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24 घंटे से ज्यादा हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, तत्काल रिहाई का निर्देश
Ratna Netam
5 Nov 2026 7:35 PM IST

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तार व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी के बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय-सीमा उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से नहीं, बल्कि वास्तव में हिरासत में लिए जाने के समय से शुरू होगी। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियां किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में रखकर और बाद में उसकी गिरफ्तारी दर्ज करके संवैधानिक समय-सीमा को आगे नहीं बढ़ा सकतीं।गुरुवार, 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति को निर्धारित समय में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। इस समय-सीमा की गणना उस क्षण से होगी, जब संबंधित व्यक्ति की स्वतंत्रता वास्तव में समाप्त हो जाती है और वह जांच एजेंसी के नियंत्रण में आ जाता है।सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिरासत और औपचारिक गिरफ्तारी के बीच कृत्रिम अंतर पैदा करना संवैधानिक अधिकारों के विपरीत है। किसी व्यक्ति को पूछताछ, तलाशी या जांच के नाम पर लंबे समय तक अपने नियंत्रण में रखना और बाद में गिरफ्तारी का समय दर्ज करना स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने कहा कि संविधान किसी जांच एजेंसी को ऐसा अतिरिक्त समय नहीं देता, जिसमें व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली जाए, लेकिन उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार न दिखाया जाए। यदि ऐसा किया जाता है, तो अनुच्छेद 22(2) के तहत मिलने वाली सुरक्षा कमजोर पड़ जाएगी।यह फैसला त्रिपुरा से जुड़े एक मादक पदार्थ मामले में सुनाया गया है। इस मामले में चार व्यक्तियों ने त्रिपुरा हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाईकोर्ट ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज एक्ट यानी एनडीपीएस कानून के तहत दर्ज मामले में उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था।मामले में आरोपियों का कहना था कि जांच एजेंसी ने उन्हें 29 सितंबर 2025 को दोपहर करीब दो बजे अपने नियंत्रण में ले लिया था। इसके बावजूद उनकी औपचारिक गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर को दर्ज की गई। जांच एजेंसी ने गिरफ्तारी के आधिकारिक समय को आधार बनाकर 24 घंटे की अवधि की गणना की थी।सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता 29 सितंबर को दोपहर दो बजे ही समाप्त हो गई थी, तो संवैधानिक समय-सीमा उसी समय से शुरू मानी जाएगी। संबंधित व्यक्तियों को आवश्यक यात्रा समय की छूट के अधीन अगले दिन दोपहर दो बजे तक मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना चाहिए था। हालांकि, उन्हें 30 सितंबर को शाम 4:45 बजे पेश किया गया। अदालत ने इसे संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन माना।
शीर्ष अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 22(2) का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति को न्यायिक निगरानी के बिना अनावश्यक रूप से हिरासत में रखने से रोकना है। इस प्रावधान के तहत गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर व्यक्ति को निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना आवश्यक है। इसमें केवल गिरफ्तारी के स्थान से अदालत तक पहुंचने के लिए जरूरी यात्रा समय को अलग रखा जा सकता है।अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच, पूछताछ या तलाशी में लगने वाले समय को 24 घंटे की अवधि से बाहर नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को पहले हिरासत में लेकर जांच की जाती है, तो उस दौरान बीता समय भी संवैधानिक समय-सीमा का हिस्सा होगा।सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 का भी उल्लेख किया। अदालत के अनुसार, इस प्रावधान का उद्देश्य व्यक्ति को अनावश्यक समय तक हिरासत में रखने से रोकना है। इसका अर्थ यह भी है कि जांच एजेंसी हर मामले में बिना उचित कारण पूरे 24 घंटे तक किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं रख सकती।पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति की हिरासत की अवधि परिस्थितियों के अनुसार उचित और आवश्यक होनी चाहिए। यदि उसे अदालत में पहले पेश करना संभव है, तो केवल अधिकतम समय-सीमा उपलब्ध होने के आधार पर अनावश्यक देरी को सही नहीं ठहराया जा सकता।
फैसले में मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि जब किसी गिरफ्तार व्यक्ति को अदालत में पेश किया जाए, तो मजिस्ट्रेट को उसकी वास्तविक हिरासत की तारीख और समय दर्ज करना चाहिए। इसके बाद स्वतंत्र रूप से यह जांच करनी चाहिए कि संविधान में निर्धारित 24 घंटे की समय-सीमा का पालन हुआ है या नहीं।अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट को केवल गिरफ्तारी के आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज समय पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्हें यह भी देखना होगा कि संबंधित व्यक्ति को वास्तव में कब से जांच एजेंसी के नियंत्रण में रखा गया था।इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू हिरासत के दौरान होने वाली हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत में हिंसा देश की एक गंभीर समस्या है। ऐसे मामलों में न्यायिक निगरानी जरूरी है, ताकि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा की जा सके।शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि जांच एजेंसियों को औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज करने से पहले व्यक्ति को अनिश्चित अवधि तक हिरासत में रखने की अनुमति दी जाती है, तो संवैधानिक सुरक्षा का उद्देश्य ही कमजोर हो जाएगा।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को आवश्यक यात्रा समय की छूट के बाद भी निर्धारित 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता और उसकी हिरासत जारी रहती है, तो ऐसी हिरासत अवैध होगी। संबंधित व्यक्ति को तत्काल हिरासत से रिहा करने का निर्देश दिया जा सकता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपियों को वास्तविक हिरासत के समय से निर्धारित अवधि के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया। इसलिए अदालत ने उनकी हिरासत को असंवैधानिक माना और उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।सुप्रीम कोर्ट ने कुछ उच्च न्यायालयों के उन फैसलों से भी असहमति जताई, जिनमें औपचारिक गिरफ्तारी से पहले हिरासत में बिताए गए समय को 24 घंटे की गणना से अलग रखने की अनुमति दी गई थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 22(2) के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है।इस फैसले का देशभर की पुलिस और अन्य जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है। अब किसी व्यक्ति की हिरासत का वास्तविक समय और उसकी औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज किए जाने का समय विशेष महत्व रखेगा।कानूनी दृष्टि से यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। हालांकि, यह फैसला किसी भी अपराध में जांच या वैधानिक गिरफ्तारी पर रोक नहीं लगाता। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जांच और गिरफ्तारी के दौरान संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का पालन किया जाए।सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगते ही संवैधानिक सुरक्षा लागू हो जाती है। औपचारिक गिरफ्तारी की प्रक्रिया में देरी करके उसके अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता।
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