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मक्का की ग्रैंड मस्जिद से जुड़ा काला अध्याय 14 दिन तक चली थी जंग
Ratna Netam
17 Sept 2026 2:20 PM IST

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नई दिल्ली। दुनिया भर के मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र स्थलों में शामिल सऊदी अरब की **मस्जिद अल-हरम (ग्रैंड मस्जिद), मक्का** इतिहास में कई बार बड़े संकटों की गवाह रही है। इस पवित्र स्थल पर हुई घटनाओं में सबसे भयावह घटना 1979 की थी, जब हथियारबंद लोगों ने मस्जिद पर कब्जा कर लिया था और करीब दो हफ्तों तक यहां संघर्ष चलता रहा था। हाल के वर्षों में यमन के हूती विद्रोहियों से जुड़े हमलों की खबरों ने एक बार फिर उस पुराने संकट की यादें ताजा कर दीं।
हालांकि 1979 और हालिया क्षेत्रीय तनाव की घटनाएं अलग-अलग परिस्थितियों में हुईं, लेकिन दोनों ने मक्का की सुरक्षा और मध्य-पूर्व की राजनीति को लेकर दुनिया का ध्यान खींचा।
1979 में ग्रैंड मस्जिद पर हुआ था कब्जा
20 नवंबर 1979 को इस्लामिक कैलेंडर के नए साल के पहले दिन सैकड़ों हथियारबंद लोगों ने मक्का की ग्रैंड मस्जिद में प्रवेश किया। इन लोगों का नेतृत्व जुहैमैन अल-ओतैबी नामक व्यक्ति कर रहा था।
हमलावरों ने मस्जिद परिसर पर कब्जा कर लिया और वहां मौजूद लोगों को बंधक बना लिया। उन्होंने अपने साथी मोहम्मद अब्दुल्ला अल-कहतानी को मसीहा (महदी) घोषित किया और सऊदी शासन के खिलाफ विद्रोह का ऐलान किया।
यह घटना सऊदी अरब के इतिहास की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौतियों में से एक बन गई।
14 दिनों तक चला था संघर्ष
ग्रैंड मस्जिद बेहद विशाल और संवेदनशील स्थान था। हमलावरों ने मस्जिद के अंदर ऊंचे स्थानों और भूमिगत हिस्सों में मोर्चा संभाल लिया था।
सऊदी सुरक्षा बलों ने मस्जिद को खाली कराने के लिए अभियान शुरू किया, लेकिन पवित्र स्थल के कारण कार्रवाई बेहद कठिन थी। संघर्ष करीब दो सप्ताह तक चला।
इस दौरान गोलीबारी हुई और बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई। अंत में सऊदी बलों ने मस्जिद को हमलावरों से मुक्त कराया और मुख्य नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
1979 की घटना क्यों थी इतनी बड़ी?
यह घटना केवल सुरक्षा संकट नहीं थी, बल्कि सऊदी अरब और पूरे इस्लामी जगत के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका थी।
ग्रैंड मस्जिद पर हमला इसलिए भी बेहद गंभीर माना गया क्योंकि इस्लाम में मक्का को सबसे पवित्र शहर माना जाता है। यहां किसी भी तरह की हिंसा दुनिया भर के मुसलमानों के लिए बेहद संवेदनशील विषय रही है।
इस घटना के बाद सऊदी अरब ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव किए और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा को लेकर नए कदम उठाए।
हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनाव
यमन के हूती विद्रोही समूह और सऊदी अरब के बीच वर्षों से तनाव रहा है। यमन में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद हूती समूह ने सऊदी अरब की ओर कई बार मिसाइल और ड्रोन हमले किए।
सऊदी अरब ने कई मौकों पर इन हमलों को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताया। हूती समूह का कहना रहा है कि उसके हमले क्षेत्रीय संघर्ष और सऊदी नेतृत्व वाली सैन्य गतिविधियों के जवाब में हैं।
मक्का की सुरक्षा हमेशा बड़ा मुद्दा रही है
मक्का में हर साल लाखों लोग हज और उमरा के लिए पहुंचते हैं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के कारण सुरक्षा व्यवस्था हमेशा एक बड़ी चुनौती रहती है।
सऊदी सरकार ने पिछले दशकों में ग्रैंड मस्जिद और आसपास के क्षेत्रों में निगरानी, सुरक्षा तकनीक और आपात प्रबंधन व्यवस्था को मजबूत किया है।
मध्य-पूर्व की राजनीति से जुड़ा बड़ा संदर्भ
मक्का से जुड़ी सुरक्षा घटनाओं को केवल स्थानीय घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाता। मध्य-पूर्व में सऊदी अरब, ईरान, यमन और अन्य देशों के बीच राजनीतिक और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का असर क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ता रहा है।
हूती विद्रोहियों को ईरान समर्थित समूह माना जाता है, हालांकि ईरान और हूती दोनों इस संबंध की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है।
1979 और आज की घटनाओं में अंतर
1979 में ग्रैंड मस्जिद पर हमला एक प्रत्यक्ष कब्जे और बंधक संकट के रूप में सामने आया था। वहीं बाद के वर्षों में सऊदी अरब को मुख्य रूप से सीमा पार मिसाइल और ड्रोन हमलों जैसी सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
दोनों घटनाओं की प्रकृति अलग है, लेकिन दोनों ने यह दिखाया कि मक्का जैसे धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले स्थानों की सुरक्षा कितनी संवेदनशील है।
मक्का की सुरक्षा पर दुनिया की नजर
ग्रैंड मस्जिद दुनिया के सबसे अधिक देखे जाने वाले धार्मिक स्थलों में से एक है। यहां होने वाली किसी भी सुरक्षा घटना का असर केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित करता है।
1979 की घटना आज भी इतिहास के सबसे चर्चित धार्मिक स्थलों पर हुए हमलों में गिनी जाती है। वहीं मध्य-पूर्व में जारी राजनीतिक तनाव के कारण मक्का और उसके आसपास की सुरक्षा को लेकर सतर्कता लगातार बनी हुई है।
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