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क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र की याचिका खारिज

Rajeshwari Nishad
6 Nov 2026 2:43 PM IST
क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र की याचिका खारिज
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नई दिल्ली। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण में क्रीमी लेयर निर्धारित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की उस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें 11 मार्च 2026 के फैसले को लागू करने के लिए दो वर्ष का अतिरिक्त समय मांगा गया था। अदालत ने दोहराया कि ओबीसी उम्मीदवार की क्रीमी लेयर स्थिति का निर्धारण केवल उसके माता-पिता की वेतन से होने वाली आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए माता-पिता के पद, सेवा की श्रेणी और सामाजिक स्थिति से संबंधित निर्धारित मानदंडों पर भी विचार करना आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का प्रभाव विशेष रूप से उन ओबीसी उम्मीदवारों पर पड़ेगा, जिनके माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों या निजी कंपनियों में कार्यरत हैं। ऐसे कई उम्मीदवारों को पूर्व में माता-पिता की वेतन आय के आधार पर क्रीमी लेयर में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने से वंचित किया गया था।अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार किसी उम्मीदवार को केवल इस आधार पर नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी से बाहर नहीं कर सकती कि उसके माता-पिता का वेतन निर्धारित आय सीमा से अधिक है। इसके लिए आरक्षण से संबंधित मूल नियमों और सेवा संबंधी मानदंडों का पालन करना जरूरी है।
दरअसल, यह विवाद केंद्र सरकार के 1993 के कार्यालय ज्ञापन और वर्ष 2004 में जारी स्पष्टीकरण से जुड़ा हुआ है। वर्ष 1993 में ओबीसी क्रीमी लेयर की पहचान के लिए विभिन्न श्रेणियां निर्धारित की गई थीं। इनमें सरकारी सेवा में माता-पिता के पद और उनकी सेवा की स्थिति को विशेष महत्व दिया गया था।इसके अतिरिक्त आय एवं संपत्ति संबंधी एक अलग परीक्षण की व्यवस्था भी की गई थी। इस परीक्षण के तहत वेतन और कृषि से प्राप्त आय को अन्य निर्धारित आय से अलग रखने का प्रावधान था। हालांकि, वर्ष 2004 के स्पष्टीकरण के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी संस्थानों के कर्मचारियों की वेतन आय को लेकर विवाद पैदा हो गया।
मामला तब अदालतों तक पहुंचा, जब सिविल सेवा परीक्षा में सफल कुछ ओबीसी उम्मीदवारों को क्रीमी लेयर में शामिल मानते हुए आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया। इन उम्मीदवारों के माता-पिता सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों और अन्य संस्थानों में कार्यरत थे।उम्मीदवारों का तर्क था कि सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बीच क्रीमी लेयर की पहचान के लिए अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि यदि सरकारी कर्मचारियों के मामले में पद और सेवा की स्थिति का परीक्षण किया जाता है, तो अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों के लिए भी समान सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए।
इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा था कि केवल आय सीमा के आधार पर किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में शामिल करना उचित नहीं है। संबंधित कर्मचारी की सेवा श्रेणी और पद की स्थिति भी महत्वपूर्ण है।शीर्ष अदालत ने यह भी माना था कि वर्ष 2004 का स्पष्टीकरण वर्ष 1993 के मूल कार्यालय ज्ञापन के प्रावधानों को बदल नहीं सकता। किसी प्रशासनिक स्पष्टीकरण के आधार पर मूल नीति की व्यवस्था को प्रभावित करना कानूनसम्मत नहीं होगा।
इसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से फैसले के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्टीकरण मांगा। सरकार की ओर से कहा गया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और निजी संस्थानों में विभिन्न पदों की सरकारी पदों के साथ समानता निर्धारित करने के लिए समय की आवश्यकता है।केंद्र ने इस प्रक्रिया के लिए दो वर्ष का समय देने का अनुरोध किया था। सरकार का यह भी तर्क था कि फैसले को पुराने मामलों पर लागू करने से पहले से पूरी हो चुकी भर्तियों और नियुक्तियों में प्रशासनिक कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं।
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फैसले के क्रियान्वयन के लिए दो वर्ष की अतिरिक्त मोहलत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया कि 11 मार्च 2026 का फैसला पूर्व में पूरी हो चुकी नियुक्तियों पर पिछली तारीख से लागू नहीं होगा। इस प्रकार अदालत ने पुराने मामलों और लंबित भर्ती प्रक्रियाओं के बीच अंतर स्पष्ट किया।अदालत ने सिविल सेवा परीक्षा 2025 के उम्मीदवारों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस परीक्षा का परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित हो चुका है, लेकिन उम्मीदवारों को सेवाओं का अंतिम आवंटन अभी पूरा नहीं हुआ है।ऐसी स्थिति में अदालत ने स्पष्ट किया कि सिविल सेवा परीक्षा 2025 में चयनित ओबीसी उम्मीदवारों के सेवा आवंटन में 11 मार्च के फैसले के सिद्धांत लागू होंगे। अदालत ने माना कि जब सेवा आवंटन की प्रक्रिया अभी लंबित है, तो नए कानूनी सिद्धांत को लागू करने में देरी का पर्याप्त औचित्य नहीं है।
इस आदेश का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से चयनित उम्मीदवारों को भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय विदेश सेवा और अन्य केंद्रीय सेवाओं में नियुक्त किया जाता है। क्रीमी लेयर की स्थिति में बदलाव से पात्र उम्मीदवारों के आरक्षण लाभ और सेवा आवंटन पर असर पड़ सकता है।विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र और आरक्षण पात्रता के निर्धारण में स्पष्टता बढ़ सकती है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि ओबीसी क्रीमी लेयर की व्यवस्था समाप्त हो गई है या सभी
प्रकार
की आय को गणना से बाहर कर दिया गया है।
अदालत का मुख्य निष्कर्ष यह है कि माता-पिता की वेतन आय को अकेला निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। क्रीमी लेयर का निर्धारण संबंधित नियमों में निर्धारित पद, सेवा स्थिति और अन्य लागू मानदंडों के अनुसार ही किया जाएगा।अब केंद्र सरकार और संबंधित विभागों के सामने अदालत के निर्देशों के अनुरूप लंबित मामलों का निपटारा करने की जिम्मेदारी होगी। इस फैसले से उन उम्मीदवारों को राहत मिलने की संभावना है, जो केवल माता-पिता की वेतन आय के आधार पर आरक्षण लाभ से वंचित किए जाने के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।
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