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CJP प्रोटेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, अनुमति बिना प्रदर्शन अवैध

Ashish verma
10 Oct 2026 12:16 AM IST
CJP प्रोटेस्ट पर सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, अनुमति बिना प्रदर्शन अवैध
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नई दिल्ली। राजधानी में आज, शनिवार 10 अक्टूबर को प्रस्तावित कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शन से पहले सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति और कानून के पालन को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अनुमति नहीं मिलने की स्थिति में प्रदर्शन अवैध होगा। साथ ही अदालत ने विरोध करने के अधिकार को स्वीकार करते हुए सार्वजनिक व्यवस्था और आम नागरिकों की सुविधाओं के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। सुनवाई में प्रदर्शन से पहले मेट्रो और रेल सेवाओं पर लगाई गई पाबंदियों का मुद्दा प्रमुख रहा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने परिवहन संबंधी प्रतिबंधों से लोगों को होने वाली परेशानी उठाई। सीजेपी और अन्य समूहों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन का आह्वान किया है। प्रदर्शनकारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठा रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग इस आंदोलन का प्रमुख मुद्दा है। इन आरोपों को प्रदर्शनकारियों के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने मेट्रो स्टेशन बंद करने और दिल्ली आने वाली ट्रेनों को रद्द करने का मुद्दा उठाकर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की। उन्होंने कहा कि पाबंदियों के कारण लोगों का आवागमन प्रभावित हो रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने भी व्यापक प्रतिबंधों पर आपत्ति जताई। अदालत के सामने सवाल यह था कि प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा की तैयारी करते समय सामान्य नागरिकों की आवाजाही किस हद तक प्रभावित की जा सकती है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि संगठन बनाने और विरोध करने के अधिकार का इस्तेमाल कानून के अनुसार होना चाहिए। पीठ ने यह भी पूछा कि प्रदर्शन करने वाला समूह अदालत के सामने मौजूद नहीं है तो दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अदालत ने प्रदर्शन से जुड़ी जमीनी स्थिति और अधिक जानकारी की आवश्यकता बताई। वकीलों ने अतिरिक्त विवरण के साथ वापस आने की बात कही। इस दौरान विरोध के अधिकार और अनुमति की आवश्यकता, दोनों विषयों पर चर्चा हुई।
बाद की सुनवाई में अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि वे प्रदर्शन के आयोजकों की ओर से उपस्थित नहीं हुए हैं। उनकी चिंता दिल्ली के उन नागरिकों को लेकर है, जिनकी आवाजाही परिवहन संबंधी पाबंदियों से प्रभावित हो रही है। अदालत ने आयोजकों को दोपहर में उपस्थित होने के लिए कहा था, लेकिन सुनवाई दोबारा शुरू होने पर वे मौजूद नहीं थे। पीठ ने छात्रों, कर्मचारियों, वरिष्ठ नागरिकों और सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर अन्य लोगों की कठिनाइयों का उल्लेख किया।
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन को अनुमति नहीं दी है। संयुक्त पुलिस आयुक्त नुपुर प्रसाद के अनुसार, आवेदन निर्धारित समयसीमा के अनुसार नहीं दिया गया। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन की जानकारी कम से कम दस दिन पहले मिलनी चाहिए, जबकि इस आयोजन की सूचना कम समय पहले मिली। अनुमति देने से इनकार करने के पीछे पुलिस ने पूर्व प्रदर्शन में निर्देशों और निर्धारित समय का पालन नहीं होने का आरोप भी लगाया है।
पुलिस ने मौजूदा कानून-व्यवस्था, यातायात और सार्वजनिक सुरक्षा की स्थिति को भी अपने निर्णय का आधार बताया। नई दिल्ली क्षेत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू होने का उल्लेख किया गया है। पुलिस के अनुसार, संबंधित आदेश का उल्लंघन होने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। दूसरी ओर, सीजेपी ने अनुमति नहीं मिलने के बावजूद प्रदर्शन करने की बात कही है। संगठन ने अपने आंदोलन को शांतिपूर्ण रखने का दावा किया है।
परिवहन प्रतिबंधों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि मेट्रो और रेल सेवाओं को पूरी तरह बंद करने के बजाय नियंत्रित तरीके से चलाने पर विचार किया जाए। अदालत ने प्रतिबंधों को आवश्यकता के अनुपात में रखने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उपाय कर सकता है, लेकिन इससे लोगों को परिवहन सुविधाओं से पूरी तरह वंचित नहीं किया जाना चाहिए। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संबंधित अधिकारियों के सामने अदालत की चिंता रखने का आश्वासन दिया।
अदालत के सामने 57 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास बंद करने तथा नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन आने वाली ट्रेनों को रद्द करने से संबंधित जानकारी रखी गई। पीठ ने परिवहन संचालन के बारे में लिए जाने वाले निर्णय का पर्याप्त प्रचार करने को भी कहा, ताकि यात्रियों को अनावश्यक परेशानी न हो। न्यायमूर्ति बागची ने सेवाओं की आवृत्ति घटाने और उन्हें पूरी तरह रोक देने के बीच अंतर बताया। अदालत की चिंता सामान्य यात्रियों के लिए आवश्यक परिवहन उपलब्ध रहने पर केंद्रित थी।
केंद्र की ओर से कहा गया कि सुरक्षा उपाय पूर्व प्रदर्शनों के दौरान सामने आई परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किए गए हैं। वहीं अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका विचार फिलहाल परिवहन सेवाओं के मुद्दे तक सीमित है। इसलिए मेट्रो और रेल संचालन संबंधी निर्देश को सीजेपी के प्रदर्शन की अनुमति नहीं माना जा सकता। आज के आयोजन को लेकर पुलिस की अनुमति का प्रश्न अलग बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में कानून के पालन के साथ आम नागरिकों की आवाजाही सुरक्षित रखने पर जोर दिया गया।
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