
जस्टिस लोक पाल सिंह की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। विपक्ष की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग भी की जा रही है और दिल्ली में इसे लेकर लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं।
पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि विरोध का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन किसी भी प्रदर्शन को कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े नियमों के तहत आयोजित किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि विरोध प्रदर्शन के लिए प्रशासन द्वारा निर्धारित प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों और नेताओं को विशेष रूप से इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संवैधानिक संस्थाओं या अधिकारियों के खिलाफ अपनी असहमति व्यक्त करते समय कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रदर्शन के लिए यदि अनुमति की आवश्यकता है तो उसे पहले प्राप्त किया जाना चाहिए और विरोध निर्धारित स्थान पर ही किया जाना चाहिए।
दिल्ली में जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थानों में से एक है। दिल्ली पुलिस ने बुधवार को स्पष्ट किया कि यहां प्रदर्शन आयोजित करने के लिए पहले से अनुमति लेना जरूरी है। पुलिस के मुताबिक आयोजकों को आमतौर पर कम से कम 10 दिन पहले आवेदन देना होता है और प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या को लेकर भी सीमाएं निर्धारित हैं।
SIR को लेकर हाल के दिनों में राजनीतिक विवाद तेज हुआ है। विपक्षी दलों ने मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए हैं। इसी के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में कई प्रदर्शन हुए हैं। चुनाव आयोग ने विपक्ष की ओर से लगाए गए पक्षपात और अनियमितताओं के आरोपों से इनकार किया है।
बुधवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसदों को भी दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिया गया। विपक्षी नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR प्रक्रिया को लेकर अपना विरोध दर्ज कराया। पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन के दौरान निर्धारित अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े नियमों का पालन कराना उसकी जिम्मेदारी है।
जस्टिस लोक पाल सिंह की टिप्पणी इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उन्होंने विरोध प्रदर्शन के अधिकार पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक अधिकार और कानूनी दायित्व साथ-साथ चलते हैं। उनके मुताबिक किसी मुद्दे पर असहमति व्यक्त करना नागरिकों और राजनीतिक दलों का अधिकार है, लेकिन उसका तरीका भी कानून के अनुरूप होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक पदों और संस्थाओं को लेकर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं। राजनीतिक दल अपनी मांगें रख सकते हैं, धरना दे सकते हैं और विरोध प्रदर्शन भी कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए स्थापित प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए। इससे एक तरफ लोगों का विरोध का अधिकार सुरक्षित रहता है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक व्यवस्था भी बनी रहती है।
SIR को लेकर विवाद केवल राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है। हाल के दिनों में इस प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े कई मुद्दे अदालतों तक भी पहुंचे हैं। विभिन्न याचिकाओं में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से संबंधित निर्णयों को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
विपक्ष का आरोप है कि SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता से जुड़े सवाल पैदा हुए हैं। विपक्षी नेता लगातार दावा कर रहे हैं कि पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को सही और अद्यतन रखने के लिए पुनरीक्षण प्रक्रिया जरूरी है और इसका उद्देश्य अपात्र या गलत प्रविष्टियों को हटाना है।
इसी विवाद को लेकर छात्र संगठनों और अन्य समूहों ने भी दिल्ली में प्रदर्शन किए हैं। इससे पहले 2 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ आयोजित प्रदर्शन को पुलिस की अनुमति नहीं मिली थी। इसके बावजूद प्रदर्शन होने के बाद पुलिस ने सुरक्षा बढ़ाई और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू किए थे।
जस्टिस लोक पाल सिंह का कहना है कि ऐसे मामलों में अधिकार और प्रक्रिया दोनों का संतुलन जरूरी है। लोकतंत्र में सरकार, चुनाव आयोग या किसी अन्य संवैधानिक संस्था की आलोचना की जा सकती है और उनके निर्णयों के खिलाफ विरोध भी दर्ज कराया जा सकता है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शन करते समय प्रशासनिक और कानूनी नियमों का पालन किया जाना चाहिए।
उनकी टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है जब चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच टकराव लगातार बढ़ रहा है। कांग्रेस समेत विपक्षी दल SIR के मुद्दे को लेकर अपना आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं, जबकि पुलिस बिना अनुमति प्रदर्शन और प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रवेश को लेकर कार्रवाई कर रही है।
पूर्व न्यायाधीश का जोर इस बात पर रहा कि विरोध का अधिकार लोकतंत्र की बुनियादी विशेषता है, लेकिन यह अधिकार पूरी तरह निरंकुश नहीं है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने और दूसरे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ प्रक्रियाएं और प्रतिबंध निर्धारित किए गए हैं।
इस तरह जस्टिस लोक पाल सिंह ने मौजूदा राजनीतिक विवाद में विरोध प्रदर्शन के अधिकार और कानूनी प्रक्रिया दोनों को महत्वपूर्ण बताया है। उनका स्पष्ट संदेश है कि किसी भी संवैधानिक अधिकारी के खिलाफ विरोध किया जा सकता है, लेकिन उसके लिए अनुमति, निर्धारित स्थान और कानून में तय प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए।
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