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लाइव स्ट्रीमिंग के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

Ratna Netam
9 Oct 2026 5:35 PM IST
लाइव स्ट्रीमिंग के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो से चुनिंदा क्लिप निकालना, उन्हें गलत संदर्भ में प्रस्तुत करना और निजी प्रचार या आर्थिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने इस मुद्दे पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की गतिविधियों से न्यायपालिका की पूरी संस्था प्रभावित हो रही है। उन्होंने अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रभावी सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया।मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ कोर्टरूम की कार्यवाही के वीडियो को बिना अनुमति निकालने और उनसे पैसे कमाने के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने लाइव-स्ट्रीमिंग की सामग्री के इस्तेमाल और उसके संभावित दुष्प्रभावों पर चिंता जताई।
CJI बोले- बार और बेंच को हो रहा गंभीर नुकसान
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने कहा कि अदालती कार्यवाही के वीडियो का जिस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, उससे न्यायपालिका को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।उन्होंने टिप्पणी की, "आपको अंदाजा भी नहीं है कि इससे बार और बेंच... यानी खुद इस संस्था को कितना नुकसान हो रहा है।"मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी से स्पष्ट है कि अदालत इस मुद्दे को केवल वीडियो के अनधिकृत इस्तेमाल तक सीमित नहीं मान रही है। न्यायिक कार्यवाही से जुड़े वीडियो को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करने से अदालत की कार्यप्रणाली और उससे जुड़े लोगों की छवि प्रभावित होने की आशंका भी है।अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि लाइव-स्ट्रीमिंग का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाना है, लेकिन इसके दुरुपयोग को रोकना भी आवश्यक है।
चुनिंदा वीडियो क्लिप बनाने पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान विशेष रूप से अदालती कार्यवाही के चुनिंदा हिस्सों को वीडियो क्लिप के रूप में प्रसारित किए जाने पर चिंता व्यक्त की।किसी सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों और वकीलों के बीच कई तरह के सवाल-जवाब होते हैं। इनका संबंध संबंधित मामले के तथ्यों, कानूनी प्रावधानों और न्यायिक तर्कों से होता है।यदि पूरी कार्यवाही से किसी छोटे हिस्से को अलग करके प्रस्तुत किया जाए, तो उसके वास्तविक संदर्भ को समझना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में दर्शकों के सामने अदालत की टिप्पणियों का अधूरा या भ्रामक अर्थ पहुंचने की आशंका रहती है।अदालत की चिंता इसी तरह के संभावित दुरुपयोग को लेकर सामने आई है। पीठ ने संकेत दिया कि न्यायिक कार्यवाही की रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।
बिना अनुमति वीडियो निकालकर कमाई करने का मामला
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष दायर याचिका में कोर्टरूम की कार्यवाही के वीडियो को बिना अनुमति निकालने और उनका व्यावसायिक इस्तेमाल करने का मुद्दा उठाया गया है।याचिका का संबंध ऐसे वीडियो से आर्थिक लाभ प्राप्त करने की गतिविधियों से है। सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि न्यायिक कार्यवाही की सामग्री को निजी कमाई या प्रचार का साधन बनाया जा रहा है।अदालत के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल है कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न्यायिक वीडियो का इस्तेमाल किस सीमा तक किया जा सकता है और किन परिस्थितियों में इसके लिए अनुमति आवश्यक होगी।हालांकि, उपलब्ध जानकारी में याचिका के सभी कानूनी आधारों और संबंधित पक्षों की विस्तृत दलीलों का उल्लेख नहीं है।
लाइव-स्ट्रीमिंग की पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी
अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग का एक प्रमुख उद्देश्य आम लोगों को न्यायिक प्रक्रिया से जोड़ना और न्यायपालिका के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ाना है।इस व्यवस्था के माध्यम से नागरिक महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई देख सकते हैं और अदालत में होने वाली कानूनी बहसों को समझ सकते हैं।लेकिन लाइव-स्ट्रीमिंग के वीडियो का इस्तेमाल यदि गलत जानकारी फैलाने, किसी टिप्पणी को संदर्भ से अलग प्रस्तुत करने या निजी प्रचार के लिए किया जाता है, तो इससे इस व्यवस्था के मूल उद्देश्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा उपायों की आवश्यकता बताई है।न्यायाधीशों और वकीलों की टिप्पणियों का गलत अर्थ निकालने का खतराअदालत में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश कई बार कानूनी मुद्दों को समझने के लिए सवाल पूछते हैं। इसी प्रकार वकील अपने पक्ष में अलग-अलग तर्क प्रस्तुत करते हैं।इन सवालों और तर्कों को अदालत के अंतिम निर्णय के समान नहीं माना जा सकता। किसी मामले की सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी और अदालत के लिखित आदेश के बीच महत्वपूर्ण अंतर होता है।यदि वीडियो के किसी छोटे हिस्से को बिना संदर्भ के प्रसारित किया जाता है, तो दर्शक उसे अदालत का अंतिम निष्कर्ष समझ सकते हैं।इस तरह की स्थिति न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भ्रम पैदा कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से व्यक्त चिंता को इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
व्यावसायिक इस्तेमाल पर नियंत्रण के लिए सुरक्षा उपाय जरूरी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही के वीडियो के इस्तेमाल को लेकर प्रभावी सुरक्षा उपाय अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।इन उपायों का उद्देश्य वीडियो के अनधिकृत इस्तेमाल, भ्रामक प्रस्तुति और निजी प्रचार के लिए न्यायिक सामग्री के दुरुपयोग को रोकना होगा।हालांकि, उपलब्ध विवरण में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि अदालत ने इस संबंध में कोई अंतिम दिशा-निर्देश जारी किए हैं या नहीं।यह भी स्पष्ट नहीं है कि वीडियो के व्यावसायिक इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए किस प्रकार की व्यवस्था लागू करने पर विचार किया जा रहा है।
न्यायपालिका की गरिमा और सार्वजनिक विश्वास का सवाल
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों ने न्यायिक पारदर्शिता और डिजिटल सामग्री के जिम्मेदार इस्तेमाल के बीच संतुलन का महत्वपूर्ण प्रश्न सामने रखा है।एक ओर अदालती कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग से नागरिकों को न्यायिक प्रक्रिया समझने का अवसर मिलता है, वहीं दूसरी ओर इस सामग्री को गलत संदर्भ में प्रसारित करने से न्यायपालिका के प्रति सार्वजनिक धारणा प्रभावित हो सकती है।मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने बार और बेंच को होने वाले नुकसान का उल्लेख करते हुए इस विषय की गंभीरता को रेखांकित किया।अदालत की चिंता यह है कि न्यायिक कार्यवाही का प्रसारण पारदर्शिता बढ़ाने का माध्यम बना रहे, न कि व्यक्तिगत प्रचार या व्यावसायिक लाभ का साधन।
आगे की सुनवाई और न्यायिक निर्देशों पर नजर
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित इस याचिका में आगे की कानूनी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। अदालत को यह तय करना होगा कि लाइव-स्ट्रीमिंग की उपलब्धता और उसके दुरुपयोग को रोकने के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाए।फिलहाल मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने वीडियो क्लिप के चयनात्मक इस्तेमाल, भ्रामक प्रस्तुति और उनसे कमाई किए जाने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।अदालत की टिप्पणियों से यह स्पष्ट है कि न्यायिक कार्यवाही की डिजिटल सामग्री का जिम्मेदार इस्तेमाल सुनिश्चित करना एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। अब इस मामले में आगे आने वाले न्यायिक निर्देशों से ही स्पष्ट होगा कि लाइव-स्ट्रीमिंग के दुरुपयोग को रोकने के लिए कौन-से ठोस कदम उठाए जाएंगे।
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